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3जी मसले पर सरकार में ही खींचतान

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Last Updated- December 09, 2022 | 11:30 PM IST

थ्री -जी मसले पर केंद्रीय मंत्रिमंडल के सदस्यों की राय अलग-अलग है। एक धड़ा जहां सीमित खिलाड़ियों को ही स्पेक्ट्रम आवंटित करने के पक्ष में है तो दूसरा धड़ा इस होड़ में किसी तरह के नियंत्रण का विरोध कर रहा है।


सूत्रों के मुताबिक, ऐसे में इसके आवंटन में और देर होने की पूरी संभावना है। कैबिनेट की राय इस बात को लेकर बंटी रही कि इसके लिए अधिकतम पांच कंपनियों को ही अनुमति दी जाए। यही नहीं पूरे देश में 3-जी लाइसेंस के लिए रिजर्व प्राइस के मुद्दे पर भी एक राय नहीं बन सकी है।

जानकारों के मुताबिक, चूंकि यह मसला मंत्रियों के समूह को सौंप दिया गया है तो अब 3-जी स्पेक्ट्रम आवंटन में देरी हो सकती है। केंद्रीय मंत्रिमंडल का एक धड़ा संचार मंत्री ए. राजा के उस प्रस्ताव की मुखालफत कर रहा है, जिसमें सीमित कंपनियों को ही स्पेक्ट्रम देने की बात कही गई थी।

ऐसे में  राम विलास पासवान ने सलाह दी कि मामले को मंत्रियों के समूह के हवाले कर दिया जाए। केंद्रीय कानून मंत्री हंसराज भारद्वाज ने इसका समर्थन किया। भारद्वाज ने बताया कि यह मामला बहुत विवादास्पद है।

भारद्वाज और एंटनी ने कहा कि इस मसले पर उनसे कोई संपर्क नहीं किया गया है। सूत्रों के मुताबिक, इस क्षेत्र में सीमित खिलाड़ियों को ही उतरने देने को लेकर राजा का रुख अड़ियल नहीं रहा है।

3-जी से जुड़ी नीतियों की घोषणा करते वक्त राजा ने कहा था कि सीमित स्पेक्ट्रम होने से सरकार के हाथ बंधे हुए से हैं। इसलिए वह असीमित खिलाड़ियों को लाइसेंस जारी करना नहीं चाहती।

सेवा को सुचारु रूप से चलाने के लिए न्यूनतम 5 मेगाहर्ट्ज की जरूरत होती है। उसने कहा था कि जब और स्पेक्ट्रम उपलब्ध हो जाएंगे तब अधिक कंपनियों को इसका आवंटन कर दिया जाएगा।

मसला जीओएम के हवाले

आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने लंबित पड़े 3 जी मसले को मंत्रियों के समूह के हवाले कर दिया है। सूत्रों के अनुसार, अरसे से लंबित पड़े इस मसले पर कोई आम राय न बन पाने और जटिलताओं के चलते इसे समूह के हवाले कर दिया है।

ऐसे में स्पेक्ट्रम आवंटन में और देरी हो जाएगी। इससे पहले आवंटन को तीन बार आगे बढ़ाया जा चुका है। सूत्रों के मुताबिक, मंत्रालयों के बीच मतभेद उभरने से ऐसा करना पड़ा। मतभेद रिजर्व प्राइस और आबंटन के ब्लॉकों की संख्या को लेकर पनपा है।

दूरसंचार विभाग ने मंत्रिमंडल के समक्ष तीन विकल्प रखे हैं। पहला यह कि समूचे देश के लिए लाइसेंस शुल्क 2,020 करोड़ रुपये हो। दूसरा कि इसे 3,540 करोड़ रुपये रखा जाए। तीसरा प्रस्ताव  वित्त मंत्रालय ने रखा है।

इसके मुताबिक, लाइसेंस शुल्क को दोगुना कर 4,040 करोड़ रुपये कर दिया जाए। इस प्रस्ताव को कानूनी मामलों के विभाग की मंजूरी मिलनी बाकी है।

प्रस्ताव ने नीलामी के बाद 2 फीसदी अतिरिक्त प्रशासनिक शुल्क लगाए जाने का निर्णय भी आर्थिक मामलों की मंत्रिमडलीय समिति के हवाले कर दिया।

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First Published - January 29, 2009 | 11:19 PM IST

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