वैश्विक मंदी की वजह से अब कंपनियों के ऊंचे ओहदों पर बैठे लोगों का भी विकास को लेकर भरोसा डगमगा गया है।
कंपनियों के मुख्य कार्य अधिकारियों (सीईओ) की मानें तो बाजार को इस मंदी से उबरने में कम से कम तीन साल तो लग ही जाएंगे। इस बात का पता लगा है प्राइसवाटरहाउसकूपर्स (पीडब्ल्यूसी) के एक सर्वे से। इस सर्वे की मानें तो 2003 के बाद से सीईओ का नजरिया इतना नकारात्मक कभी नहीं रहा था।
इस सर्वे की शुरुआत ही 2003 से ही हुई थी। दुनिया भर में सिर्फ 21 फीसदी मुख्य कार्य अधिकारियों को अगले 12 महीनों में अपनी कंपनी की कमाई के बढ़ने का भरोसा है। यह पिछले साल के सर्वे का सीधा आधा है यानी पूरे 50 फीसदी की कमी।
दूसरी तरफ, एक चौथाई से ज्यादा सीईओ को तो अगले एक साल में आगे बढ़ने की कोई राह नहीं सूझ रही है। इस सर्वे के नतीजों को वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की दावोस में होने वाली सालाना बैठक में जारी किया गया।
दुनिया भर में सीईओ लंबी अवधि में होने वाली विकास को लेकर भी सशंकित हैं। इससे पता चलता है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुधार काफी धीरे-धीरे आएगा।
इनमें से सिर्फ 34 फीसदी लोगों को भरोसा है कि अगले तीन सालों में हालात बदल जाएंगे, जबकि पिछले साल ऐसे लोगों की तादाद 42 फीसदी थी। वैसे, तब आर्थिक मंदी की शुरुआत भर ही हुई थी। जैसे-जैसे आर्थिक हालत बिगड़ी है, कंपनियों के इन कर्ता-धर्ताओं का भी भरोसा भी खत्म होता चला गया।
प्राइसवाटरहाउसकूपर्स के ग्लोबल सीईओ सैम्युअल ए. डीपियाजा जू्नियर का कहना है कि, ‘मंदी की रफ्तार और उसके प्रभाव की वजह से दुनिया भर के सीईओ अंदर तक डर गए हैं। इस वजह से दुनिया भर में भरोसे का संकट पैदा हो गया है।
इन लोगों को सबसे ज्यादा खतरा अपने अस्तित्व पर नजर आ रहा है। कभी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में भी आज की तारीख में कंपनियों को कर्ज की कमी, गिरते पूंजी बाजार और तेजी से कम होती मांग का सामना करना पड़ रहा है।’
सर्वे का कहना है कि नकारात्मक सोच का यह आलाम किसी खास इलाके या उद्योग तक सीमित नहीं है। अमेरिका और पश्चिमी यूरोप में तो सिर्फ 15 फीसदी मुख्य कार्यकारी अधिकारियों को हालत सुधरने का भरोसा है।
दूसरी तरफ, मध्य व पूर्वी यूरोप और लैटिन अमेरिका के 21-21 फीसदी सीईओज को विकास की उम्मीद दिखाई दे रही है। एशिया प्रशांत इलाके के 31 फीसदी मुख्य कार्य अधिकारियों को आगे की राह अच्छी दिखाई दे रही है।