अप्रैल में अपने निचले स्तर के बाद इंटरग्लोब एविएशन (इंडिगो) और स्पाइसजेट के शेयरों में 18 से 32 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है। विमानन शेयरों में सुधार को मुख्य तौर पर हवाई यात्रियों की संख्या में सुधार और क्षमता विस्तार एवं किराये में वृद्धि की उम्मीदों से बल मिला।
सरकार ने घरेलू किराये में अप्रैल में 5 फीसदी (निचले बैंड में) और जून में जून में 13 से 15 फीसदी की बढ़ोतरी की थी। उसके बाद इस साल फरवरी में ऊपरी और निचले बैंड के किराये में 10 से 30 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। विमानन ईंधन की कीमत में बढ़ोतरी के मद्देनजर हवाई किराये में यह बढ़ोतरी की गई। वित्त वर्ष 2022 की पहली तिमाही के दौरान विमान ईंधन में सालाना आधार पर 81 फीसदी की वृद्धि हुई जबकि तिमाही आधार पर 12 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई। जबकि इस दौरान ब्रेंट क्रूड की कीमतों में तिमाही आधार पर 13 फीसदी की वृद्धि हुई।
सेंट्रम रिसर्च के आशिष शाह और वैभव शाह का मानना है कि हवाई यात्रियों की आवाजाही में गिरावट और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के मद्देनजर किराये में की गई बढ़ोतरी से विमानन कंपनियों को तत्काल राहत मिलेगी। उन्होंने उम्मीद जताई कि जून तिमाही (वित्त वर्ष 2022 की पहली तिमाही) में इंडिगो और स्पाइसजेट के टिकट प्रतिफल में क्रमिक आधार पर 7 फीसदी की वृद्धि होगी।
विमानन शेयरों को हवाई यातायात में वृद्धि से भी बल मिलेगा। औसत दैनिक यात्री यातायात मई में 63,000 यात्रियों के अपने निचले स्तर से दोगुना से अधिक वृद्धि के साथ 10 जुलाई को समाप्त सप्ताह के दौरान 1,50,000 यात्रियों तक पहुंच गया। इसी प्रकार, विमानों के दैनिक प्रस्थान की संख्या और प्रति उड़ान यात्रियों की संख्या में भी मई के निचले स्तर के मुकाबले 50 से 67 फीसदी की वृद्धि हो चुकी है। विमानन कंपनियों को नागर विमानन मंत्रालय के उस निर्णय से सबसे अधिक फायदा हुआ जिसके तहत उड़ान क्षमता को 5 जुलाई से कोविड-पूर्व स्तर के मुकाबले 50 फीसदी से बढ़ाकर 65 फीसदी कर दिया गया है।
छुट्टियां बिताने के लिए लोगों का रुख अंतरराष्ट्रीय बाजार के बजाय घरेलू बाजार की ओर होने से भी घरेलू विमानन कंपनियों को मदद मिल सकती है। कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज के आदित्य मोंगिया और टीना विरमानी ने कहा, ‘यदि अंतरराष्ट्रीय यात्री अपनी अंतरराष्ट्रीय यात्रा के बदले घरेलू यात्रा की ओर रुख करेंगे तो भारतीय विमानन कंपनियों की मांग में जबरदस्त सुधार दिख सकता है, जैसा कि चीन के मामले में हुआ है। भारतीय विमानन कंपनियों में इंडिगो लगातार अपनी क्षमता बढ़ा रही है और इसलिए इस अदला-बदली में उसकी बेहतर हिस्सेदारी हो सकती है।’ जनवरी और फरवरी के दौरान इस बदलाव को देखते हुए पर्यटन स्थलों के लिए चुनिंदा हवाई अड्डों (जम्मू, चंडीगढ़ आदि) पर मांग कोविड-पूर्व स्तर को पार कर गई।
दूसरी ओर, विमानन क्षेत्र को कच्चे तेल कीमतों में तेजी और रुपये में नरमी जैसी तमाम चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। कच्चे तेल की कीमत मार्च में 60 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में थी जो करीब 25 फीसदी बढ़कर 75 डॉलर प्रति बैरल के आसपास है। इसी प्रकार मई के अंत से अब तक रुपये में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 3 फीसदी की गिरावट आ चुकी है।
हालांकि कच्चे तेल की कीमतों में तेजी विमानन कंपनियों की लागत का एकमात्र सबसे बड़ा बोझ है, लेकिन रुपये में कमजोरी से उसकी रखरखाव लागत और पट्टा लागत में भी इजाफा होगा। इस प्रकार वॉल्यूम में सुधार के बावजूद परिचालन लाभ के मोर्चे पर नुकसान जारी रह सकता है। विश्लेषकों ने उम्मीद जताई है कि वॉल्यूम चालू वित्त वर्ष के अंत तक ही फरवरी 2021 के स्तर तक पहुंच पाएगा।
बहरहाल, तमाम चुनौतियों के मद्देनजर निवेशकों को फिलहाल विमानन शेयरों में दांव लगाने से तब तक बचना चाहिए जब तक उन्हें मूल्य निर्धारण की ताकत, लागत में गिरावट और स्थिर लाभप्रदता का स्पष्ट तौर पर संकेत न मिल जाए।