पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक संघर्षों और वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का देश में महंगाई पर कोई खास प्रभाव नहीं देखा गया है, क्योंकि भारत की महंगाई इस समय निचले स्तर के करीब है। यह बात वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोमवार को संसद में कही।
निर्मला सीतारमण ने एक लिखित उत्तर में कहा कि वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का महंगाई पर मध्यम अवधि का प्रभाव कई कारकों पर निर्भर करेगा। इनमें विनिमय दर में उतार-चढ़ाव, वैश्विक मांग और आपूर्ति की स्थिति, मौद्रिक नीति के प्रभाव, सामान्य महंगाई की स्थिति तथा अप्रत्यक्ष पास-थ्रू की सीमा शामिल है। निर्मला सीतारमण ने कहा कि सरकार ने महंगाई को नियंत्रित करने और आम नागरिक पर इसके प्रभाव को कम से कम करने के लिए आवश्यक खाद्य वस्तुओं के लिए बफर स्टॉक बढ़ाने, खुले बाजार में खरीदे गए अनाज की रणनीतिक बिक्री करने, आयात की सुविधा और कम आपूर्ति की अवधि के दौरान निर्यात पर अंकुश लगाने जैसे कई कदम उठाए हैं।
बीते फरवरी माह के अंत और 2 मार्च के बीच कच्चे तेल का एफओबी (फ्री ऑन बोर्ड) मूल्य भारत के लिए 69.01 डॉलर से बढ़कर 80.16 डॉलर प्रति बैरल हो गया है। वित्त मंत्रालय ने कहा कि वैश्विक कच्चे तेल और भारतीय बास्केट की कीमत पिछले एक साल से गिरावट की राह पर थी।
नए 2024 आधार वर्ष श्रृंखला के तहत खुदरा महंगाई जनवरी 2026 में 2.75 फीसदी रही, जबकि उपभोक्ता खाद्य मूल्य सूचकांक 2.13 फीसदी पर आंका गया। ईंधन और प्रकाश का भार 2012 के आधार वर्ष में 6.84 से घटाकर नए 2024 के आधार वर्ष में 5.49 कर दिया गया है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) में खाद्य और पेय पदार्थों का भार नई श्रृंखला में 45.86 फीसदी से घटाकर 36.75 फीसदी कर दिया गया है। ऐसा सीपीआई महंगाई में खाद्य पदार्थों के कारण होने वाली मौसमी अस्थिरता को कम करने के लिए किया गया था। वित्त मंत्रालय की ताजा मासिक
आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि व्यापक आर्थिक सूचकांकों में दबाव प्रदर्शित करने के लिए कच्चे तेल की कीमतें एक निश्चित अवधि तक 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर रहनी चाहिए। मंत्रालय ने अपनी मासिक आर्थिक समीक्षा में चेतावनी देते हुए कहा कि यदि खाड़ी क्षेत्र युद्ध लंबा खिंचता है तो यह अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। इससे महंगाई, विनिमय दर, व्यापार और पूंजी प्रवाह, भुगतान संतुलन तथा चालू खाता घाटे पर दबाव पड़ सकता है। समीक्षा में यह भी कहा गया है कि उर्वरक और पेट्रोकेमिकल्स जैसे क्षेत्र भी प्रभावित हो सकते हैं, जो एलएनजी और कच्चे तेल पर निर्भर हैं और जिनकी कीमतें युद्ध छिड़ने के बाद से क्रमशः 9 फीसदी और 50 फीसदी तक बढ़ चुकी हैं।
बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस ने कहा, ‘होलसेल प्राइस इंडेक्स पर अधिक प्रभाव पड़ेगा। सीपीआई के लिए जब तक सरकार ईंधन की कीमतें नहीं बढ़ाती है, तब तक यह प्रभावित नहीं होगा, लेकिन पेट्रोलियम, उर्वरक आदि के संदर्भ में निर्माताओं के लिए इनपुट लागत बढ़ जाएगी। मुख्य उद्योगों के लिए यह कीमत से कम आपूर्ति का मामला है।’