रियल एस्टेट

रेरा पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती, रियल एस्टेट सेक्टर में बढ़ेगी जवाबदेही

सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियों के बीच रेरा की प्रभावशीलता पर बहस तेज हो गई है, जहां विशेषज्ञ कानून को मजबूत मानते हुए उसके सख्त और समान क्रियान्वयन पर जोर दे रहे हैं।

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बीएस वेब टीम   
Last Updated- February 14, 2026 | 2:12 PM IST

देश के रियल एस्टेट क्षेत्र को विनियमित करने के लिए बनाए गए रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी यानी RERA को लेकर सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियों ने पूरे सेक्टर का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। अदालत ने विभिन्न राज्यों में RERA के कामकाज पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि कई जगहों पर यह संस्था डिफॉल्टर बिल्डरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने के बजाय उन्हें राहत देने जैसी भूमिका निभाती दिख रही है। यहां तक कि अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि अगर व्यवस्था प्रभावी नहीं है तो ऐसी संस्था के अस्तित्व पर ही पुनर्विचार किया जाना चाहिए।

कानूनी विशेषज्ञों और रियल एस्टेट विश्लेषकों का मानना है कि शीर्ष अदालत की यह टिप्पणी केवल नाराजगी भर नहीं है, बल्कि यह संकेत है कि अब जोर कानून की मजबूती पर नहीं, बल्कि उसके सख्त और ईमानदार क्रियान्वयन पर रहेगा। यदि राज्यों के RERA प्राधिकरण अपने दायित्वों का प्रभावी ढंग से निर्वहन नहीं करते हैं तो उनके कामकाज की समीक्षा और जवाबदेही तय होना तय माना जा रहा है।

सख्त निगरानी और तेज फैसलों की जरूरत

विशेषज्ञों के अनुसार, अदालत की टिप्पणी के बाद प्राधिकरणों पर यह दबाव बढ़ेगा कि वे परियोजनाओं की समयसीमा की निगरानी गंभीरता से करें, एस्क्रो खातों के उपयोग की पारदर्शिता सुनिश्चित करें और लंबित मामलों का शीघ्र निपटारा करें। कई राज्यों में खरीदारों की शिकायतें वर्षों तक लंबित रहती हैं, जिससे घर खरीदारों का भरोसा कमजोर होता है। अब संभावना है कि शिकायतों के निस्तारण की प्रक्रिया को तेज और पारदर्शी बनाया जाएगा।

छोटे और गैर अनुपालन करने वाले डेवलपर्स पर असर

बाजार विश्लेषकों का कहना है कि यदि RERA का प्रवर्तन सख्त होता है तो इसका सीधा असर उन डेवलपर्स पर पड़ेगा जो परियोजनाओं को समय पर पूरा नहीं करते या वित्तीय नियमों का पालन नहीं करते। ऐसे छोटे या कमजोर डेवलपर्स के लिए बाजार में टिके रहना कठिन हो सकता है। दूसरी ओर, मजबूत वित्तीय स्थिति और बेहतर कॉरपोरेट गवर्नेंस वाले बड़े डेवलपर्स को इससे लाभ मिल सकता है, क्योंकि निवेशकों और खरीदारों का भरोसा संगठित और जिम्मेदार कंपनियों की ओर बढ़ेगा।

रियल एस्टेट सलाहकार कंपनी Anarock के चेयरमैन अनुज पुरी का भी मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी राज्यों में नियमों के कड़ाई से पालन की दिशा में एक निर्णायक कदम साबित हो सकती है। इससे परियोजनाओं की निगरानी मजबूत होगी और पारदर्शिता बढ़ेगी। साथ ही डेवलपर्स पर समय पर प्रोजेक्ट पूरा करने का दबाव भी बढ़ेगा।

खरीदारों के लिए क्या मायने

घर खरीदने वाले लोगों के लिए यह घटनाक्रम सकारात्मक संकेत के रूप में देखा जा रहा है। यदि RERA संस्थाएं सक्रिय और जवाबदेह बनती हैं तो खरीदारों की शिकायतों का समाधान जल्दी होगा और उन्हें कानूनी सुरक्षा का वास्तविक लाभ मिलेगा। इससे रियल एस्टेट सेक्टर में विश्वास बहाली की प्रक्रिया को बल मिल सकता है।

कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है। उसका प्रभावी और निष्पक्ष क्रियान्वयन ही वास्तविक बदलाव ला सकता है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राज्य स्तरीय RERA प्राधिकरण इस संदेश को किस गंभीरता से लेते हैं और अपनी कार्यप्रणाली में क्या ठोस सुधार करते हैं।

रियल एस्टेट क्षेत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए लागू किए गए रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी कानून को लेकर हाल में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों ने नई बहस को जन्म दिया है। उद्योग जगत और उपभोक्ता संगठनों का मानना है कि अदालत की यह टिप्पणी कानून की मूल भावना पर सवाल नहीं उठाती, बल्कि इसके प्रभावी क्रियान्वयन की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

नियामक ढांचे को और मजबूत करने की जरूरत

साया ग्रुप के प्रबंध निदेशक विकास भसीन का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां नियामक प्रणाली को और सुदृढ़ करने के लिए उत्प्रेरक का काम कर सकती हैं। उनके अनुसार, यदि कानून में व्यावहारिक और सकारात्मक संशोधन किए जाएं तथा सभी राज्यों में एक समान तरीके से इसका पालन सुनिश्चित किया जाए, तो निवेशकों का भरोसा और मजबूत होगा। इससे रियल एस्टेट क्षेत्र में जिम्मेदार और संतुलित विकास को बढ़ावा मिलेगा।

डेवलपर्स के लिए बढ़ेगी जवाबदेही

अश्विन शेठ ग्रुप के मुख्य व्यवसाय अधिकारी भाविक भंडारी का मानना है कि संभावित बदलावों के संकेत से डेवलपर्स को अपनी कार्यशैली में और अधिक अनुशासन लाना होगा। उनका कहना है कि शासन व्यवस्था, पूंजी प्रबंधन और समयबद्ध परियोजना निष्पादन पर विशेष ध्यान देना अब अनिवार्य हो जाएगा। इससे परियोजनाओं में देरी और अनियमितताओं पर अंकुश लगेगा।

आंकड़े क्या बताते हैं

आवास और शहरी कार्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, कानून लागू होने के आठ वर्षों में देशभर में 99 हजार से अधिक परियोजनाएं और 1.12 लाख से ज्यादा रियल एस्टेट एजेंट पंजीकृत हो चुके हैं। पंजीकृत परियोजनाओं की संख्या में महाराष्ट्र सबसे आगे है, जहां 50 हजार से अधिक परियोजनाएं दर्ज हैं। इसके बाद गुजरात का स्थान है, जहां 7,500 से अधिक परियोजनाएं रेरा के तहत पंजीकृत हैं। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि कानून को व्यापक स्तर पर अपनाया गया है, लेकिन प्रभावशीलता का सवाल अब भी बना हुआ है।

कानून मजबूत, अमल कमजोर

फोरम फॉर पीपल्स कलेक्टिव एफर्ट्स के अध्यक्ष और केंद्रीय सलाहकार परिषद, रेरा के सदस्य अभय उपाध्याय का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने कानून की आलोचना नहीं की है, बल्कि उसके क्रियान्वयन पर चिंता जताई है। उनके अनुसार, अधिनियम में पर्याप्त शक्तियां दी गई हैं, लेकिन संबंधित प्राधिकरणों को उनका सख्ती से उपयोग करना चाहिए। वे यह भी कहते हैं कि सामान्य टिप्पणियों से व्यवस्था नहीं सुधरेगी, जब तक जवाबदेही तय नहीं की जाती।

उपाध्याय ने जुर्माने की व्यवस्था पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि जब गैर अनुपालन पर 10 हजार से 15 हजार रुपये तक का मामूली जुर्माना लगाया जाता है, तो नियमों का उल्लंघन करना पालन करने से सस्ता पड़ता है। बार बार नोटिस भेजना और कड़ी कार्रवाई न करना नियमन के उद्देश्य को कमजोर करता है। उनके अनुसार, ‘रेरा पंजीकृत’ शब्द अब कई मामलों में केवल प्रचार का माध्यम बनकर रह गया है, जबकि इसे भरोसे की गारंटी होना चाहिए।

