घरेलू बाजार में नए वाहनों की मांग में आई भारी कमी के कारण जेके टायर्स, सिएट और अपोलो जैसी टायर निर्माता कंपनियों की टायर बिक्री में 70 फीसदी तक की गिरावट आ गई है।
टायर निर्माताओं की संस्था ऑटोमोटिव टायर मैन्युफेक्चरर्स एसोसिएशन का कहना है कि चीन से सस्ते टायरों का आयात भी भारतीय टायर निर्माताओं के लिए मुसीबत का सबब बना हुआ है।
भारत में टायरों की बिक्री के लिए ओरिजनल इक्विपमेंट (ओई) और रिप्लेसमेंट मार्केट प्रमुख क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं। भारत में वाहन उत्पादन में सतत विकास के साथ ओई के लिए टायर आपूर्ति की भागीदारी हाल के वर्षों में तेजी से बढ़ी।
एटीएमए और जेके टायर्स के चेयरमैन आर. पी. सिंघानिया ने कहा, ‘जहां वाहन क्षेत्र में मंदी ने ओई बिजनेस को प्रभावित किया है वहीं चीन से सस्ते आयात और बड़े पैमाने पर डम्पिंग की वजह से रिप्लेसमेंट भी बिगड़ रहा है। इसे देखते हुए टायर उद्योग उत्पादन में कटौती करने के लिए बाध्य हो रहा है।’
अपोलो, बिड़ला, ब्रिजस्टोन, सिएट, गुडईयर, जेके टायर्स और एमआरएफ समेत सभी प्रमुख भारतीय और बहुराष्ट्रीय टायर कंपनियों ने मांग में गिरावट को देखते हुए उत्पादन में कटौती करने का फैसला किया है। सभी कंपनियां एटीएमए की सदस्य हैं।
सिएट के प्रबंध निदेशक पारस चौधरी कहते हैं, ‘वाहन निर्माताओं की ओर से उत्पादन में कटौती किए जाने के बाद ओई सेगमेंट के लिए हमारी टायर आपूर्ति में 70-75 फीसदी तक की गिरावट आई है। हमारे पूरे कारोबार में ओई सेगमेंट की भागीदारी 25 फीसदी की है। टायरों की मांग में 5-10 फीसदी की गिरावट आई है।’
मुंबई की सिएट भारत की तीसरी सबसे बड़ी टायर निर्माता कंपनी है। चौधरी ने कहा कि कंपनी को साल के अंत तक राजस्व में मामूली इजाफा होने की संभावना है। वहीं पिछली दो तिमाहियों में शुद्ध मुनाफे में लगातार गिरावट दर्ज होने के बाद इसके मुनाफे पर दबाव बढ़ सकता है।
वैश्विक आर्थिक मंदी और कुछ देशों द्वारा सुरक्षात्मक नीतियां अपनाए जाने के कारण भारत से टायर निर्यात भी सिकुड़ता जा रहा है। उदाहरण के लिए, मलेशिया, वियतनाम, इंडोनेशिया, थाईलैंड जैसे कुछ एशियाई देशों में टायरों पर आयात शुल्क लगभग 40 फीसदी है जबकि भारत में यह महज 10 फीसदी है।
भारत में रेडियल ट्रक टायरों और बस टायरों की डम्पिंग में खासा इजाफा हुआ जिसमें चीन से आने वाले टायरों की बड़ी भागीदारी है। 2002-03 में कुल आयात 80,000 यूनिट था जो 2008-09 में बढ़कर 14 लाख यूनिट से अधिक हो गया है।