इस साल खरीफ सीजन की बुआई शुरू होने से पहले ही देश के किसानों और नीति-निर्माताओं की चिंताएं काफी बढ़ गई हैं। मौसम विभाग के ताजा अनुमानों ने संकेत दिए हैं कि देश के कई हिस्सों में इस बार पिछले 10 सालों का सबसे खराब और सूखा मानसून देखने को मिल सकता है। अल-नीनो (El Niño) के बढ़ते असर को देखते हुए केंद्र सरकार ने तुरंत मोर्चा संभाल लिया है। किसानों को इस बड़े मौसमी संकट से बचाने के लिए सरकार 1 जून 2026 से देशव्यापी “खेत बचाओ” अभियान शुरू करने जा रही है।
इसके तहत किसानों को उनके इलाके और फसल के हिसाब से खास सलाह (क्रॉप-स्पेसिफिक एडवाइजरी) दी जाएगी ताकि वे मौसम के जोखिमों को समझकर सही फैसला ले सकें। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस महीने भर चलने वाले अभियान की तैयारियों की समीक्षा के लिए एक हाई-लेवल मीटिंग की।
बैठक में उन्होंने कहा कि इस अभियान का मुख्य उद्देश्य सिर्फ जानकारी बांटना नहीं है, बल्कि जमीन पर जाकर किसानों को यह बताना है कि उन्हें कम बारिश या सूखे के खतरे वाले इलाकों में कौन सी फसल बोनी चाहिए, किस फसल की तरफ बदलाव करना चाहिए और उनके पास पारंपरिक खेती के क्या बेहतर विकल्प मौजूद हैं। किसानों को उनके इलाके के मौसम, वहां की मिट्टी और बाजार की मांग के हिसाब से व्यावहारिक गाइडेंस दी जाएगी।
कृषि विशेषज्ञों ने पहले ही आगाह कर दिया था कि अल-नीनो के सक्रिय होने से देश के कई हिस्सों में बारिश पर बुरा असर पड़ सकता है, जिससे फसलों की प्लानिंग और किसानों की कमाई प्रभावित होगी।
इस बीच, भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने शुक्रवार को देश की धड़कन माने जाने वाले दक्षिण-पश्चिम मानसून को लेकर अपनी चिंताएं और बढ़ा दी हैं। मौसम विभाग ने साल 2026 के मानसून के अपने पुराने अनुमान को और घटा दिया है। पहले जहां IMD ने लॉन्ग पीरियड एवरेज (LPA) की 92 फीसदी बारिश होने का अनुमान लगाया था, वहीं अब इसे घटाकर 90 फीसदी कर दिया गया है।
इसका सीधा मतलब यह है कि देश में इस साल ‘सामान्य से कम’ बारिश होने की पूरी आशंका है। इस पूर्वानुमान में 4 फीसदी का मॉडल एरर (ऊपर या नीचे) हो सकता है।
अगर मौसम विभाग का यह ताजा अनुमान सच साबित होता है, तो भारत पिछले एक दशक के सबसे सूखे मानसून का सामना करेगा। इससे पहले साल 2015 में भारत में इतनी कम बारिश रिकॉर्ड की गई थी, जब मानसून सामान्य से लगभग 13 फीसदी कम यानी LPA से 12.7 फीसदी नीचे रह गया था। मौसम विभाग के मुताबिक, मानसून के दौरान अल-नीनो की स्थिति मजबूत होने की वजह से बारिश कम होगी, हालांकि भारतीय महासागर डिपोल (IOD), जो मानसून को प्रभावित करने वाला एक अन्य बड़ा कारक है, उसके इस सीजन के दौरान न्यूट्रल (तटस्थ) रहने की उम्मीद है।
मौसम विज्ञान में देश या किसी खास इलाके में एक लंबे समय (आमतौर पर 30 से 50 साल) के दौरान हुई औसत बारिश को लॉन्ग पीरियड एवरेज (LPA) कहा जाता है। भारत में साल 1971 से 2020 तक के आंकड़ों के आधार पर पूरे देश का मौसमी LPA 87 सेंटीमीटर (cm) तय किया गया है। IMD ने अपने दूसरे चरण के अनुमान में साफ कहा है कि इस साल उत्तर-पूर्व भारत को छोड़कर देश के किसी भी हिस्से में सामान्य बारिश होने की उम्मीद नहीं है।
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इस गंभीर चुनौती से निपटने के लिए कृषि मंत्रालय के अधिकारियों ने कमर कस ली है। एक महीने तक चलने वाले ‘खेत बचाओ’ अभियान के दौरान किसानों को ऐसी फसलें और तरीके अपनाने के लिए प्रेरित किया जाएगा, जो जलवायु परिवर्तन और कम पानी के झटके को झेल सकें।
