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मंद नहीं होगी इनकी रफ्तार

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Last Updated- December 08, 2022 | 10:49 AM IST

मंदी को लेकर हायतौबा मचना लाजिमी है क्योंकि कमोबेश सभी देश और सभी क्षेत्र इसकी मार से परेशान हैं।


लेकिन 2008 में भारतीय एफएमसीजी कारोबार इससे कमोबेश अछूता रहा और अगले साल भी इस क्षेत्र में मंदी की आशंका न के बराबर है।

हालांकि पिछले कुछ अरसे में बड़ी कंपनियों की बिक्री में हल्की फुल्की गिरावट आई है, लेकिन गांवों और छोटे शहरों में बढ़ती बिक्री इसकी भरपाई कर रही है।

अगले साल भी यह चलन जारी रहने की उम्मीद है। 2009 में कंपनियां कारोबारी माहौल और बाजार के हालात को देखते हुए अपनी रणनीति में कुछ तब्दीली कर सकती हैं, लेकिन मोटे तौर पर इस क्षेत्र में बड़े बदलाव देखने को नहीं मिलेंगे।

महंगाई को देखते हुए कम कीमत वाले उत्पाद लाना, छोटे शहरों और गांवों में ज्यादा बड़े बाजार की तलाश करना जैसे पहलुओं पर अब एफएमसीजी कंपनियां ज्यादा जोर दे सकती हैं।

इसके अलावा जिंस की कीमतें भी घट रही हैं, जिसकी वजह से कंपनियां कीमतें कम करके बिक्री बढ़ाने की राह पर चल सकती हैं।

मंदी की वजह से सबसे बड़ी बात लागत में इजाफा हो सकती है। इससे निपटने के लिए कंपनियां ठेके पर उत्पादन करा सकती हैं। गांवों में बहुत बड़े बाजार तक अभी पहुंचना है, इसलिए 2009 में वहां से बिक्री बढ़ना लाजिमी है।

लेकिन शहरों में रिटेलरों की खस्ता हालत का खामियाजा एफएमसीजी कंपनियों को भी उठाना पड़ सकता है। ज्यादातर कंपनियां 2009 के लिए निवेश की योजनाएं पहले ही घोषित कर चुकी हैं, इसलिए उनके उत्पादों में विस्तार लाजिमी है।

लागत घटाने के लिए एफएमसीजी कंपनियां तमाम हथियार आजमा सकती हैं, लेकिन उनके कर्मचारियों के लिए 2009 खराब नहीं होगा यानी ये कंपनियां छंटनी जैसे उपाय नहीं अपनाएंगी।

लेकिन कीमतों पर उनका ध्यान होगा। एफएमसीजी में पैकेजिंग, नए उत्पादों, बिक्री बढ़ाने के लिए प्रमोशनल पेशकश और रीब्रांडिंग का चलन पहले से ज्यादा दिख सकता है।

खपत में कमी नहीं होगी और गांवों से कारोबार में इजाफे की उम्मीद है

सुनील दुग्गल
सीईओ, डाबर
इंडिया


मंदी कहां है, हमारा बाजार तो 2009 में पहले से तेज बढ़ेगा


अतुल सिंह
सीईओ, कोका कोला इंडिया

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First Published - December 23, 2008 | 11:07 PM IST

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