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होरमुज पर खतरे के बीच भारत के पास सिर्फ 74 दिन का स्टॉक, लेकिन अगर संकट लंबा चला तो क्या होगा?

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स्ट्रेट ऑफ होरमुज से गुजरती है 20.5 मिलियन बैरल रोजाना सप्लाई; भारत की ऊर्जा जरूरतों पर बढ़ा खतरा, ब्रेंट में 10 डॉलर तक उछाल की आशंका

Last Updated- March 02, 2026 | 10:52 AM IST
Strait of Hormuz crisis

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर अब तेल बाजार पर साफ दिखने लगा है। मामला सिर्फ इस बात का नहीं है कि Strait of Hormuz खुला है या बंद। स्थिति इससे ज्यादा जटिल है। रास्ता अभी तकनीकी रूप से खुला है, लेकिन तेल की आवाजाही पर तीन तरह का दबाव है। जहाजों की व्यवस्था में दिक्कत, बीमा से जुड़ी परेशानी और पैसों की कमी ने माहौल मुश्किल बना दिया है। कई बड़े टैंकर मालिक और तेल कंपनियां एहतियात के तौर पर अपने जहाज खाड़ी क्षेत्र में ही रोके हुए हैं। कुछ जहाजों को रेडियो पर ऐसे संदेश भी मिल रहे हैं जिनमें कहा जा रहा है कि रास्ता बंद है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं है। इन हालात में बाजार में अनिश्चितता और डर का माहौल बना हुआ है।

कितनी सप्लाई दांव पर

Strait of Hormuz दुनिया के लिए तेल सप्लाई का सबसे अहम रास्ता है। हर दिन करीब 20.5 मिलियन बैरल तेल और दूसरे पेट्रोलियम उत्पाद इसी रास्ते से गुजरते हैं। कुछ पाइपलाइनें दूसरे रास्ते के तौर पर मौजूद हैं, लेकिन वे सिर्फ करीब 6.5 मिलियन बैरल तेल ही संभाल सकती हैं। अगर यह समुद्री रास्ता रुक जाता है, तो बड़ी मात्रा में तेल खाड़ी इलाके में ही अटक सकता है। यही वजह है कि बाजार में चिंता बढ़ रही है।

ब्रेंट में नई छलांग की आशंका

चॉइस ब्रोकरेज का मानना है कि मौजूदा हालात में ब्रेंट कच्चा तेल 10 डॉलर प्रति बैरल तक और उछल सकता है। यह तेजी मांग के कारण नहीं बल्कि सप्लाई में झटके की वजह से होगी। अगर संकट लंबा खिंचता है तो कीमतों में और उबाल आ सकता है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया की करीब 20 प्रतिशत एलएनजी कतर से आती है और इसका कोई आसान दूसरा रास्ता नहीं है। अगर कतर से गैस की सप्लाई रुक जाती है, तो यूरोप और एशिया के बिजली घर गैस की जगह डीजल और फ्यूल ऑयल का इस्तेमाल बढ़ा सकते हैं। ऐसे में डीजल की मांग तेजी से बढ़ेगी और उसकी कीमतें कच्चे तेल से भी ज्यादा तेजी से चढ़ सकती हैं।

यह भी पढ़ें: जंग के बीच कच्चा तेल 1 डॉलर महंगा होने पर, कितने बढ़ेंगे पेट्रोल-डीजल के दाम? समझिए कैलकुलेशन

ओपेक प्लस की अतिरिक्त क्षमता कितनी कारगर

अक्सर कहा जाता है कि ओपेक प्लस के पास रोजाना 5 से 6 मिलियन बैरल अतिरिक्त तेल उत्पादन की क्षमता है, जो किसी भी संकट में काम आ सकती है। लेकिन रिपोर्ट का कहना है कि यह आंकड़ा जितना बड़ा दिखता है, जमीन पर उतना आसान नहीं है। असल में तुरंत बढ़ाई जा सकने वाली अतिरिक्त सप्लाई सीमित है और इसका बड़ा हिस्सा सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के पास है। दोनों देश खाड़ी इलाके में ही हैं। अगर Strait of Hormuz में रुकावट आती है, तो सबसे ज्यादा असर इन्हीं पर पड़ेगा। ऐसे में जिस अतिरिक्त सप्लाई को सुरक्षा कवच माना जाता है, वह संकट के समय उतनी भरोसेमंद साबित नहीं हो सकती।

भारत के लिए बढ़ता जोखिम

भारत की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री रास्ते से पूरा होता है। एलपीजी, एलएनजी और कच्चे तेल के आयात में होरमुज की हिस्सेदारी काफी ज्यादा है। अगर संकट और गहराता है, तो भारत को जरूरत पूरी करने के लिए महंगे अंतरराष्ट्रीय बाजार से गैस खरीदनी पड़ सकती है। इसका सीधा असर महंगाई और देश के चालू खाते पर पड़ सकता है। सरकार के मुताबिक, रणनीतिक भंडार, रिफाइनरियों और समुद्री स्टॉक को मिलाकर देश के पास करीब 74 दिनों की जरूरत के बराबर कच्चे तेल का स्टॉक है। लेकिन अगर तनाव लंबा खिंचता है, तो यह भंडार भी दबाव में आ सकता है। चॉइस ब्रोकरेज का कहना है कि तेल बाजार ऊपर से भले शांत दिखे, लेकिन अंदर हालात अस्थिर हैं। अतिरिक्त उत्पादन क्षमता को पूरी तरह सुरक्षित सहारा मानना इस समय जोखिम भरा हो सकता है।

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First Published - March 2, 2026 | 9:51 AM IST

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