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ईरान युद्ध के बीच IPO बाजार में म्युचुअल फंडों का जलवा, कई सालों के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची हिस्सेदारी

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फरवरी के आखिर में ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से ऐसे 13 आईपीओ आए हैं। इन आईपीओ से जुटाई गई कुल रकम का 32.3 फीसदी हिस्सा म्युचुअल फंडों से मिला

Last Updated- July 03, 2026 | 9:46 PM IST
IPO
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

ईरान युद्ध के बाद से आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) में कंपनियों की ओर से पेश शेयर बिक्री में म्युचुअल फंडों की हिस्सेदारी लगातार बढ़ी है। असल में, जून में यह हिस्सेदारी कई वर्षों के उच्च स्तर पर पहुंच गई। जो कंपनियां पहली बार शेयर बाजार में आम निवेशकों से रकम जुटाती हैं, वे आईपीओ के जरिये ऐसा करती हैं। 

प्राइमडेटाबेस डॉट कॉम के आंकड़ों के मुताबिक फरवरी के आखिर में ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से ऐसे 13 आईपीओ आए हैं। इन आईपीओ से जुटाई गई कुल रकम का 32.3 फीसदी हिस्सा म्युचुअल फंडों से मिला। ईरान युद्ध से पहले यह आंकड़ा 20 फीसदी था।

इस विश्लेषण में 2023 से अब तक के आंकड़ों पर नजर डाली गई है। इस दौरान जून के आंकड़े सबसे अधिक रहे। सालाना आंकड़ों से भी यही रुझान दिखता है। 2023 में आए आईपीओ से मिली कुल रकम का 17 फीसदी हिस्सा म्युचुअल फंडों से आया यानी इन्होंने 17 फीसदी की रकम के बराबर शेयर खरीदे। यह आंकड़ा 2024 में 20 फीसदी, 2025 में 22 फीसदी और जून 2026 तक 29 फीसदी रहा। ईरान युद्ध के दौरान आए 13 आईपीओ के मामले में यह रुझान और बढ़ गया और 32.3 फीसदी तक पहुंच गया। 

हाल के समय में बड़ी कंपनियों के मुकाबले छोटी कंपनियों के शेयरों ने बेहतर प्रदर्शन किया है। इसलिए, परिसंपत्ति प्रबंधक अब उन कंपनियों पर ध्यान देने को इच्छुक हैं, जिनका बाजार पूंजीकरण 4,000 करोड़ रुपये से कम हो सकता है। यह बात एमके ग्लोबल फाइनैंशियल सर्विसेज के मुख्य कार्याधिकारी (इन्वेस्टमेंट बैंकिंग) यतिन सिंह ने कही जिनके पास ऐसे कई इश्यू का काम है। उन्होंने कहा, वे छोटी कंपनियों पर विचार के लिए तैयार हैं।

4,000 करोड़ रुपये से कम बाजार मूल्यांकन वाली कंपनियों को फरवरी के आखिर से लेकर अब तक उनके लिस्टिंग वाले दिनों के बंद भाव के आधार पर औसतन 6.2 फीसदी का फायदा हुआ। 4,000 करोड़ रुपये से ज्यादा एमकैप वाली कंपनियों को औसतन 3.1 फीसदी का लाभ हुआ। इन बड़े आईपीओ में पेश शेयरों का लगभग आधा हिस्सा म्युचुअल फंडों ने खरीदा जबकि 4,000 करोड़ रुपये से कम मूल्यांकन वाली कंपनियों के मामले में यह हिस्सा 10 फीसदी से कम था।

लिस्टिंग की प्रक्रिया वाली कई बड़ी कंपनियों को टैरिफ से जुड़ी वजहों से बाजार में आई भारी गिरावट और भू-राजनीतिक तनाव से पहले ही सेबी से मंजूरी मिल गई थी। सिंह ने कहा कि उन्होंने पहले जिस मूल्यांकन की उम्मीद की होगी, उसे शायद बदलना पड़े और यह देखना होगा कि कितनी कंपनियां पहले के मुकाबले कम मूल्यांकन पर सूचीबद्ध होने के लिए तैयार होती हैं।

आईपीओ की सूचीबद्धता वाले दिन के बंद भाव के आधार पर मिलने वाला औसत फायदा कम होता जा रहा है। ईरान युद्ध के बाद आए आईपीओ में औसत आधार पर एक अंक में फायदा देखा गया है। 2023 में आवेदन के लिए खुले आईपीओ के लिए इसी तरह के रोलिंग-आधार पर यह फायदा 12 फीसदी  से ज्यादा था और उसी साल की सितंबर तिमाही में यह 49.2 फीसदी तक पहुंच गया था।

दुनिया भर में ऐसे सबूत हैं कि 1998 में रूस के डेट डिफॉल्ट (कर्ज़ न चुका पाने) की वजह से बाजार में आई उथल-पुथल के बाद नकदी की चिंताओं के कारण म्युचुअल फंड छोटे आईपीओ से दूर रहे हैं। कैलिफॉर्निया विश्वविद्यालय के रॉबर्ट पी. बार्टलेट-3 और स्टीवन डेविडॉफ सोलोमन और ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी के पॉल रोज की 2017 की स्टडी ‘द स्मॉल आईपीओ ऐंड द इन्वेस्टिंग प्रेफरेंसेज ऑफ म्युचुअल फंड्स’ के अनुसार म्युचुअल फंड योजनाओं का आकार लगातार बड़ा होना भी इसकी एक वजह रहा है।

इस रुझान को देखते हुए किसी सफल छोटे आईपीओ में भी बड़े फंड की हिस्सेदारी को कुशलता से ट्रेड करने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ती है, जबकि फंड के रिटर्न में इसका योगदान बहुत कम होता है। नकदी की कमी और रिटर्न में योगदान से जुड़ी इन दो चिंताओं का नतीजा यह हुआ कि बड़े म्युचुअल फंड, जो कभी छोटे आईपीइओ की मांग का मुख्य स्रोत थे, तेजी से और लंबे समय तक छोटे आईपीओ बाजार से बाहर हो गए। इससे छोटे आईपीओ में तरलता की कमी की समस्या और भी बढ़ गई है। 

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First Published - July 3, 2026 | 9:37 PM IST

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