सरकार के अनुमानों के मुताबिक भारत इलेक्ट्रिक वाहन की क्रांति को रफ्तार देने के लिए 145 गीगावाट आवर्स (जीडब्ल्यूएच) उन्नत रसायन सेल बैटरी भंडारण क्षमता बनाएगा। इसके लिए करीब 15 अरब डॉलर के निवेश की जरूरत होगी।
यह क्षमता उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना के लिए पात्र कंपनियां और अन्य निजी कंपनियां बनाएंगी। पीएलआई के लिए पात्र कंपनियों के 50 गीगावाट आवर्स एडवांस्ड बैटरी स्टोरेज बनाने के आसार हैं। अन्य कंपनियां अगले चार से पांच साल में 95 गीगावाट आवर्स क्षमता की स्थापना का वादा किया है। बर्नस्टीन के अनुमानों के मुताबिक वर्ष 2030 तक दुनिया भर में 2,300 गीगावाट आवर्स बैटरी ऊर्जा की जरूरत होगी।
भारत में कंपनियां जितनी क्षमता की स्थापना करना चाह रही हैं, वह बहुत अधिक नहीं है। अब तक सबसे अधिक क्षमता की योजना पीएलआई के तहत बनाई गई है, जिसमें ओला इलेक्ट्रिक ने 20 गीगावाट आवर्स बैटरी पावर की प्रतिबद्धता जताई है।
पीएलआई योजना के बाहर भी बहुत सी कंपनियां हैं। उदाहरण के लिए अमर राजा ने 1 अरब डॉलर निवेश की योजना बनाई है। गोडी इंडिया को अपनी स्वदेशी तकनीक आधारित लीथियम आयन सेल के लिए भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) से प्रमाणन मिला है। यह एक बड़ा विनिर्माण संयंत्र स्थापित करने पर काम कर रही है। एक्साइड ने तकनीक के लिए कथित रूप से चीन की स्वोल्ट के साथ करार किया है। यह एक संयंत्र में 6,000 करोड़ रुपये के निवेश की योजना बना रही है। कंपनी के संयंत्र का पहले चरण की क्षमता 6 गीगावाट आवर्स होगी।
बैटरियों के लिए उन्नत रसायन सेलों का विनिर्माण इतना महत्त्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि ये वाहन उद्योग के आईसीई से इलेक्ट्रिक बनने में सबसे बड़ी बाधा हैं। भारत में सेलों का करीब-करीब आयात ही होता है, जिनसे मौजूदा लीथियम आयन बैटरियां बनाई जाती हैं। इन बैटरियों की भारी भारी मांग और कारोबार में दबदबा रखने वाले चीन के हाल में कथित रूप से जमाखोरी करने से इनकी कीमतें आसमान में पहुंच गई हैं।
समस्या यह है कि 80 फीसदी सेल उत्पादन क्षमता पर चीन का नियंत्रण है और उद्योग के अनुमान संकेत देते हैं कि एक दशक बाद भी यह 70 फीसदी होगी। अन्य छोटे आपूर्तिकर्ताओं में कोरिया और जापान शामिल हैं।
वाहन की लागत में 40 से 60 फीसदी हिस्सा लीथियम बैटरी का होता है, जो वाहन पर निर्भर करता है। बैटरी की लागत में 70 फीसदी हिस्सा सेल का है। ओला इलेक्ट्रिक के एक अधिकारी ने कहा कि भारत में सेल का विनिर्माण शुरू होने के बाद उनकी कीमत आधी हो जाएगी। इससे इलेक्ट्रिक स्कूटर के उत्पादन की कुल लागत घट जाएगी।
इलेक्ट्रिक वाहन विनिर्माताओं का कहना है कि अगर देश में वास्तविक बैटरी क्षमता की स्थापना 100 गीगावाट आवर्स भी रहती है तो यह 2.5 करोड़ स्कूटरों (4 किलोवाट आवर्स की औसत बैटरी पावर) के लिए पर्याप्त होगी। इस समय भारत हर साल 70 से 80 लाख पेट्रोल इंजन आधारित (आईसीई) स्कूटरों की बिक्री करता है, जिनकी जगह पूरी तरह इलेक्ट्रिक मॉडल ले सकते हैं।
अगर हम इलेक्ट्रिक दोपहिया (स्कूटर और मोटरबाइक में औसतन 5 किलोवाट की बैटरी लगती है) पर विचार करते हैं तो यह बैटरी क्षमता दो करोड़ दोपहिया के लिए पर्याप्त होगी। दोपहिया की सालाना बिक्री भी इतन ही है। कारों में बैटरी की क्षमता 15 किलोवाट से लेकर 70 किलोवाट या उससे अधिक होती है। इसलिए इस बैटरी क्षमता कितनी कारों के लिए पर्याप्त होगी, यह अनुमान लगाना मुश्किल है।
सरकार तीन कंपनियों- ओला, रिलायंस और राजेश एक्सपोर्ट्स के लिए पीएलआई योजना के तहत 18,100 करोड़ रुपये की राशि रखी है। सरकार ने इन कंपनियों के साथ बड़ी बैटरी फैक्टरी बनाने के लिए करार किए हैं।
कंपनियों को प्रोत्साहन हासिल करने के लिए दो साल के भीतर फैक्टरियां बनानी होंगी। हालांकि इस समय चुनौती बैटरी विनिर्माण के लिए स्वदेशी तकनीक बनाना है। इसरो ने गैर-विशेष आधार पर कंपनियों को इलेक्ट्रिक वाहनों में इस्तेमाल के लिए अपनी अंतरिक्ष ग्रेड की लीथियम आयन तकनीक हस्तांतरित कराने का करार किया है।