अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ने से भारतीय फर्मों के लिए विदेशी बॉन्ड बाजार से पैसा जुटाना महंगा हो गया है। ऐसे में खनन क्षेत्र की दिग्गज कंपनी वेदांत ने 10 साल के बॉन्ड के जरिये संभवत: भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) से 4,809 करोड़ रुपये जुटाने का करार कर लिया है। कई सूत्रों ने इसकी पुष्टि की है।
नाम जाहिर नहीं करने की शर्त पर एक वरिष्ठ ट्रेजरी अधिकारी ने कहा, ‘वेदांत डबल एए रेटिंग वाली कंपनी है और वह 10 साल की प्रतिभूति के जरिये एलआईसी से पैसे जुटा रही है। यह ब्याज दर की बाध्यता से मुक्त प्रत्यक्ष सौदा है।’
सूत्रों के अनुसार इस तरह के ऋण की ब्याज दर 10 वर्षीय सरकारी प्रतिभूतियों के ब्याज से 100 आधार अंक ज्यादा यानी करीब 8.50 फीसदी रह सकता है। 10 वर्षीय सरकारी बॉन्ड का प्रतिफल आज 7.41 फीसदी पर बंद हुआ। कई सूत्रों ने कहा कि इस तरह के सौदे का ब्योरा सार्वजनिक नहीं किया जाता है, लेकिन सौदे का आकार देखकर लगता है कि एलआईसी इसमें शामिल हुई होगी। वेदांत 18 महीने की प्रतिभूतियां बेचकर 1,800 से 2,000 करोड़ रुपये जुटाने की संभावना भी तलाश रही है। मगर सूत्रों ने इसमें शामिल निवेशकों का जिक्र नहीं किया। वेदांत और एलआईसी को इस सौदे की पुष्टि के लिए ईमेल भेजे गए थे मगर खबर लिखने तक उनका जवाब नहीं आया।
सूत्रों के अनुसार 10 वर्षीय बॉन्ड का सौदा पूरा हो चुका है और 18 महीने के बॉन्ड पर अभी बातचीत चल रही है। वेदांत इस रकम का उपयोग मौजूदा कर्ज चुकाने और पूंजीगत व्यय में करेगी। वेदांत ने इससे पहले दिसंबर 2021 में स्थानीय मुद्रा बॉन्ड में पूंजी जुटाई थी। इस साल की शुरुआत में क्रिसिल और इंडिया रेटिंग्स सहित कई रेटिंग एजेंसियों ने वेदांत की रेटिंग बढ़ाकर एए कर दी थी।
रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर तक फिसलने के कारण पिछले हफ्ते वेदांत रिसोर्सेस को 2024 में परिपक्व होने वाला डॉलर मद के कर्ज में काफी नुकसान हुआ था। 22 जून को डॉलर के मुकाबले रुपया 78.39 के सर्वकालिक निचले स्तर पर बंद हुआ था। इस साल अब तक रुपये में करीब 5 फीसदी की नरमी आ चुकी है। अमेरिका में उच्च ब्याज दर, कच्चे तेल में तेजी और विदेशी निवेशकों की भारतीय शेयर बाजार में बिकवाली के बीच रुपये में नरमी से देसी कंपनियों के लिए विदेशी कर्ज चुकाना महंगा हो गया है। फरवरी 2021 में वेदांत ने विदेशी बॉन्ड के जरिये 1.2 अरब डॉलर की रकम जुटाई थी।
इंडिया रेटिंग्स ऐंड रिसर्च में निदेशक सौम्यजित नियोगी ने कहा, ‘बीते दो वर्षों में विदेशी बाजार से कर्ज जुटाना भारतीय फर्मों के लिए आसान और सस्ता था लेकिन अब स्थितियां बदल गई हैं।’ उन्होंने कहा कि विकसित देशों में ब्याज दरें काफी बढ़ गई हैं, खास तौर पर अल्पावधि के ऋण पर। इस अवधि के लिए विदेशी बाजार का कर्ज फ्लोटिंग दर से जुड़ा होता है। इसके साथ ही डॉलर के मुकाबले रुपये में नरमी से गणित और बिगड़ गया है।
बिज़नेस स्टैंडर्ड रिसर्च द्वारा संकलित आंकड़ों से पता चलता है कि मार्च 2022 में भारतीय फर्मों ने विदेशी बाजार से 670 करोड़ डॉलर जुटाए थे मगर जून 2022 में केवल 5 करोड़ डॉलर जुटाए गए।
मार्च 2022 में अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने अपनी मौद्रिक नीति में सख्ती शुरू की थी और उसी महीने ब्याज दर में 25 आधार अंक का इजाफा किया था। उसके बाद से फेडरल रिजर्व ने ब्याज दर में 125 आधार अंक की बढ़ोतरी और की है।
पिछले कुछ महीनों से भारतीय कंपनियों के लिए कर्ज महंगा हो गया है क्योंकि ऊंची मुद्रास्फीति को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक ने भी ब्याज दरों में बढ़ोतरी की है। मई से अब तक आरबीआई ने रीपो दर में 90 आधार अंक का इजाफा किया है। इसलिए कर्ज लेने वाले बैंक का रुख कर रहे हैं। आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार जून की शुरुआत में बैंकों से कर्ज 13.1 फीसदी बढ़ गया, जो तीन साल में सबसे अधिक बढ़ोतरी है।
इस बीच 10 वर्षीय सरकारी बॉन्ड का प्रतिफल भी 96 आधार अंक बढ़ गया है। अप्रैल से जून के बीच इसमें 57 आधार अंक की वृद्धि हुई है। सरकारी बॉन्ड का प्रतिफल ही कॉरपोरेट बॉन्ड का पैमाना होता है। ब्लूमबर्ग के आंकड़ों के अनुसार एएए रोटिंग वाले 10 वर्षीय कॉरपोरेट बॉन्ड का प्रतिफल 31 मार्च के 7 फीसदी से बढ़कर 24 जून को 7.77 फीसदी हो गया। इसी दौरान एए रेटिंग वाले 10 वर्षीय कॉरपोरेट बॉन्ड का प्रतिफल 7.79 फीसदी से बढ़कर 8.48 फीसदी हो गया।