इंटरनेट के इस दौर में हम सभी अक्सर किसी न किसी नए डिजिटल प्लेटफॉर्म पर साइन-अप करते रहते हैं। चाहे कोई OTT प्लेटफॉर्म हो, म्यूजिक स्ट्रीमिंग सर्विस हो, नया AI टूल हो या फिर क्लाउड स्टोरेज, कंपनियां ग्राहकों को लुभाने के लिए 1 या 2 रुपये में ‘फ्री ट्रायल’ या प्रमोशनल ऑफर देती हैं। शुरुआत में यह 1 रुपये का पेमेंट बेहद मामूली लगता है, लेकिन यही छोटा सा कदम आगे चलकर आपके बैंक खाते से हर महीने होने वाली अनचाही कटौती की वजह बन जाता है।
बहुत से यूजर्स को तब झटका लगता है जब ट्रायल खत्म होने के बाद उनके खाते से अचानक 199, 299 या 499 रुपये कटने लगते हैं। आइए समझते हैं कि यह पूरा गेम कैसे काम करता है और इसमें फ्रॉड न होने के बावजूद आपकी जेब कैसे ढीली हो रही है।
इस पूरी प्रक्रिया के पीछे की वजह को समझाते हुए पेइन्स्टाकार्ड के होल-टाइम डायरेक्टर और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO), साईकृष्ण मुसुनुरु एक सीधा सा उदाहरण देते हैं।
मुसुनुरु कहते हैं, “मान लीजिए किसी ग्राहक ने 1 रुपये में तीन महीने के लिए म्यूजिक स्ट्रीमिंग का ट्रायल प्लान लिया। पेमेंट करते समय कस्टमर अपना UPI ID देता है। पेमेंट पूरा होने से ठीक पहले, UPI ऐप की स्क्रीन पर ‘ऑटोपे मैंडेट’ को अप्रूव करने का एक पेज आता है। इस पेज पर मर्चेंट का नाम, काटे जाने वाला पैसा, पेमेंट की फ्रीक्वेंसी (महीने में या साल में कितनी बार) और मैंडेट की आखिरी तारीख लिखी होती है।”
मुसुनुरु आगे बताते हैं, “इसमें भविष्य में होने वाले पेमेंट्स की पूरी डिटेल स्क्रीन पर दिखती है, लेकिन ज्यादातर यूजर्स को यह अहसास ही नहीं होता कि वे भविष्य की कटौतियों को अपनी मंजूरी दे रहे हैं। वह स्क्रीन एक सामान्य पेमेंट कन्फर्मेशन जैसी दिखती है, न कि किसी रिकरिंग (बार-बार होने वाले) पेमेंट एग्रीमेंट जैसी।”
मुसुनुरु के मुताबिक, इसका नतीजा यह होता है कि जैसे ही तीन महीने का ट्रायल पीरियड खत्म होता है, सब्सक्रिप्शन अपने आप रिन्यू हो जाता है और आपके लिंक्ड बैंक अकाउंट से पैसे कट जाते हैं। मुसुनुरु के मुताबिक, यह पेमेंट सिस्टम की कोई खामी नहीं है, बल्कि ग्राहकों में जागरूकता की कमी का मामला है।
जब भी बिना UPI पिन डाले हर महीने खाते से पैसे कटते हैं, तो ज्यादातर लोग मान लेते हैं कि उनके साथ कोई साइबर फ्रॉड हुआ है। लेकिन बैंकिंग और डिजिटल पेमेंट एक्सपर्ट्स का कहना है कि तकनीकी रूप से ये कटौतियां पूरी तरह सही होती हैं। चूंकि ग्राहक ने शुरुआत में खुद ही ‘ऑटोपे’ मैंडेट को मंजूरी दी थी, इसलिए बाद में सब्सक्रिप्शन के बारे में भूल जाने से उसे कानूनी रूप से गलत नहीं कहा जा सकता।
एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस व्यवस्था में पारदर्शिता लाना मर्चेंट्स, UPI ऐप्स और बैंकों की मिली-जुली जिम्मेदारी है। कंपनियों को साफ तौर पर बताना चाहिए कि ट्रायल के बाद प्लान कब रिन्यू होगा और कितने पैसे कटेंगे। वहीं UPI ऐप्स को पिन दर्ज कराने से पहले मैंडेट की शर्तें बड़े अक्षरों में दिखानी चाहिए।
इस मुद्दे पर PayNearby के फाउंडर, मैनेजिंग डायरेक्टर और CEO आनंद कुमार बजाज कहते हैं, “बार-बार होने वाले पेमेंट तभी भरोसेमंद बनते हैं, जब ग्राहक की सहमति पूरी तरह साफ हो और वह उसे आसानी से समझ और मैनेज कर सके। पेमेंट की मंजूरी देने से पहले ग्राहक को पैसे, पेमेंट की तारीख, इसकी वैलिडिटी और इसे कब व कैसे रद्द किया जा सकता है, जैसी सभी जरूरी जानकारी साफ और आसान तरीके से दिखनी चाहिए, ताकि वह पूरी जानकारी के साथ फैसला ले सके।”
एक बार में 199 या 299 रुपये का कटना शायद बहुत बड़ा नुकसान न लगे, लेकिन जब ऐसे कई ऐप्स के सब्सक्रिप्शन बिना जानकारी के बैकग्राउंड में चलते रहते हैं, तो यह महीने के बजट को बिगाड़ देता है। साईकृष्ण मुसुनुरु ने अपने अनुभव में ऐसे कई मामले देखे हैं जहां लोगों के खातों से मनोरंजन, काम के सॉफ्टवेयर और अन्य डिजिटल सेवाओं के कई सारे मैंडेट एक साथ एक्टिव थे और उन्हें इसका पता भी नहीं था।
एक ऐसे ही मामले में, एक यूजर के खाते से लगभग एक ही समय पर छह अलग-अलग सब्सक्रिप्शन के पैसे कट गए। इससे उसके बैंक अकाउंट का बैलेंस अचानक कम हो गया, वह भी तब जब उसकी गाड़ी या घर की EMI कटने का समय नजदीक था। हालांकि कोई भी एक कटौती बहुत ज्यादा नहीं थी, लेकिन सब मिलाकर उन्होंने एक अस्थाई आर्थिक संकट खड़ा कर दिया और जरूरी फंड जमा होने तक EMI बाउंस या लेट हो गई।
मुसुनुरु स्पष्ट करते हैं कि UPI ऑटोपे एक बेहद सुरक्षित और सुविधाजनक माध्यम है, खराबी इसमें नहीं बल्कि इस बात में है कि लोग अपने खाते से लगातार कटने वाले पैसों का हिसाब नहीं रख पाते।
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अगर आप चाहते हैं कि आपकी गाढ़ी कमाई इस तरह चुपके से आपके खाते से न निकले, तो डिजिटल पेमेंट्स को भी एक बड़ी जिम्मेदारी की तरह देखना होगा। मुसुनुरु और बजाज ने कंज्यूमर्स को सुरक्षित रहने के लिए कुछ बेहद जरूरी टिप्स दिए हैं:
बजाज का कहना है कि डिजिटल पेमेंट ने हमारी जिंदगी जरूर आसान बनाई है, लेकिन इसके साथ इसको लेकर अनुशासन और जागरूकता भी उतनी ही जरूरी हो गई है। उनके मुताबिक, अगर आप हर महीने सिर्फ पांच मिनट निकालकर अपने एक्टिव UPI मैंडेट की जांच कर लें, तो सालभर में अनचाहे ऑटो-डेबिट की वजह से होने वाले हजारों रुपये के नुकसान से बच सकते हैं।