सरकार का पूरा ध्यान इस बात पर है कि पानी की कमी से जूझ रहे इलाकों में किसान ऐसा कोई फैसला न लें जिससे उनकी खेती का रिस्क और लागत बढ़ जाए। अभियान में फसल विविधीकरण (क्रॉप डाइवर्सिफिकेशन), खेती की लागतों के सही इस्तेमाल और पानी के संरक्षण वाली खेती को बढ़ावा दिया जाएगा।
मौसम की जानकारियों के साथ-साथ सरकार ने इस बार खादों के संतुलित इस्तेमाल (Balanced Fertiliser Use) को इस पूरे अभियान का मुख्य एजेंडा बनाया है। कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वे रासायनिक खादों, खासकर यूरिया के जरूरत से ज्यादा और असंतुलित इस्तेमाल को रोकने के लिए जमीनी स्तर पर प्रयास तेज करें। लगातार और भारी मात्रा में यूरिया के इस्तेमाल को कई राज्यों में मिट्टी की सेहत खराब होने और उसकी उपजाऊ क्षमता घटने की मुख्य वजह माना गया है।
किसानों को अब मिट्टी की जांच (सॉइल टेस्ट) के आधार पर जरूरी पोषण देने, संतुलित मात्रा में खाद डालने, हरी खाद का इस्तेमाल बढ़ाने और जैविक व बायो-फर्टिलाइजर्स को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। इसके लिए खेतों में जाकर ‘इंटीग्रेटेड न्यूट्रिएंट मैनेजमेंट’ (INM) के लाइव डेमो भी दिखाए जाएंगे।
चौहान ने दो टूक शब्दों में कहा, “हमारा पूरा ध्यान खेत को बचाने, खेती की लागत को कम करने और किसान को सही समय पर सही सलाह सुनिश्चित करने पर होना चाहिए।”
इस बड़े संकट से निपटने के लिए सरकार ने एक व्यापक और सहयोगी ढांचा तैयार किया है। इस अभियान में स्थानीय पंचायतों, राज्य सरकारों, कृषि विज्ञान केंद्रों (KVKs), भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के संस्थानों और स्थानीय कृषि विभागों को एक साथ जोड़ा गया है। देश के कोने-कोने तक अपनी पहुंच मजबूत करने के लिए 1,600 से ज्यादा विशेष टीमें बनाई गई हैं। इनमें से 500 टीमें विशेष रूप से देश के उन 100 जिलों में तैनात की जाएंगी, जहां रासायनिक खादों की खपत सबसे ज्यादा है।
इन टीमों में कृषि विज्ञान केंद्रों और ICMR के वैज्ञानिक तथा कृषि अधिकारी शामिल होंगे। इसके अलावा, ICAR और KVK की 1,150 मल्टीडिसीप्लिनरी (बहुविषय) टीमें अन्य क्षेत्रों में एक साथ काम करेंगी।
इस अभियान के जरिए सरकार अपनी अन्य कल्याणकारी योजनाओं का लाभ भी सीधे किसानों तक पहुंचाएगी। टीमें खेतों में जाकर किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) और पीएम-किसान (PM-KISAN) जैसी योजनाओं का लाभ दिलाने में मदद करेंगी।
इसके साथ ही दालों और तिलहन के उत्पादन को बढ़ाने, ऑयल पाम की खेती, कॉटन मिशन, सॉइल हेल्थ मैनेजमेंट और जल संरक्षण जैसे अभियानों को भी इसी अभियान से जोड़कर जागरूकता फैलाई जाएगी। कृषि मंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार इस अभियान को एक बड़ा जन-आंदोलन बनाने के लिए सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों, सांसदों, विधायकों और अन्य जनप्रतिनिधियों की भागीदारी सुनिश्चित करेगी।
दूसरी ओर, मौसम विभाग से राहत की एक छोटी खबर यह भी आई है कि दक्षिण-पश्चिम मानसून धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है। यह अरब सागर के कुछ और हिस्सों, लक्षद्वीप, कोमोरिन क्षेत्र, बंगाल की खाड़ी के दक्षिण-पश्चिम, दक्षिण-पूर्व, पश्चिम-मध्य और पूर्व-मध्य हिस्सों के साथ-साथ उत्तर-पूर्वी बंगाल की खाड़ी में प्रवेश कर चुका है।
IMD के मुताबिक, अगले 4 से 5 दिनों के भीतर इसके केरल, तमिलनाडु और बंगाल की खाड़ी के बाकी हिस्सों में आगे बढ़ने के लिए परिस्थितियां पूरी तरह अनुकूल हैं। इससे पहले मौसम विभाग ने 26 मई को मानसून के दस्तक देने की संभावना जताई थी, जिसमें चार दिन का मॉडल एरर शामिल था।