केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने कहा है कि केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) के वरिष्ठ अधिकारियों ने न केवल बेंगलूरु की औषधि कंपनी बायोकॉन बायोलॉजिक्स के प्रस्ताव को मंजूरी देने के लिए सांठगांठ की बल्कि विषय विशेषज्ञ समिति (एसईसी) की बैठक के मिनट्स से भी छेड़छाड़ की ताकि बायोकॉन बायोलॉजिक्स को गलत तरीके से लाभ पहुंचाया जा सके।
सीबीआई की एक टीम ने आज बायोकॉन बायोलॉजिक्स के सहायक उपाध्यक्ष एवं प्रमुख (राष्ट्रीय नियामकीय मामले) एल प्रवीण कुमार को भारत के संयुक्त औषधि महानियंत्रक ईश्वर रेड्डी के साथ गिरफ्तार कर लिया। बायोइनोवेट रिसर्च सर्विसेज की गुलजीत सेठी (उर्फ गुलजीत चौधरी) और सिनर्जी नेटवर्क के निदेशक दिनेश दुआ को भी सीडीएससीओ के सहायक औषधि निरीक्षक अनिमेश कुमार के साथ गिरफ्तार किया गया है। सेठी और दुआ पर दवा कंपनी की ओर से बिचौलिये का काम करने का आरोप है। सीबीआई सूत्रों ने बताया कि गिरफ्तार किए गए इन पांचों आरोपियों को आज दोपहर अदालत में पेश किया गया और एजेंसी उन्हें पुलिस हिरासत में भेजना चाहती है।
बायोकॉन बायोलॉजिक्स ने एक बयान में कहा, ‘हम भारत में अपनी एक दवा की मंजूरी प्रक्रिया के दौरान कंपनी और हमारे अधिकारियों पर लगाए गए रिश्वत देने के आरोप का पुरजोर खंडन करते हैं।’
सीबीआई ने आरोप लगाया है कि बायोकॉन बायोलॉजिक्स के लिए सरकारी नियामकीय कार्यों को देखने वाले सेठी ने रेड्डी को 9 लाख रुपये का रिश्वत देने के लिए प्रवीण कुमार एवं कुछ अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के साथ योजना बनाई। जांच एजेंसी ने कहा कि यह रिश्वत 18 मई को हुई एसईसी की बैठक में इंसुलिन एस्पार्ट इंजेक्शन के लिए तीसरे चरण के क्लीनिकल परीक्षण में छूट दिलाने के लिए दिया गया था।
इंसुलिन एस्पार्ट को यूरोपीय संघ में पहले ही मंजूरी मिल चुकी है। हालांकि विभिन्न देशों के औषधि नियामक किसी दवा को मंजूरी देते समय अन्य देशों के नियामकों द्वारा दी गई मंजूरियों पर गौर करते हैं लेकिन कई बार उन्हें स्थानीय क्लीनिकल परीक्षण के आंकड़ों की दरकार होती है। आमतौर पर स्थानीय परीक्षण के जरिये स्थानीय आबादी पर उस दवा की प्रभावकारिता को समझने की कोशिश की जाती है।
सीबीआई ने अपनी एफआईआर में कहहा है कि रेड्डी ने 18 मई को हुई एसईसी की बैठक में भाग लिया था और उन्होंने बायोकॉन बायोलॉजिक्स को परीक्षण से छूट दिए जाने की वकालत की थी। इतना ही नहीं रेड़्डी ने एसईसी की बैठक के मिनट्स में हेराफेरी करते हुए ‘डेटा’ की जगह ‘प्रोटोकॉल’ शब्द को जोड़ दिया था। इससे कंपनी को अनुचित लाभ हुआ।
वास्तव में सेठी कई दवा कंपनियों के बदले काम कर रहे थे और विभिन्न अवसरों पर दुआ के जरिये सीडीएससीओ के विभिन्न अधिकारियों को रिश्वत पहुंचाते थे। बायोकॉन के मामले में सेठी ने कुमार और सीडीएससीओ के कुछ अन्य अधिकारियों के साथ मिलकर 15 जून को आयोजित एसईसी की बैठक में बायोकॉन बायोलॉजिक्स के फाइल को शामिल करने की योजना बनाई थी। सीबीआई की एफआईआर में कहा गया है कि कुमार को रिश्वत के तौर पर 30,000 रुपये मिले।
‘दिशानिर्देशों पर आधारित है एसईसी की सिफारिश’
बायोकॉन बायोलॉजिक्स ने न केवल रिश्वत के आरोपों का खंडन किया है बल्कि यह भी कहा है कि इंसुलिन एस्पार्ट इंजेक्शन के लिए तीसरे चरण के क्लीनिकल परीक्षण से छूट का निर्णय भारतीय नियामकीय दिशानिर्देशों पर आधारित था। कंपनी ने कहा कि उसकी दवा को विज्ञान एवं क्लीनिकल आंकड़ों के आधार पर मंजूरी दी गई है। तीसरे चरण के क्लीनिकल परीक्षण से छूट का निर्णय सिमिलर बायोलॉजिक्स गाइडलाइंस 2016 और न्यू ड्रग्स ऐंड क्लीनिकल ट्रायल्स 2019 पर आधारित था।
कंपनी ने कहा, ‘यह दिशानिर्देश चौथे चरण के क्लीनिकल परीक्षण की प्रतिबद्धता के आधार पर भारत में तीसरे चरण के क्लीनिकल परीक्षण से छूट के लिए एक ढांचा प्रदान करता है। इसके लिए डिजाइन केंद्रीय लाइसेंसिंग प्राधिकरण से मंजूरी मिलनी चाहिए। उपरोक्त विनियमों के तहत बायोकॉन बायोलॉजिक्स ने भारत में तीसरे चरण के परीक्षण से छूट के साथ इंसुलिन एस्पार्ट के आयात एवं विपणन के लिए एक प्रस्ताव पेश किया था।’ कंपनी ने कहा कि उसने क्लीनिकल पूर्व एवं क्लीनिकल परीक्षण के आंकड़ों के साथ एक व्यापक प्रस्ताव प्रस्तुत किया था। विषय विशेषज्ञ समिति ने सीडीएससीओ में 18 मई को आयोजित अपनी बैठक में पाया कि बायोकॉन बायोलॉजिक्स ने इंसुलिन एस्पार्ट के लिए जर्मनी और अमेरिका में क्रमश: पहले और तीसरे चरण का क्लीनिकल परीक्षण किया है। कंपनी ने दावा कि वैश्विक परीक्षण के नतीजों के आधार पर कंपनी को ईएमए ऐंड हेल्थ कनाडा से भी विपणन मंजूरी मिल चुकी है। कंपनी ने कहा कि वह भ्रष्टाचार और रिश्वत के सभी कृत्यों की निंदा करती है और जांच एजेंसी के साथ सहयोग कर रही है।