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पहले की श्रृंखला की तुलना में कमी आने के बावजूद खुदरा महंगाई में ग्रामीण क्षेत्र का दबदबा बरकरार

कई विशेषज्ञों का मानना है कि मुख्य मुद्रास्फीति ही अर्थव्यवस्था में महंगाई की असली दिशा का संकेत देती है इसलिए आरबीआई की मौद्रिक नीति इसी हिस्से को ध्यान में रखकर बननी चाहिए।

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स्नेहा शशिकुमार   
Last Updated- February 12, 2026 | 10:28 PM IST

जिन वस्तुओं की कीमतों में अक्सर उतार-चढ़ाव होता रहता है मसलन खाद्य पदार्थ एवं तेल, उन्हें 2024 की नई उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) श्रृंखला में पहले के दो आधार वर्षों की तुलना में कम महत्त्व (भार) दिया गया है इस कारण पूरा जोर मुख्य महंगाई पर है। अब पहले की तुलना में शहरी क्षेत्रों को अधिक भार दिया गया है।

ग्रामीण क्षेत्रों का भार लगभग 3 प्रतिशत अंक घट गया है जो 2010 के 58.07 फीसदी से वर्ष 2024 में घटकर 55.42 फीसदी रह गया। वहीं शहरी क्षेत्रों का भार उसी अवधि में बढ़ा है जो वर्ष 2010 में 41.93 फीसदी था अब वह 2024 में बढ़कर 44.58 फीसदी हो गया। वर्ष 2012 की श्रृंखला में ग्रामीण क्षेत्रों का भार 57.36 फीसदी और शहरी क्षेत्रों का 42.64 फीसदी था।

सीपीआई में खाद्य पदार्थों का भार लगभग 8 प्रतिशत अंक घट गया है जो 2010 में 42.71 फीसदी था अब वह 2024 में घटकर 34.78 फीसदी रह गया है। 2012 की श्रृंखला में यह 39.06 फीसदी था। इसी तरह, ईंधन और बिजली का भार भी वर्ष 2010 से 2024 के बीच 4 प्रतिशत अंक कम कर दिया गया है। पूर्व मुख्य सांख्यिकीविद् प्रणव सेन ने बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा, ‘यह कमी समय के साथ लोगों की खपत की आदतों में बदलाव को दर्शाती है। जैसे-जैसे लोगों की आमदनी बढ़ती है, वे अपनी खरीदारी की चीजों में विविधता लाते हैं। ज्यादा आमदनी होने पर लोग जरूरी चीजों जैसे भोजन पर तुलनात्मक रूप से कम खर्च करते हैं।’

कई विशेषज्ञों का मानना है कि मुख्य मुद्रास्फीति ही अर्थव्यवस्था में महंगाई की असली दिशा का संकेत देती है इसलिए भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति इसी हिस्से को ध्यान में रखकर बननी चाहिए।

First Published : February 12, 2026 | 10:26 PM IST