फरवरी के अंत में पश्चिम एशिया युद्ध छिड़ने के बाद से भारत में यूरिया की बिक्री में लगभग 10 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जबकि डाई अमोनिया फॉस्फेट (डीएपी) की बिक्री में सालाना आधार पर लगभग 39.32 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
शुक्रवार को 2 दिवसीय वार्षिक खरीफ सम्मेलन में साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार किसानों द्वारा घबराहट में खरीदारी, अधिक भंडारण और जमाखोरी के कारण ऐसा हुआ है।
एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने कहा, ‘युद्ध छिड़ने के बाद से मॉनसून के पहले यूरिया की दैनिक बिक्री सामान्य 40,000 से 45,000 टन के मुकाबले लगभग 80,000 से 85,000 टन बढ़ गई है। इससे अत्यधिक खरीदारी का पता चलता है।’
एक मार्च से 25 मई, 2026 के बीच उपभोक्ताओं ने 50.5 लाख टन यूरिया खरीदी है, जबकि पिछले साल इसी अवधि में 46 लाख टन खरीद हुई थी। मुख्य रूप से महाराष्ट्र, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, जम्मू कश्मीर, असम, छत्तीसगढ़ और झारखंड में अतिरिक्त खरीद हुई है।
इसी तरह एक मार्च से 25 मई के बीच डीएपी की बिक्री 12.4 लाख टन रही, जो पिछले साल इसी अवधि में 8.9 लाख टन थी। इस अवधि के दौरान महाराष्ट्र, कर्नाटक, पंजाब, पश्चिम बंगाल और हरियाणा में बिक्री में सबसे अधिक बढ़ी है।
उन्होंने कहा कि देश में 100 जिले ऐसे हैं जहां उर्वरक की बिक्री सामान्य से बहुत अधिक हुई है, जिस पर सरकार की नजर है।
उन्होंने कहा कि उर्वरक का बेहतर भंडारण बनाए रखने के लिए केंद्र सरकार ने कदम उठाए, जिसकी वजह से पहले से बेहतर उपलब्धता बनी हुई है।
उन्होंने कहा कि युद्ध के कारण खाद कारखानों के लिए खुली निविदा प्रक्रिया से गैस खरीदी गई, जिसकी कीमत 70 से 80 प्रतिशत बढ़ गई। साथ ही अब तक 25 लाख टन यूरिया का आयात हुआ है, जो युद्ध के पहले की तुलना में 112 प्रतिशत महंगी है। भारत ने 13.5 लाख टन डीएपी का आयात किया, जो युद्ध के पहले की दरों से करीब 38 प्रतिशत महंगी है।
खरीफ सीजन के लिए भारत को करीब 390 लाख टन उर्वरक की जरूरत है, जबकि मौजूदा स्टॉक 200 लाख टन से ज्यादा है।