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होर्मुज स्ट्रेट हुआ बंद: ईरान के इस कदम से क्या भारत में पेट्रोल-डीजल के लिए मचेगा हाहाकार?

होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से वैश्विक तेल बाजार में हलचल मची हुई है, लेकिन भारत अपने मजबूत स्टॉक और रूसी तेल के भरोसे बड़ी राहत की उम्मीद कर रहा है

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बीएस वेब टीम   
Last Updated- March 01, 2026 | 3:02 PM IST

तेल आपूर्ति के मामले में भारत फिलहाल सुरक्षित है। अमेरिका और इजरायल के ईरान पर हमलों के बाद उसने ‘होर्मुज स्ट्रेट’ को बंद कर दिया है। यह दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल रास्ता है, जहां से वैश्विक स्तर पर करीब 20 फीसदी तेल और गैस गुजरता है। ईरान की सरकारी मीडिया ने 28 फरवरी को बताया कि जवाबी कार्रवाई में इस रास्ते को बंद कर दिया गया है। ईरान के रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स ने जहाजों को चेतावनी दी है कि कोई भी जहाज यहां से नहीं गुजर सकता।

लेकिन भारत के अधिकारी और एक्सपर्ट कहते हैं कि निकट भविष्य में तेल की कमी नहीं होगी। देश के पास कच्चे तेल का स्टॉक इतना है कि कम से कम 10 दिनों की जरूरत पूरी हो सकती है। इसके अलावा तैयार पेट्रोल, डीजल जैसे ईंधन का स्टॉक भी 5 से 7 दिनों या इससे ज्यादा का है। रिफाइनरियों के टैंकों में कच्चा तेल और ईंधन भरा पड़ा है। इसलिए अगर यह बंदी कुछ दिनों की रही तो भारत पर असर कम होगा।

होर्मुज पर भारत कितना निर्भर है?

भारत अपनी 88 फीसदी कच्चे तेल की जरूरत आयात करता है। इसमें से लगभग आधा हिस्सा, यानी 2.5 से 2.7 मिलियन बैरल प्रतिदिन, होर्मुज से होकर आता है। ये तेल मुख्य रूप से इराक, सऊदी अरब, UAE और कुवैत से आता है। इसी रास्ते से भारत का 60 फीसदी LNG (तरलीकृत प्राकृतिक गैस) और लगभग सारा LPG (रसोई गैस) भी आता है। कतर और UAE जैसे देशों से गैस इसी रास्ते से पहुंचती है।

अगर यह बंदी लंबी चली तो समस्या बढ़ सकती है। खासकर LPG और LNG पर असर पड़ सकता है क्योंकि इनके लिए लंबे अनुबंध होते हैं और स्पॉट मार्केट में ज्यादा विकल्प नहीं मिलते। लेकिन कच्चे तेल के लिए विकल्प ज्यादा हैं।

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अगर स्थिति बिगड़ी तो क्या विकल्प हैं?

अधिकारी बताते हैं कि लंबे समय तक बंदी हुई तो भारत अपनी खरीदारी बदल सकता है। रूस से तेल की खरीदारी बढ़ाई जा सकती है। पहले अमेरिकी दबाव में रूस से कम खरीदा गया था, लेकिन अब जरूरत पड़ने पर फिर से मॉस्को से खरीद सकते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि मध्य पूर्व से जहाज को भारत पहुंचने में 5 दिन लगते हैं, जबकि रूस से कम से कम एक महीना। इसलिए ऑर्डर पहले से प्लान करने पड़ेंगे।

इसके अलावा वेनेजुएला, ब्राजील और अफ्रीका जैसे देशों से भी तेल लिया जा सकता है। दुनिया में कुल मिलाकर पर्याप्त तेल है। साथ ही भारत के पास स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व भी हैं, जो एक हफ्ते की जरूरत पूरी कर सकते हैं।

तेल की कीमतों में उछाल और बाजार का हाल

इस घटना का सबसे तुरंत असर तेल की कीमतों पर पड़ रहा है। ब्रेंट क्रूड पिछले हफ्ते करीब सात महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गया, लगभग 73 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ। साल की शुरुआत से अब तक करीब 16 फीसदी की बढ़ोतरी हो चुकी है। ट्रेडर्स अगले हफ्ते और ज्यादा उतार-चढ़ाव की उम्मीद कर रहे हैं। कुछ मॉडल्स कहते हैं कि अगर आपूर्ति में दिक्कत हुई तो कीमत 80 डॉलर तक जा सकती है।

कुछ विश्लेषकों का कहना है कि कीमतों में बढ़ोतरी, फ्रेट और इंश्योरेंस की लागत बढ़ना सबसे बड़ा खतरा है। लेकिन लंबे समय तक पूरी तरह बंदी होने की संभावना कम है। केप्लर के एक्सपर्ट सुमित रितोलिया कहते हैं कि भारत की विविध स्रोतों से खरीदारी, रूस का विकल्प और स्टॉक के बफर से भौतिक कमी का खतरा कम है। मुख्य समस्या कीमतों में उतार-चढ़ाव और उसका आर्थिक असर होगा।

सरकार स्थिति पर नजर रख रही है और वैकल्पिक रास्ते तलाश रही है। फिलहाल कोई पैनिक नहीं है, लेकिन अगर तनाव बढ़ा तो गैस और LPG की कीमतें आसमान छू सकती हैं।

(एजेंसी के इनपुट के साथ)

First Published : March 1, 2026 | 2:53 PM IST