अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने बुधवार को राष्ट्र के नाम जो संबोधन दिया वह ईरान युद्ध के अंत को लेकर स्पष्ट मार्ग दिखाने में विफल रहा। वास्तव में ट्रंप ने इस अवसर का इस्तेमाल ऐसी धमकियां देने के लिए किया कि ईरान पर बमबारी करके उसे पाषाणकाल जैसी हालत में पहुंचाया जा सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि ईरान के साथ बातचीत चल रही है जबकि ईरान के अधिकारियों ने इस बात से बार-बार इनकार किया है। ऐसे में युद्ध शुरू होने के एक महीने बाद भी अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि यह लड़ाई कब खत्म होगी तथा अमेरिका और इजरायल वास्तव में क्या हासिल करना चाहते हैं। यह बात शेष विश्व को जबरदस्त अनिश्चितता में छोड़ देती है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि यह युद्ध इस क्षेत्र की भूराजनीतिक व्यवस्था को कैसे नया आकार देगा।
अतिरिक्त अनिश्चितता ने वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों को बढ़ा दिया है और यह इस क्षेत्र के व्यापार को भी प्रभावित कर रहा है। भारत खासतौर पर इन अनजान कारकों की जद में है क्योंकि हम तेल, व्यापार और धनप्रेषण के लिए पश्चिम एशिया पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं।
यह जंग जहां कई तरह से वृहद आर्थिक हालात को प्रभावित कर रही है और इसे लेकर हस्तक्षेप की आवश्यकता है, वहीं रिजर्व बैंक के लिए आर्थिक प्रबंधन काफी जटिल हो चला है। मुद्रा बाजार का उतारचढ़ाव इस संकट के सबसे स्पष्ट परिणामों में से एक है। रिजर्व बैंक मुद्रा का प्रबंधन करता है। मार्च में भारतीय रुपये में 4 फीसदी से अधिक की गिरावट आई।
वास्तव में गत वित्त वर्ष जो कि इस सप्ताह के आरंभ में समाप्त हुआ, रुपये के लिए काफी मुश्किल साल था। 2025-26 में रुपया डॉलर के मुकाबले 10 फीसदी तक गिरा। रुपया 2025 में इसलिए भी दबाव में रहा क्योंकि व्यापार संबंधी अनिश्चितताएं बनी हुई थीं। इसका परिणाम पूंजी के बड़े पैमाने पर बाहर जाने के रूप में भी सामने आया। उदाहरण के लिए विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने 2025 में करीब 19 अरब डॉलर मूल्य के भारतीय शेयरों की बिकवाली की। 2026 में भी दबाव जारी रहा और ईरान युद्ध ने रुपये को मिलने वाली चुनौती को और मुश्किल बना दिया है।
डॉलर की बिकवाली के अलावा रिजर्व बैंक ने हाल के दिनों में रुपये की गिरावट को रोकने के लिए अन्य कदम भी उठाए हैं। पिछले सप्ताह उसने बैंकों से विदेशी मुद्रा बाजार में रुपये की दैनिक शुद्ध ओपन पोजीशन को 10 करोड़ डॉलर तक सीमित रखने को कहा। अब उसने बैंकों को रुपये से जुड़े नॉन-डिलिवरेबल डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स ( एक वित्तीय डेरिवेटिव, जिसका उपयोग मुद्रा विनिमय दरों पर हेजिंग या सट्टेबाजी के लिए किया जाता है) की पेशकश करने से रोक दिया है, जिसके परिणामस्वरूप गुरुवार को रुपये में तेजी से वापसी हुई। स्पष्ट है कि ये कदम सट्टेबाजी को रोकने के लिए उठाए गए हैं।
यह रेखांकित करना आवश्यक है कि समस्या बुनियादी ज्यादा है। भारत ने अप्रैल-दिसंबर 2025 के दौरान 30 अरब डॉलर से अधिक का भुगतान संतुलन घाटा दर्ज किया। मार्च तिमाही में स्थिति बदलने की संभावना कम है। इसलिए रुपया विदेशी मुद्रा के लगातार शुद्ध बहिर्गमन की संभावना के अनुसार समायोजित हो रहा है। कम से कम निकट भविष्य में तो ऐसा ही हो रहा है। इस प्रकार, कारोबारी गतिविधि को रोकना बहुत मददगार नहीं होगा। नीति-निर्माताओं को मुद्रा बाजार के पूर्ण स्तरों से प्रभावित नहीं होना चाहिए।
रुपया वास्तविक रूप से भी अवमूल्यित हुआ है। 40 मुद्राओं वाले वास्तविक प्रभावी विनिमय दर सूचकांक ने दिखाया कि फरवरी में रुपया लगभग 6 फीसदी ही अवमूल्यित था। कुछ हद तक अवमूल्यन भारतीय निर्यातकों को इस कठिन आर्थिक माहौल में मदद करेगा। युद्ध की स्थिति स्पष्ट होते ही, यह न केवल निर्यातकों को बाजार वापस पाने में लाभ देगा बल्कि पूंजी प्रवाह को भी आकर्षित करेगा, क्योंकि भारतीय परिसंपत्तियां विदेशी निवेशकों के लिए सस्ती हो जाएंगी, जिससे भुगतान संतुलन की स्थिति सुधरेगी।
इस प्रकार, रिजर्व बैंक के मुद्रा बाजार में उठाए गए कदमों को सावधानीपूर्वक संतुलित करने की आवश्यकता होगी। निष्पक्ष रूप से देखें तो उसे युद्ध के अन्य प्रभावों से भी निपटना होगा। वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि महंगाई दर को बढ़ा देगी। रिजर्व बैंक के मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप के कारण बॉन्ड यील्ड आंशिक रूप से बढ़ गई हैं। इसने तरलता की स्थिति को प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया है। रिजर्व बैंक के दृष्टिकोण पर अधिक स्पष्टता अगले सप्ताह मौद्रिक नीति समिति की बैठक के बाद सामने आएगी।