सोलहवें वित्त आयोग (16वीं एफसी) ने अपने 3 पूर्ववर्तियों की प्रथा से हटते हुए 2026-31 की अपनी पहली अवधि के लिए अलग-अलग राज्यों के लिए भविष्योन्मुखी सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) अनुमान प्रकाशित नहीं किए हैं। हालांकि रिपोर्ट से पता चलता है कि इस तरह के अनुमान तैयार किए गए थे।
संसद में 1 फरवरी को पेश की गई रिपोर्ट में केवल सभी राज्यों के संयुक्त जीएसडीपी का अनुमान बताया गया है।
इसकी वजह से राज्यों के पास उनकी मध्यावधि वृद्धि और वित्तीय ट्रेजेक्ट्रीज का आकलन करने के लिए कोई पैमाना नहीं है। राज्यवार अनुमानों के बिना सरकारों के पास 2026-31 की अवधि के लिए कर वृद्धि, राजस्व क्षमता और व्यय का अनुमान लगाने की तुलनात्मक क्षमता नहीं है। इसकी वजह से वित्तीय योजना उनकी अपनी मान्यताओं पर अधिक निर्भर हो सकती है। हालांकि इससे कर विभाजन के फॉर्मूले पर कोई असर नहीं पड़ेगा, जो जीएसटीपी के पिछले आंकड़ों के मुताबिक है।
आयोग ने अपने फॉर्मूले में जिन जीएसडीपी आंकड़ों का इस्तेमाल किया है, वह जीएसडीपी श्रृंखला उसकी वेबसाइट पर उपलब्ध है।
रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि अनुमान तैयार किए गए थे। इसमें कहा गया है कि आयोग ने पहले सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय से 2011-12 से 2023-24 तक के तुलनीय बाजार-मूल्य डेटा का उपयोग करके प्रत्येक राज्य के जीएसडीपी का अनुमान लगाया था। फिर इसने उसी अवधि में सभी राज्यों के सकल जीएसडीपी वृद्धि की तुलना में राज्य की वृद्धि की प्रतिक्रिया का अनुमान लगाया।
रिपोर्ट में कहा गया है, ‘इन राज्य केंद्रित लोच को फिर 2024-25 से 2030-31 की अवधि के दौरान विभिन्न राज्यों की जीएसडीपी वृद्धि दर प्राप्त करने के लिए अनुमानित नॉमिनल सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर पर लागू किया जाता है।’
इससे पहले के आयोगों ने इस सामग्री को विस्तार से प्रकाशित किया था। वित्त आयोगों ने अपनी कार्य अवधि के लिए प्रत्येक राज्य के लिए एक सालाना मूल्यांकन ‘ असेस्ड ऑन रेवेन्यू रिसीप्ट ऐंड रेवेन्यू एक्सपेंडीचर’ नामक अनुलग्नक में दिया था। प्रत्येक राज्य की तालिका उसके अवार्ड के प्रत्येक वर्ष के लिए अनुमानित जीएसडीपी के साथ शुरू होती थी, इसके बाद अनुमानित कर और गैर कर राजस्व, राजस्व व्यय और डिवॉल्यूशन के पहले का राजस्व घाटा या अधिशेष होता था।
16वें वित्त आयोग के सचिव ऋत्विक पांडेय ने कहा कि सामान्य जीएसडीपी अनुमान मुख्य रूप से राज्यों के कर राजस्व और घाटा अनुदान का अनुमान लगाने के लिए उपयोग किए जाते हैं, और आयोग ने पाया है कि इस अंतर भरने के दृष्टिकोण ने पिछले वित्त आयोगों के लिए कोई परिणाम नहीं दिए हैं।
पांडेय ने कहा, ‘इसलिए आयोग का कहना है कि अंतर भरने (राजस्व घाटा) की यह योजना काम नहीं आई। ऐसे में उन्होंने अंतर भरने के किसी अनुदान की सिफारिश नहीं की। ऐसे में अगरआप अंतर भरने का अनुमान नहीं देते हैं तो ऐसे में राज्यों के वित्त को लेकर भविष्योन्मुखी अनुमान जारी करने का कोई मतलब नहीं है। ऐसा करने की कोई संवैधानिक जरूरत नहीं है। यह दरअसल व्यर्थ की कवायद है।’
ईवाई इंडिया के चीफ पॉलिसी एडवाइजर डीके श्रीवास्तव ने कहा कि हर राज्य का जीएसडीपी अनुमान जारी होने से वह राज्य अपने खुद के कर संग्रह में तेजी का अनुमान लगा सकता है और वह अन्य महत्त्वपूर्ण वित्तीय मानदंडों और बेंचमार्क का अनुमान लगा सकता है। उन्होंने कहा, ‘ऐसे अनुमान किसी राज्य की राज्य सरकारों के लिए उनके वित्तीय नियोजन, बजट और नीति निर्माण के मामले में एक बेंचमार्क के रूप में काम कर सकते थे, क्योंकि आयोग के वित्तीय अनुमान आम तौर पर सामान्य या आंशिक रूप से सामान्य आधार पर होते हैं।’
बहरहाल 14वें वित्त आयोग के सदस्य एम गोविंद राव ने अनुमान न आने के महत्त्व को कमतर बताया। उन्होंने बताया कि राज्य के हस्तांतरण का हिस्सा पिछले वर्षों के औसत जीएसडीपी पर निर्भर करता है। भविष्योन्मुखी संख्याओं के बजाय वर्तमान आंकड़े पूरी कार्यावधि के लिए लागू होते हैं।’
उन्होंने कहा कि जीएसडीपी अनुमान प्रकाशित करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि इनका इस्तेमाल कर हस्तांतरण की गणना में नहीं होता है।