सलमान खान की 2017 में आई फिल्म ‘टाइगर जिंदा है!’ तो आपको याद होगी। देश में झींगे की इकलौती स्वदेशी वाणिज्यिक उत्पादन वाली प्रजाति ‘ब्लैक टाइगर’ ने जिस तरह बाजार में वापसी की है वह हमें इसी फिल्म की याद दिलाता है।
कभी भारत के झींगा निर्यात की पहचान रहा ब्लैक टाइगर झींगा विभिन्न कारणों से 2010 के बाद धीरे-धीरे पिछड़ता चला गया। इसकी प्रमुख वजहें थीं व्हाइट स्पॉट सिंड्रोम वायरस (डब्ल्यूएसएसवी) का बार-बार फैलने वाला प्रकोप, अमेरिका, जापान और यूरोपीय संघ जैसे प्रमुख बाजारों में आयात संबंधी पाबंदियां और मेक्सिको और पेरु मूल के वन्नामेई झींगे का तेज उभार। इन कारणों ने ब्लैक टाइगर की बाजार पर पकड़ कमजोर कर दी।
एक दशक से अधिक समय तक गिरावट झेलने के बाद इस प्रजाति ने उल्लेखनीय वापसी की है। वर्ष 2011-12 में ब्लैक टाइगर झींगे का निर्यात 76,480 टन के शिपमेंट के साथ 83.3 करोड़ डॉलर के शिखर पर था। लेकिन 2020-21 तक यह घटकर सिर्फ 10,317 टन और 10.89 करोड़ डॉलर रह गया। उद्योग जगत के कई लोगों ने तो मानो इस प्रजाति से उम्मीद ही छोड़ दी थी। फिर भी केवल पांच सालों में इस स्वदेशी झींगे ने शानदार वापसी की है। 2025-26 में इसका निर्यात बढ़कर 61,780 टन और 56.831 करोड़ डॉलर तक पहुंच गया जो पिछले 13 वर्षों का उच्चतम स्तर है। यानी 2020-21 के निचले स्तर की तुलना में इसके निर्यात मूल्य में चार गुना से अधिक वृद्धि हुई। इसे रुपये के कमजोर होने का भी फायदा मिला और स्थानीय मुद्रा में निर्यात आय रिकॉर्ड 4,974 करोड़ रुपये तक पहुंच गई।
उधर ब्लैक टाइगर की गिरावट ने वन्नामेई झींगे के लिए रास्ता खोल दिया और वह भारतीय समुद्री खाद्य निर्यातकों के लिए सबसे बड़ा कमाई का स्रोत बन गया। भारत में वन्नामेई झींगा 2009 में लाया गया और इसका व्यावसायिक निर्यात 2011-12 से शुरू हुआ। तब इसकी निर्यात आय सिर्फ 39.781 करोड़ डॉलर थी, जो बढ़कर 2025-26 में 4.76 अरब डॉलर तक पहुंच गई। अब यह किस्म भारत की समुद्री निर्यात आय में 65 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी रखती है।
पिछले सप्ताह चेन्नई में आयोजित सीफूड वैल्यू एडिशन पर आधारित नैशनल स्किल ओलंपियाड के अवसर पर मरीन प्रॉडक्ट एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी (एमपीईडीए) के अध्यक्ष पी. जवाहर ने बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा, ‘2010 के दशक में टाइगर झींगा जिस संकट से गुजरा वह अभूतपूर्व था। बीमारी के प्रकोप के कारण यह किस्म लगभग पूरी तरह से समाप्त हो गई थी। हमें जापान और अमेरिका जैसे देशों में आयात प्रतिबंधों का भी सामना करना पड़ा। अब, टाइगर ने समुद्री उद्योग में दुर्लभ वापसी करते हुए आधा-अरब डॉलर के स्तर तक पहुंच बनाई है। सिर्फ पिछले एक साल में ही निर्यात मूल्य 38 प्रतिशत बढ़कर 56.8 करोड़ डॉलर तक पहुंच गया है।’
भारत को लंबे समय तक ब्लैक टाइगर झींगे का प्राकृतिक घर माना जाता था। 2010 में यह प्रजाति देश के झींगा निर्यात का लगभग 80 प्रतिशत और कुल समुद्री निर्यात का करीब 11 प्रतिशत हिस्सा थी। लेकिन 1990 के दशक के अंत से डब्ल्यूएसएसवी के बार-बार प्रकोप ने इस पर बहुत दबाव डाला। बीमारी और तनाव के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होने के कारण, ब्लैक टाइगर झींगे की खेती में रोकथाम के तौर पर एंटीबायोटिक्स पर निर्भरता बढ़ गई। बीमारी के प्रकोप ने खेती की उत्पादकता और लाभ को भी घटा दिया।
