गंगा एक्रोवूल्स के अंदर ऊन प्रसंस्करण मशीनों के पहिए लगातार घूम रहे हैं। पहिये घूमने की लयबद्ध गूंज पूरे कारखाने में सुनी जा सकती है। वहीं दूसरी तरफ महिला श्रमिक अपने-अपने स्थानों पर मुस्तैदी से खड़ी हैं और सावधानीपूर्वक अपशिष्ट रेशों को छान रही हैं और धागे की गुणवत्ता की जांच में जुटी हैं।
कंपनी के अध्यक्ष अमित थापर ने कहा,‘चार-पांच महीने बाद हम फिर से इस तरह की चहल-पहल देख रहे हैं। शुल्क कम घटकर 18 या 15 प्रतिशत होने के बाद हम जैसे निर्यातक और निर्माता बहुत उत्साहित हैं। हमने पहले ही अपने संयंत्र प्रबंधकों और प्रमुखों को बड़े ऑर्डर के लिए तैयार रहने के निर्देश दे दिए हैं।’ यह कंपनी पंजाब के लुधियाना जिले के खन्ना में कोट सेखों में ऐतिहासिक ग्रैंड ट्रंक रोड पर स्थित है।
लगभग 150 एकड़ से अधिक क्षेत्र में फैले इस कारखाने में 30-40 इमारतें हैं और इसमें 5,000 से अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं। यहां दिन-रात दो पालियों में काम चलता है। कंपनी नई इकाइयों के निर्माण की योजना बना रही थी मगर व्यापारिक व्यवधानों के कारण काम रोकना पड़ा। थापर ने कहा,‘निर्माण कार्य ने गति पकड़ ली है। हम कारखाना परिसर के अंदर रहने की जगह भी उपलब्ध कराते हैं और आने वाले वर्षों में इसकी गुंजाइश और बढ़ाने की योजना तैयार की जा रही है, खासकर विशेष रूप से महिलाओं के लिए ताकि वे भी रात्रि में काम कर पाएं।’ हालांकि थापर ने कहा कि कुछ चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। वह कहते हैं, ‘कई ग्राहकों को रियायती कीमतों की आदत हो चुकी है इसलिए पुरानी कीमतें बहाल करना आसान नहीं है।
इन पुरानी समस्याओं को सुलझाने के प्रयास अभी भी जारी हैं।’ उन्होंने आगे कहा कि शुल्कों के कारण पिछले पांच महीनों में किसी की छंटनी नहीं की गई मगर हालात नहीं बदलते तो कंपनी को कुछ कर्मचारियों की छंटनी करने पर विवश होना पड़ सकता था। थापर ने कहा, ‘हालांकि मुझे लगता है कि हम वर्ष 2026-27 में अपने सभी क्षेत्रों में लगभग 400 से 500 कर्मचारियों को नियुक्त करेंगे।’थापर ने यह भी कहा कि अमेरिका के शीर्ष न्यायालय द्वारा शुल्क को अवैध ठहराया जाना और दोनों देशों (भारत और अमेरिका) के बीच द्विपक्षीय समझौता दोनों ही राहत की बात हैं। उन्होंने कहा,‘जो ग्राहक
दूसरे स्रोतों की तलाश कर रहे थे वे अब लौट आएंगे और ऑर्डर सामान्य हो जाएंगे।’
उन्होंने कहा,‘समुद्र के रास्ते से माल ढुलाई दरें बढ़ना तय है और कच्चे माल की कीमतें पहले ही बढ़ने लगी हैं। यहां तक कि पैकिंग सामग्री भी महंगी हो गई है। अमेरिकी डॉलर के नए उच्च स्तर पर पहुंचने से स्थानीय कीमतों पर तत्काल प्रभाव पड़ना तय है।’
पश्चिम एशिया में चल रहा युद्ध उद्योग के लिए चिंता का विषय बना हुआ है जिससे वैश्विक परिदृश्य को लेकर अनिश्चितता बढ़ रही है। सैवी इंटरनैशनल में दूसरी पीढ़ी के उद्यमी मुकुल वर्मा ने कहा,‘वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव के कारण जहाज मार्गों, माल ढुलाई पर लागत और बीमा प्रीमियम से जुड़ी अनिश्चितताएं बढ़ गई हैं। हालांकि, आपूर्ति श्रृंखलाएं अभी तक गंभीर रूप से बाधित नहीं हुई हैं मगर अंतरराष्ट्रीय बाजारों में समय पर आपूर्ति पर निर्भर निर्यातकों के लिए लॉजिस्टिक पर लागत और पारगमन समय में अनिश्चितता चिंता का विषय बन रही है।’ वर्मा के पिता ने 1978 में यह कंपनी शुरू की थी।
कारखाने के गेट के बाहर ट्रकों की एक कतार ताजा कच्चे माल उतारने के लिए इंतजार कर रही थी जबकि अंदर कामगार आगे की प्रक्रिया के लिए लंबी, रंगीन चादरें तैयार करने में जुटे थे। लगभग 10 किलोमीटर दूर स्थित एक अन्य कपड़ा इकाई -शिंगोरा टेक्सटाइल्स में भी ऐसी ही गतिविधि दिखाई दे रही थी। भारतीय उद्योग परिसंघ पंजाब राज्य परिषद के अध्यक्ष एवं शिंगोरा टेक्सटाइल्स के प्रबंध निदेशक अमित जैन ने कहा कि शुल्कों में कमी से बाजार को फिर से पटरी पर लाने में मदद मिलेगी मगर ग्राहकों को वापस लाना एक चुनौती बनी हुई है।
हालांकि, श्रमिकों की दिनचर्या जरूर बदल गई। कारखाने में काम करने वाले वर्षीय राजेश कुमार (बदला हुआ नाम) ने कहा,‘हमारी नौकरियां तो नहीं गईं मगर हमें अतिरिक्त काम के बदले कोई पारिश्रमिक नहीं मिल रहा है। इससे हमें अतिरिक्त आय हो जाया करती थी।’