डाबर समूह के प्रवर्तकों और इंगलैंड की सबसे बड़ी जीवन बीमा कंपनी अवीवा का संयुक्त उपक्रम अवीवा लाइफ हाल में ही दो बैंकों के साथ गठजोड़ खत्म हो जाने के बाद नए वितरण मॉडल पर काम कर रहा है।
बैंकों के साथ गठजोड़ समाप्त हो जाने के बाद नई पॉलिसियों की बिक्री में 24 फीसदी की गिरावट आई। कंपनी के प्रबंध निदेशक और सीईओ टी आर रामचन्द्रन से शिल्पी सिन्हा ने बिक्री में गिरावट को रोकने की नीतियों पर बात की। पेश है बातचीत के प्रमुख अंश:
उदारीकरण की शुरुआत के बाद पहली बार दिसंबर में जीवन बीमा उद्योग के प्रीमियम वसूली में कमी आई, इसकी क्या वजह है?
इस उद्योग की प्रीमियम वसूली में गिरावट आई है लेकिन अगर आप एलआईसी और कुछ दूसरे जीवन बीमार् कत्ताओं को अलग रख दें तो वास्तव में इसमें धीमी गति से बढ़ोतरी हो रही है। इसकी वजह कमजोर पूंजी बाजार और फंड का आसानी से उपलब्ध नहीं होना है।
मुझे यकीन है कि यह साल इस उद्योग के लिए यह चुनौती भरा साल रहेगा और इसमें 15-20 फीसदी की रफ्तार से बढ़ोतरी होगी। उद्योगों के सामने मुनाफा कमाने और ग्राहकों को बेहतर सेवा मुहैया कराने की दो चिंता मौजूद होगी।
अप्रैल-दिसंबर के दौरान आपकी प्रीमियम आय में 24 फीसदी की कमी क्यों आई?
अविवा इंडिया के दो बैंकएश्योरेंस पार्टनर मसलन सेंचुरियन बैंक ऑफ पंजाब (सीबीओपी)और कनारा बैंक के साथ वित्तीय वर्ष की शुरुआत में ही गठजोड़ खत्म हो गया। इसका असर भी बिजनेस पर पड़ा।
हालांकि अगर हम सीबीओपी और कनारा को छोड़ भी दें तो हम दूसरे निजी क्षेत्र के खिलाड़ियों की तरह ही तरक्की कर रहे हैं और बाजार से आगे भी चल रहे हैं। आगे हम एक मल्टी-डिस्ट्रीब्यूशन मॉडल बनाना चाहते हैं।
हम अपने मौजूदा बैंक पार्टनर के साथ अपने संबंधों को बेहतर बनाएं रखेंगे इसी वजह से हम उन तक पहुंच के स्तर को ज्यादा विस्तार दे रहे हैं। नए बिजनेस के मौके की तलाश भी जारी है।
हमने बैंकएश्योरेंस वितरकों से भी गठजोड़ किया है और हम वितरण के नए मॉडलों मसलन स्वतंत्र वित्तीय सलाहकार और प्रत्यक्ष बिक्री एजेंट के लिए भी काम कर रहे हैं।
वर्ष 2009-10 में हम 30-35 फीसदी की दर से वृद्धि की उम्मीद करते हैं। कई बैंक बीमा क्षेत्र में आ रहे हैं। इसी वजह से कई बीमा कंपनियां केवल कुछ बैंकों से ही संपर्क कर रही हैं।
बिक्री में कमी को रोकने के लिए आप कैसी कोशिश कर रहे हैं?
भारत के जीवन बीमा उद्योग में लंबे समय तक के लिए काफी गुंजाइश है। लेकिन हम अभी तक देश के नए खिलाड़ी हैं। हमारा लक्ष्य देश की सबसे बड़ी बीमर्ाकत्ता कंपनी बनना है जिसके पास बेहतर बिजनेस मॉडल हो और लंबे समय की तरक्की पर जोर हो।
क्या इंश्योरेंस कंपनियों को ब्रेक इवेन (लाभ-अलाभ की स्थिति) तक पहुंचने के लिए ज्यादा वक्त लगेगा?
पहली बात तो यह है कि वितरण में खर्च का ज्यादा हिस्सा लग जाता है। रियल एस्टेट की ऊंची कीमतों का भी इसमें एक खास योगदान है। मूल बिजनेस योजना में जो अनुमान लगाया गया था कीमतें उससे कहीं ज्यादा ऊंची थीं।
दूसरी वजह है वेतन, जिसमें परिचालन खर्च का 30-40 फीसदी हिस्सा लगता है। बेहतर प्रतिभा की कमी और काम के लिए बेहतर प्रतिभा के लिए वेतन में भी तेजी से बढ़ोतरी करनी होती है। तीसरी बात है कि लोगों ने जितनी उम्मीद की थी उस लिहाज से इंडस्ट्री का मार्जिन उतना ज्यादा नहीं रहा। साथ ही लोगों को रिन्यूअल प्रीमियम कम होने की उम्मीद भी नहीं थी।
रिन्यूअल को कैसे बढ़ाया जा सकता है और पॉलिसी खत्म होने की जरूरत को कैसे कम किया जा सकता है?
खास तौर पर जो चीजें ग्राहकों को बताई जाती है उस लिहाज से पारदर्शिता का स्तर ऊंचा हो सकता है। वित्तीय जानकारी का स्तर बढ़ाने का दायित्व जितना बीमा कंपनियों को है उतना ही ग्राहकों पर भी है।
नियामक यूलिप्स के लिए लॉक-इन अवधि बढ़ाकर तीन साल से पांच साल करना चाहती है। क्या इसका फायदा भी बीमा कंपनियों को मिलता है?
इससे कंपनियों को छोटे अवधि की स्कीम के तौर पर यूलिप्स बेचने से रोका जा सकता है। जब आप 20 सालों के लिए निवेश कर रहे हैं तब आप तीन या पांच सालों की परवाह नहीं करते।
जो लोग तीन सालों के लिए निवेश कर रहे हैं उन्हें म्युचुअल फंड ही खरीदना चाहिए। इस वक्त बाजार में निजी बीमर्ाकत्ता 80-90 फीसदी यूलिप बेचते हैं।