प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
भारतीय दवा क्षेत्र में अब एआई के योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह तेजी से इस बात का केंद्र बनता जा रहा है कि दवाएं कैसे खोजी जाएंगी, बनाई और आपूर्ति की जाएंगी। इस बदलाव के साथ नवाचार पर ज्यादा ध्यान और गुणवत्ता तथा भरोसे पर अधिक जोर दिया जा रहा है। उद्योग के दिग्गजों का कहना है कि कंपनियां अभी जो विकल्प चुनेंगी, उसी से तय होगा कि भारतीय फार्मा कम लागत वाला निर्माण आधार बना रहेगा या वर्ष 2047 तक वैश्विक नवाचार की ताकत बन जाएगा।
यह संदेश इंडियन फार्मास्युटिकल अलायंस के 11वें ग्लोबल फार्मास्युटिकल क्वालिटी समिट में स्पष्ट तौर पर सामने आया। सम्मेलन में आला अधिकारियों ने इस बारे में खुलकर बात की कि प्रौद्योगिकी से दवा क्षेत्र में किस तरह से बड़े बदलाव की जरूरत है।
जाइडस लाइफसाइंसेज के प्रबंध निदेशक और आईपीए के अध्यक्ष शरविल पटेल ने एआई को भविष्य की रूपरेखा के केंद्र में रखा। उन्होंने कहा, ‘एआई पायलट की तरह नहीं चल सकता। पायलट महंगे डेमो बन जाते हैं।’ उन्होंने आगाह किया कि हो सकता है कि दवा बनाने के क्षेत्र में अकेले पारंपरिक फार्मा कंपनियां ही न हों। तकनीकी कंपनियां तेजी से आगे बढ़ सकती हैं क्योंकि उनके पास डेटा औऱ डिजिटल सिस्टम दोनों ही हैं।
सन फार्मास्युटिकल इंडस्ट्रीज के कार्यकारी चेयरमैन दिलीप सांघवी ने कहा कि उद्योग ने दवा निर्माण में अपनी ताकत पहले ही साबित कर दी है। भारतीय कंपनियां अब वैश्विक जेनेरिक्स का बड़ा हिस्सा आपूर्ति करती हैं और ग्राहकों का भरोसा लगातार बढ़ा है। उन्होंने कहा कि अगली चुनौती नवाचार है।
अरबिंदो के पूर्णकालिक निदेशक मदन मोहन रेड्डी ने कहा कि वैश्विक भरोसा (खासकर नियामकों का) लगातार कमाना पड़ता है।