भारत का दवा निर्माण आधार दुनिया भर के दूसरे देशों के मुकाबले गुणवत्ता के मामले में अंतर धीरे-धीरे कम कर रहा है। कुछ क्षेत्रों में तो भारतीय दवा निर्माण वैश्विक बाजार की तुलना में आगे भी बढ़ रहा है। पिछले 10 साल में अमेरिकी खाद्य एवं दवा प्रशासन (यूएसएफडीए) के निरीक्षण आंकड़ों से बड़े बदलाव का पता चलता है। इसमें जाहिर होता है कि वैश्विक फार्मा में कम ऑडिट के बावजूद जांच के नतीजे और खराब निकले हैं। दूसरी तरफ, भारतीय संयंत्रों के बारे में विपरीत निष्कर्षों की संख्या कम रही है। ये आंकड़े बड़ा बदलाव बताते हैं।
2015 और 2025 के बीच भारतीय दवा संयंत्रों के लिए ऑफिशियल ऐक्शन इंडिकेटेड (ओएआई) परिणामों का हिस्सा 12 फीसदी से घटकर 8 प्रतिशत रह गया, जबकि इंस्पेक्शन लगभग-जीरो-नोटिस में बदल गए। इंडियन फार्मास्युटिकल अलायंस (आईपीए) के आंकड़ों के मुताबिक इसी समय में वैश्विक फार्मा में ओएआई दर 9 फीसदी से बढ़कर 13 फीसदी हो गई। यह फर्क इसलिए मायने रखता है क्योंकि आज निरीक्षण एक दशक पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा सख्त हैं।
ओएआई का परिणाम गंभीर उल्लंघन का संकेत होता है जिसके लिए चेतावनी पत्र या इंपोर्ट अलर्ट जैसी कार्रवाई की जरूरत होती है। वॉलंटरी एक्शन इंडिकेटेड परिणाम उन कमियों को दिखाता है जिनके लिए तुरंत कार्रवाई किए बिना सुधार के कदम उठाने की जरूरत होती है, जबकि नो एक्शन इंडिकेटेड नतीजा पूरी अनुपालना का संकेत देता है।
आईपीए के महासचिव सुदर्शन जैन कहते हैं, उद्योग को ‘हर समय तैयार’ रहने की सोच अपनानी पड़ी है। उन्होंने कहा, ‘आजकल ज्यादातर मुआयने बिना बताए या सिर्फ एक या दो दिन के नोटिस पर होते हैं। उम्मीद की जाती है कि इकाइयां 24 घंटे जांच के लिए तैयार रहेंगी। अब यह दुनिया भर में आम बात है।’
यह तैयारी सोच-समझकर की गई है। कई वर्षों में आईपीए ने उद्योग को जांच-केंद्रित अनुपालन से हटाकर जोखिम-आधारित, सिस्टम-संचालित गुणवत्ता दृष्टिकोण की राह पर आगे बढ़ाने पर जोर दिया है। इंस्पेक्शन डेटा से पता चला है कि पारंपरिक समस्या वाले क्षेत्रों में बार-बार होने वाले ऑब्जर्वेशन में कमी आई है, जिससे बॉक्स-टिकिंग के बजाय संस्थागत लर्निंग का संकेत मिलता है। भारत करीब 200 से ज्यादा देशों को दवाओं की आपूर्ति करता है। भारत से दवा निर्यात लगभग 30 अरब डॉलर का है, जो अमेरिका, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका तक जाता है।