सुधार की दिशा में क्या कदम जरूरी

प्राइमस पार्टनर्स इंडिया की संस्थापक और प्रबंध निदेशक आरती हरभजांका का मानना है कि कानून की मूल भावना को बदलने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि इसके क्रियान्वयन को सुव्यवस्थित और प्रभावी बनाना अधिक महत्वपूर्ण है। उनका सुझाव है कि विशेष रूप से अटकी या अधूरी परियोजनाओं को पूरा कराने और पुनर्जीवित करने के लिए अधिनियम में लक्षित संशोधन पर विचार किया जाना चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि अधिनियम की धारा 32 को सक्रिय रूप से लागू करना समय की मांग है। इस प्रावधान के तहत रेरा प्राधिकरण सस्ती आवास योजना और हरित आवास जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर सरकार को ठोस सिफारिशें दे सकता है। यदि इन पहलुओं पर गंभीरता से काम किया जाए, तो रियल एस्टेट क्षेत्र में संरचनात्मक सुधार संभव है।

रियल एस्टेट क्षेत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर बने रेरा को लेकर हाल के समय में कई तरह की बहसें तेज हुई हैं। कुछ पक्ष इसकी कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं, लेकिन उद्योग जगत के कई विशेषज्ञों का मानना है कि इसकी उपलब्धियों को नजरअंदाज करना सही नहीं होगा। उनका कहना है कि रेरा ने भारतीय रियल एस्टेट सेक्टर में एक बुनियादी और संरचनात्मक बदलाव लाया है।

इकोनॉमिक लॉज प्रैक्टिस की पार्टनर Heena Chheda का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियों ने निश्चित रूप से कुछ कमजोरियों को उजागर किया है, लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकालना कि रेरा पूरी तरह विफल रहा है, वास्तविकता से दूर होगा। उनके अनुसार रेरा ने परियोजनाओं से मिलने वाली 70 प्रतिशत राशि को एस्क्रो खाते में सुरक्षित रखने की अनिवार्यता लागू की, जिससे फंड के दुरुपयोग पर रोक लगी। पहले यही धनराशि अन्य परियोजनाओं में मोड़ दी जाती थी, जिसके कारण घर खरीदारों को वर्षों तक इंतजार करना पड़ता था। इसके साथ ही कार्पेट एरिया की स्पष्ट परिभाषा ने खरीदारों को वास्तविक क्षेत्रफल की जानकारी दी, जिससे पारदर्शिता बढ़ी।

रियल एस्टेट कंसल्टेंसी कंपनी Knight Frank India की एक रिपोर्ट में भी रेरा के सकारात्मक प्रभावों का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक रेरा लागू होने के बाद सट्टेबाजी आधारित मूल्य निर्धारण में कमी आई और आवासीय कीमतें बाजार की वास्तविक मांग और आपूर्ति के अनुरूप होने लगीं। इससे पहले आए मंदी के दौर के बाद आवासीय क्षेत्र को दोबारा गति मिली। बेहतर नियामक ढांचे और बढ़ी हुई पारदर्शिता के कारण निवेशकों का भरोसा मजबूत हुआ। आंकड़ों के अनुसार 2017 से 2020 के बीच निजी इक्विटी निवेश 26 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जबकि 2011 से 2016 के दौरान यह 17.5 अरब डॉलर के स्तर पर था।

राज्यों के स्तर पर भी इसके असर स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। महाराष्ट्र, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों में शिकायतों के निस्तारण और परियोजनाओं के पंजीकरण की प्रक्रिया अधिक सक्रिय रही है। 9 फरवरी 2026 तक 35 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने सामान्य नियम अधिसूचित कर दिए हैं, केवल नागालैंड को छोड़कर। इसके अलावा 27 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सक्रिय रियल एस्टेट अपीलीय न्यायाधिकरण स्थापित किए जा चुके हैं, साथ ही दो अंतरिम निकाय भी काम कर रहे हैं। इन संस्थाओं ने मिलकर 1.55 लाख से अधिक मामलों का निपटारा किया है। उत्तर प्रदेश इस सूची में सबसे आगे है, जहां 52,047 मामलों का समाधान किया गया। इसके बाद महाराष्ट्र में 27,006, हरियाणा में 16,531 और कर्नाटक में 10,169 मामलों का निस्तारण हुआ है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अब रेरा की अगली चुनौती सिर्फ नियमों के पालन तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। Vivek Rathi, जो नाइट फ्रैंक इंडिया में रिसर्च के नेशनल डायरेक्टर हैं, का कहना है कि ढांचा तैयार हो चुका है, लेकिन असली परीक्षा उसके प्रभावी क्रियान्वयन में है। सभी राज्यों में एक समान सख्ती, तेज सुनवाई और विवादों के समयबद्ध समाधान से ही रेरा की विश्वसनीयता और मजबूत होगी।

First Published : February 14, 2026 | 2:12 PM IST