वैश्विक रूप से ‘चाइना प्लस वन’ रणनीति से समर्थन मिलने से भारत का कपड़ा निर्यात कोविड-19 के पहले के 2019 में हुए 36 अरब डॉलर निर्यात से 2026 तक 81 प्रतिशत बढ़कर 65 अरब डॉलर होने की संभावना है। भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) और वैश्विक सलाहकार फर्म कर्नी की रिपोर्ट में यह सामने आया है। इस बढ़ोतरी से 75 लाख से 1 करोड़ नई नौकरियों के सृजन की संभावना है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस लक्षित बढ़ोतरी का बड़ा हिस्सा या करीब 16 अरब डॉलर चाइना प्लस वन धारणा से आ सकता है क्योंकि वियतनाम या बांग्लादेश की तुलना में भारत की रणनीति मजबूत है।
कर्नी के पार्टनर सिद्धार्थ जैन ने कहा, ‘हमारा मानना है कि उद्योग के दिग्गजों की ओर से सही कार्रवाई और सरकारी योजनाओं को तेजी से लागू करने पर भारत 2026 तक निर्यात के 65 अरब डॉलर के लक्ष्य (9-10 प्रतिशत सालाना चक्रवृद्धि वृद्धि दर से) तक पहुंच सकता है। घरेलू खपत में वृद्धि को मिलाकर देखें तो इससे घरेलू उत्पादन 160 अरब डॉलर तक पहुंचेगा।’
एक प्रमुख क्षेत्र, जहां वृद्धि की संभावना है, उसमें फैब्रिक्स शामिल है। क्षेत्रीय फैब्रिक हब के रूप में विकसित होकर भारत ने इस क्षेत्र में 4 अरब डॉलर वृद्धि का लक्ष्य रखा है। इसकी शुरुआत कपास की बुनाई से होगी और उसके बाद इसका विस्तार अन्य उपश्रेणियों में होगा।
घरेलू टेक्सटाइल में भी कारोबार 4 अरब डॉलर बढ़ाने का लक्ष्य है, जिसमें वैश्विक उपभोक्ता आधार बढ़ाया जाना शामिल है। मानव निर्मित फाइबर और धागा के कारोबार में 2.5 अरब डॉलर से 3 अरब डॉलर की वृद्धि की उम्मीद है। वहीं दूसरी ओर टेक्निकल टेक्सटाइल में करीब 2 अरब डॉलर के उछाल का लक्ष्य है।
कर्न में लाइफस्टाइल प्रैक्सिस के एपीएसी प्रमुख और पार्टनर नीलेश हुंडेकरी ने कहा, ‘कोविड-19 से वैश्विक कारोबार की हिस्सेदारी का पुनर्वितरण हो रहा है और सोर्सिंग के तरीके बदले जा रहे हैं। इससे भारत के टेक्सटाइल क्षेत्र को सुनहरा अवसर मिला है कि वह फिर से अग्रणी स्थान हासिल कर ले। हमारा विश्वास है कि भारत का टेक्सटाइल उद्योग 2019-2026 के दौरान 8 से 9 प्रतिशत सीएजीआर से वृद्धि का लक्ष्य रखेगा।’ कपड़ा उद्योग से कृषि व विनिर्माण क्षेत्रों में करीब 4.5 करोड़ लोगों को रोजगार मिलता है। बहरहाल हाल के दिनों में भारत का वैश्विक व्यापार उसकी क्षमताओं के अनुरूप नहीं रहा है। 2015-2019 के बीच निर्यात में 3 प्रतिशत और 2020 में 18.7 प्रतिशत गिरावट आई है। वहीं इस दौरान कम लागत लगने वाले देशों बांग्लादेश और वियतनाम ने अपनी हिस्सेदारी बढ़ा ली है।
हाल के दिनों में भारत के कारोबार के प्रदर्शन प्रभावित करने की कई वजहें रही हैं। उदाहरण के लिए बिजली की लागत बांग्लादेश की तुलना में 30 से 40 प्रतिशत ज्यादा है। ब्रिटेन, यूरोपीय संघ और कनाडा जैसे प्रमुख आतातक देशों के साथ मुक्त तरजीही कारोबार समझौता न होने के कारण निर्यातकों पर कीमतों का दबाव बढ़ा है। पूंजी की ज्यादा लागत और करीब सभी टेक्सटाइल मशीनरी को लेकर निर्यात पर ज्यादा निर्भरता के कारण निवेश की गई पूंजी पर मुनाफा कमाना मुश्किल हो गया है। लंबे समय तक चीन के विनिर्माताओं के दबदबे ने भारत को खासकर फैशन के क्षेत्र में गैर प्रतिस्पर्धी बना दिया है।