जापान ने सबसे पहले भारतीय ब्लैक टाइगर झींगा की खेपों पर 100 प्रतिशत निरीक्षण लागू किया क्योंकि उसे फार्म्ड झींगों में प्रतिबंधित एंटीबायोटिक फ्यूराजसोलिडोन के होने का पता चला। इसके बाद कई अन्य आयातक देशों ने भी इसी तरह के प्रतिबंध लगाए।
जवाहर कहते हैं कि उस समय वन्नामेई ने भारतीय झींगा उत्पादकों को बाजार में बनाए रखा। उन्होंने वन्नामेई को अपना लिया जिसने उन्हें कई वाणिज्यिक लाभ दिए।
यह बदलाव शुरुआती सरकारी हस्तक्षेप से शुरू हुआ। ब्लैक टाइगर झींगे की खेती पूरी तरह से समाप्त हो जाने के जोखिम को पहचानते हुए वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने एमपीईडीए के माध्यम से 2014 में इसके पुनरोत्थान का प्रयास आरंभ किया।
जवाहर के अनुसार उसी वर्ष अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह में एक न्यूक्लियस ब्रीडिंग सेंटर स्थापित किया गया। इस केंद्र ने ब्लैक टाइगर झींगे को पालतू बनाने और चयनात्मक प्रजनन पर ध्यान केंद्रित किया जिससे बीमारी के जोखिम वाली जंगली किस्म पर निर्भरता कम हुई। इसके परिणामस्वरूप तैयार झींगों को बाद में बीज उत्पादन के लिए गुणवत्तापूर्ण स्टॉक के रूप में उपलब्ध कराया गया।
एमपीईडीए के संयुक्त निदेशक (विपणन) अनिल कुमार पी ने कहा, ‘इससे किसानों को उच्च गुणवत्ता वाला रोग-मुक्त ब्लैक टाइगर बीज मिला। इससे उनके जीवित रहने की दर और उत्पादकता में सुधार हुआ। इसके बाद किसानों को बेहतर प्रबंधन पद्धतियों और एंटीबायोटिक-मुक्त खेती का प्रशिक्षण दिया गया। इन सबने ब्लैक टाइगर की वापसी में मदद की।’
उद्योग सूत्रों ने इसका श्रेय वैज्ञानिक हस्तक्षेप, कड़े फार्म-स्तरीय नियंत्रण और निरंतर कूटनीतिक प्रयासों के संयोजन को दिया। द्विपक्षीय चर्चाओं के बाद जापान ने भी दिसंबर 2020 में भारतीय ब्लैक टाइगर झींगे पर आयात प्रतिबंध हटा दिए।
कुमार के अनुसार, चीन और यूरोपीय संघ जैसे नए बाजारों में विस्तार ने भारत के प्रमुख स्वदेशी झींगा की वापसी को मजबूत किया है। यदि प्रस्तावित भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौता साकार होता है तो यूरोपीय संघ इसका प्रमुख बाजार बन सकता है। इस खंड में भारत का प्रमुख प्रतिस्पर्धी इक्वाडोर वर्तमान में यूरोपीय संघ के बाजार में में शून्य-शुल्क पहुंच का लाभ उठाता है।
उन्होंने कहा कि चीन और यूरोपीय संघ झींगा निर्यात में हमारे प्रमुख साझेदार हैं। भारत ने वित्त वर्ष 2026 में 19.72 लाख टन समुद्री खाद्य पदार्थों का निर्यात किया जिसकी कीमत लगभग 73,890.46 करोड़ रुपये (8.46 अरब डॉलर) रही। यह एक नया रिकॉर्ड था जबकि वैश्विक बाजार की परिस्थितियां चुनौतीपूर्ण थीं।
फ्रोजन झींगा उद्योग की प्रमुख निर्यात श्रेणी बनी रही जिसने लगभग 49,037.93 करोड़ रुपये (5.62 अरब डॉलर) का राजस्व उत्पन्न किया। यह कुल समुद्री खाद्य निर्यात मात्रा का 40.19 प्रतिशत और डॉलर के हिसाब से कुल निर्यात आय का 66.52 प्रतिशत था। हालांकि वन्नामेई अभी भी भारत के झींगा निर्यात में सबसे बड़ा योगदान देता है। एमपीईडीए का मानना है कि ब्लैक टाइगर की बहाली केवल एक चक्रीय सुधार नहीं है।