भारतीय जहाज मालिकों ने केंद्र सरकार से नौवहन आरक्षण नीति बनाने की मांग की है। साथ ही नए जहाज खरीदने के वास्ते धन जुटाने के लिए जहाजरानी उद्योग को आधारभूत उद्योग का दर्जा देने की मांग की है।
इनका कहना है कि 1980 के दशक में देश में जहाजों से जहां 40 फीसदी माल ढुलाई होती थी, वहीं अब यह गिरकर महज 12 से 13 फीसदी रह गई है। यही नहीं पुराने जहाजों के चलते इसमें और गिरावट की आशंका जताई गई है।
भारतीय मैरिटाइम सम्मेलन-2009 के मौके पर वरुण शिपिंग कंपनी लिमिटेड के उपाध्यक्ष और प्रबंध निदेशक युद्धिष्ठिर खटाऊ ने बिानेस स्टैंडर्ड को बताया कि पुराने जहाजों के चलते अगले दो-तीन साल में भारतीय बेड़े में 45 फीसदी की कमी हो जाएगी।
उनके मुताबिक, भारतीय जहाजों की औसत आयु 18 साल की होती है। ऐसे में इन जहाजों को बदलना जरूरी है, पर भारतीय जहाज मालिक धन की कमी के चलते ऐसा कर पाने में अक्षम हैं।
खटाऊ ने बताया कि समुद्री कारोबार में भारतीय जहाजों की मौजूदा 13 फीसदी की भागदारी को भी बनाए रखने के लिए 20 अरब डॉलर की जरूरत है। इनमें से 4-5 अरब डॉलर पूंजी और 16 अरब डॉलर कर्ज के जरिए जुटाया जाना है।
इस बीच आर्थिक मंदी के चलते यूरोपीय और दक्षिण-पूर्व एशियाई बैंकरों ने निवेश करने से मना कर दिया है। जहाज मालिकों का कहना है कि मौजूदा स्थिति में धन का जुगाड़ तभी संभव है, जब सरकारी सहायता मिले। सरकार से इन लोगों ने जहाजरानी उद्योग को आधारभूत उद्योग का दर्जा देने की मांग की है।
उनके मुताबिक, ऐसा होने पर धन का इंतजाम हो जाएगा। इस बीच इंडियन नैशनल शिप ऑनर्स एसोसिएशन (इन्सा) ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा है। इसमें नौवहन आरक्षण नीति बनाने की मांग की गई है।
उनके मुताबिक, सरकार समुद्र से होने वाली ढुलाई में भारतीय जहाजों की एक निश्चित हिस्सेदारी सुनिश्चत किया जाना चाहिए। जहाज मालिकों के मुताबिक, अगले दो-तीन साल में करीब 45 फीसदी पुराने जहाज काम करना बंद कर देंगे।