फॉरेन करेंसी नॉन-रेजिडेंट (बैंक) या एफसीएनआर-बी जमा से अब तक आने वाला धन अब तक बाजार की उम्मीदों से काफी कम है। इसका असर रुपये के प्रदर्शन पर भी पड़ा है। इस सप्ताह डॉलर के मुकाबले रुपया एक प्रतिशत से अधिक गिर गया।
भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा एफसीएनआर-बी जमा के लिए विशेष विंडो सहित कई उपायों की घोषणा के बाद जून में रुपया 0.36 प्रतिशत मजबूत हुआ। उसके बाद अमेरिका और ईरान के बीच जंग फिर से शुरू होने के कारण कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी के दबाव से जुलाई में रुपये पर दबाव बढ़ा।
गुरुवार को रुपया अधिकांश एशियाई मुद्राओं से पिछड़ गया। लगातार चौथे सत्र में गिरावट के बाद रुपया गिरकर करीब 2 महीने के निचले स्तर 96.35 प्रति डॉलर पर आ गया, जो इसके पहले 96.27 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था। वहीं इस दिन अधिकांश एशियाई मुद्राओं में 0.1 प्रतिशत से 0.4 प्रतिशत के बीच वृद्धि हुई, जबकि रुपया सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वालों में से एक बना रहा।
एचडीएफसी सिक्योरिटीज में सीनियर रिसर्च एनालिस्ट दिलीप परमार ने कहा, ‘लगातार चौथे सत्र में रुपये में गिरावट आई। रुपया इसलिए पिछड़ गया, क्योंकि रिजर्व बैंक के समर्थन के हालिया उपायों का असर कम रहा। साथ ही वैश्विक बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी के बाद एफसीएनआर योजनाओं को लेकर उत्साह में कमी आई है।’ एफसीएनआर—बी में आवक अब तक निराशाजनक बताते हुए बार्कलेज ने एक रिपोर्ट में कहा, ‘हाल के रिजर्व बैंक के उपायों से धारणा मजबूत हुई थी, जिसका मकसद भारत के भुगतान संतुलन और रुपये को मजबूत करना था। अब रिजर्व बैंक के उपायों का असर फीका पड़ता दिख रहा है। हमारा मानना है कि कहना जल्दबाजी होगी कि उपाय सफल नहीं हुए हैं।’
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने स्थिति का जायजा लेने के लिए इस सप्ताह अलग-अलग बैंकरों से मुलाकात की थी। सीतारमण ने सरकारी बैंकों के सीईओ से प्रवासी भारतीयों (एनआरआई) तक पहुंच बढ़ाने और अधिकतम धन जुटाने के लिए विशेष जमा योजनाएं पेश करने को कहा, जबकि बैंकरों ने कहा था कि उन्हें प्रवासी भारतीयों से उत्साहजनक प्रतिक्रिया
मिली है।
बार्कलेज ने कहा है कि अमेरिकी दरें अधिक होने और रुपये में यील्ड कम आकर्षक होने के कारण उसे 2013 की तरह से बड़ी मात्रा में विदेश से धन आने की उम्मीद नहीं है। बार्कलेज ने कहा कि उसे एफसीएनआर-बी के माध्यम से 25 से 30 अरब डॉलर आने की उम्मीद है।
बार्कलेज ने कहा, ‘अमेरिकी दरें अधिक होने और रुपये में यील्ड कम आकर्षक होने के कारण हमें 2013 की तरह बड़ी आवक की पुनरावृत्ति की उम्मीद नहीं है। बाजार की 40 से 50 अरब डॉलर आने की अपेक्षाओं की तुलना में अब तक की आवक कमजोर रही है।’
2013 की तुलना में इस बार एफसीएनआर-बी के सामने प्रमुख चुनौती कम होते स्प्रेड की है। 2026 में भारतीय बैंकों की 1 साल की एफसीएनआर-बी जमा दर और 12 महीने के अमेरिकी टी-बिल के बीच ब्याज दर का अंतर काफी कम हो गया है।
बोफा सिक्योरिटीज ने एक नोट में कहा है कि 2013 के 2.9 प्रतिशत से स्प्रेड अब 1.4 प्रतिशत तक संकुचित हो गए हैं। हालांकि आने वाले दिनों में आवक में तेजी आने के कारण बोफा को 60 अरब डॉलर से 70 अरब डॉलर की कुल धन आने उम्मीद है।
बैंक ऑफ बड़ौदा में मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस ने कहा, ‘यदि आप 2013 की स्थिति देखें तो ज्यादातर धन आखिरी महीने में आया।’ उन्होंने कहा कि बैंक अभी भी बाजार की प्रतिक्रिया के आधार पर जमा दरों को संशोधित कर रहे थे, और धन जुटाने की प्रक्रिया अभी भी जारी है।
आरबीआई की स्वैप विंडो सितंबर के अंत तक खुली है। बैंकों के पास जमा आकर्षित करने के लिए 2 महीने से अधिक का समय है।
आईडीएफसी फर्स्ट बैंक की मुख्य अर्थशास्त्री गौरा सेन गुप्ता ने कहा कि बैंक अभी भी शर्तों को अंतिम रूप दे रहे हैं और उदार ढांचे के तहत डॉलर जुटाना बाकी है। उन्होंने कहा, ‘पिछली बार 60 से 80 प्रतिशत धन योजना के अंतिम महीने आया था। इस बार आप अगस्त और सितंबर में आवक में वृद्धि देखेंगे।’