-नए नियम लागू हुए तो डिजिटल क्षेत्र के विलय सौदे आएंगे इसके दायरे में
– ज्यादा स्पष्टता के लिए संबंधित उत्पाद बाजार, समूह, नियंत्रण, उद्यम आदि की परिभाषा में होगा बदलाव
– विलय सौदों की मंजूरी के लिए समय सीमा घटाकर 150 दिन करने का प्रस्ताव
– एनसीएलटी में अपील के लिए सीसीआई द्वारा लगाए गए जुर्माने का 25 फीसदी करना होगा जमा
देश में होने वाला कोई विलय एवं अधिग्रहण सौदा 2,000 करोड़ रुपये से अधिक कीमत का है और उस कंपनी का भारत में अच्छा-खासा कारोबार हो तो सौदे के लिए नियामक की मंजूरी लेनी होगी।
योजना की जानकारी रखने वाले दो व्यक्तियों ने बताया कि सरकार भारतीय प्रतिस्पर्द्धा आयोग (सीसीआई) को विलय और अधिग्रहण सौदों की जानकारी देते समय सौदे की कीमत को भी पैमाना बना सकती है। इसके तहत अगर किसी अधिग्रहण में उद्यम का मूल्य, नियंत्रण अधिकार, शेयर, मतदान का अधिकार या उद्यम की संपत्ति का मूल्य 2,000 करोड़ रुपये से अधिक है तो सीसीआई की मंजूरी लेनी ही होगी।
समझा जाता है कि नई शर्त दो दशक पुराने प्रतिस्पर्धा कानून में प्रस्तावित संशोधन का हिस्सा होगी। यह संशोधन संसद के मौजूदा मॉनसून सत्र में पेश किया जा सकता है। अभी तक विलय और अधिग्रहण करने वाली कंपनियों को प्रतिस्पर्धा कानून में दिए गए निर्दिष्ट संपत्ति आकार और कारोबार के हिसाब से सीसीआई की मंजूरी लेनी होती है। लेकिन अब सौदे के मूल्य को भी इसमें नया पैमाना बनाने का प्रस्ताव है।
यह संशोधन मंजूर हो गया तो डिजिटल अर्थव्यवस्था में विलय के सौदे भी इसके दायरे में आ सकते हैं, जो कम संपत्ति और कारोबार के कारण आम तौर पर सीसीआई की जद से बाहर रह जाते हैं। फेसबुक-व्हाट्सऐप विलय, फेसबुक-इंस्टाग्राम, माइक्रोसॉप्ट-लिंक्डइन जैसे कई डिजिटल सौदे मौजूदा कानून के कारण सीसीआई जांच से बच गए थे।
सराफ ऐंड पार्टनर्स में प्रतिस्पर्धा और डेटा सुरक्षा- पार्टनर अक्षय एस नंदा ने कहा, ‘यह सबसे महत्त्वपूर्ण प्रस्ताव है क्योंकि डिजिटल क्षेत्र में विलय एवं अधिग्रहण की सूचना भी सीसीआई को देनी होगी। आम तौर पर इस क्षेत्र के सौदे सीसीआई की जांच से बच जाते हैं क्योंकि उनकी संपत्ति का मूल्य और कारोबार मौजूदा कानून के हिसाब से कम होते हैं।’
नंदा ने कहा कि सौदा करने वाली कंपनी का भारत में अच्छा-खासा कारोबार हुआ तो नया नियम लागू हो जाएगा। अच्छा खासा परिचालन का निर्णय सीसीआई द्वारा नियमन के जरिये तय किया जाएगा। सीसीआई नियमन के जरिये तय करेगी कि कितना कारोबार अच्छा-खासा माना जाएगा।
इसके साथ ही सरकार गैर-प्रतिस्पर्द्धी समझौते के दायरे का भी विस्तार कर सकती है और इसमें इस तरह के सौदे कराने वाले को भी शामिल किया जाएगा। इस तरह सांठगांठ कराने वाली तीसरे पक्ष की इकाइयों पर भी प्रतिस्पर्द्धा कानून के तहत जुर्माना लगाया जा सकता है।
प्रतिस्पर्द्धा दो तरह से – प्रतिस्पर्धियों के बीच और विभिन्न स्तर के उत्पादन और वितरण श्रृंखला वाले उद्यमों के बीच गैर-प्रतिस्पर्धी समझौतों को रोकता है। कानून में समान तरह के कारोबार से जुड़ी सांठगांठ के लिए जुर्माना लगाने का कोई प्रावधान नहीं है।
जेएसए में पार्टनर और प्रतिस्पर्धा कानून प्रैक्टिस के प्रमुख वैभव चोकसी ने कहा कि जिन मामलों में सांठगांठ नहीं होती है जैसे दबदबे का फायदा उठाने या किसी को दबाने के मामले में नरमी बरती जा सकती है।
सरकार विलय सौदों को मंजूरी देने की समयसीमा मौजूदा 210 दिन से घटाकर 150 दिन करने का भी प्रस्ताव कर सकती है। इसी तरह कंपनियों द्वारा सीसीआई के पास सौदे को अधिसूचित करने के लिए समयसीमा मौजूदा 30 दिन से घटाकर 20 दिन की जाएगी।
जांच के दायरे वाले पक्षों के लिए निपटान और प्रतिबद्धता प्रावधानों में भी कुछ बदलाव किए जा सकते हैं। संबंधित पक्ष सीसीआई के पास मामले के निपटान या गैर-प्रतिस्पर्द्धी मामला हल करने की प्रतिबद्धता जता सकते हैं और जांच बंद करा सकते हैं।
इसके अलावा एनसीएलएटी जैसे अपील पंचाट के समक्ष अपील करने के लिए सीसीआई द्वारा लगाए गए जुर्माने का 25 फीसदी जमा कराना होगा। केंद्र सरकार यह भी कह सकती है कि सीसीआई सौदा पूरा होने के तीन साल बाद किसी तरह की सूचना या संदर्भ पर ध्यान नहीं देगा। हालांकि सीसीआई अगर संबंधित पक्ष द्वारा बताए गए कारण से संतुष्ट होता है तो वह देरी को मंजूरी दे सकता है। इसके साथ ही सीसीआई के समक्ष गलत जानकारी देने की स्थिति में जुर्माना मौजूदा 1 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 5 करोड़ रुपये किया जा सकता है।