प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
जेएसडब्ल्यू एमजी मोटर इंडिया अगले कुछ वर्षों के दौरान देश में 3,000 करोड़ रुपये से लेकर 4,000 करोड़ रुपये तक निवेश करने की योजना बना रही है। उसका इस साल चार नए मॉडल उतारने का इरादा है। इनमें एक प्लग-इन हाइब्रिड, एक इलेक्ट्रिक वाहन, मैजेस्टर एसयूवी तथा एक और मॉडल शामिल है, जिसका अभी ऐलान नहीं किया गया है।
संवाददाता सम्मेलन के दौरान जेएसडब्ल्यू एमजी मोटर इंडिया के प्रबंध निदेशक अनुराग मेहरोत्रा ने कहा, ‘हम वित्त जुटाने के सभी विकल्पों पर विचार करेंगे। मैंने दो शेयरधारकों (यहां जेएसडब्ल्यू और साइक) को इतनी गहराई से जुड़े हुए कभी नहीं देखा। वे इतनी दफा बात कर रहे हैं जो अभूतपूर्व है और इससे तेजी से निर्णय लेने में मदद मिलती है।’
12 फरवरी को कंपनी ने एमजी मैजेस्टर को प्रदर्शित किया था। इसे 2025 में पहली बार भारत मोबिलिटी ग्लोबल एक्सपो में प्रदर्शित करने के बाद डी+ एसयूवी के रूप में पेश किया गया है। इस 4×4 एसयूवी की प्री-बुकिंग शुरू हो चुकी है और दामों की घोषणा अप्रैल में लॉन्चिंग के आसपास की जाएगी। मैजेस्टर का मुकाबला भारत में टोयोटा फॉर्च्यूनर, जीप मेरिडियन, स्कोडा कोडियाक और निसान एक्स-ट्रेल जैसी कारों से होगा।
भारत-चीन व्यापार संबंधों के बारे में मेहरोत्रा ने कहा कि कुछ साल पहले की तुलना में स्थिति में सुधार हुआ है। उन्होंने उड़ानों और वीजा पर आसान आवाजाही तथा अधिक व्यापारिक जुड़ाव की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि टीएलए (टेक्निकल लाइसेंसिंग एग्रीमेंट्स) में खासा इजाफा हुआ है, खास तौर पर भारत और चीन की वाहन कुलपुर्जा कंपनियों के बीच। ये समझौते भारतीय आपूर्तिकर्ताओं को विदेशी साझेदारों की तकनीक तक पहुंच और उसका उपयोग करने की सुविधा देते हैं।
जेएसडब्ल्यू एमजी मोटर इंडिया को भारत के जेएसडब्ल्यू समूह और चीन की साइक मोटर के बीच संयुक्त उद्यम के रूप में गठित किया गया है। साइक के पास कंपनी की 49 प्रतिशत हिस्सेदारी है, जबकि जेएसडब्ल्यू समूह के पास 35 प्रतिशत हिस्सेदारी है। शेष 16 प्रतिशत हिस्सेदारी भारतीय हितधारकों के पास है, जिनमें 8 प्रतिशत वित्तीय संस्थानों, 3 प्रतिशत डीलरों और 5 प्रतिशत कर्मचारियों की हिस्सेदारी है।
इलेक्ट्रिक वाहनों के संबंध में मेहरोत्रा ने माना कि सितंबर 2025 में जीएसटी में सुधार से पेट्रोल और डीजल कारें अपेक्षाकृत सस्ती होने के बाद ईवी की पैठ नरम पड़ गई है। अलबत्ता उन्होंने कहा कि ईवी रखने का दीर्घकालिक अर्थशास्त्र मजबूत बना हुआ है। खरीदार ईंधन पर खासी बचत करते हैं और समय के साथ परिचालन लागत कम हो जाती है।
उन्होंने इस सोच को भी गलत बताया कि ईवी की मांग केवल महानगरों तक ही सीमित है। उन्होंने कहा कि इसका इस्तेमाल मझोले और छोटे शहरों में भी दिख रहा है और कुछ छोटे बाजारों में ईवी की पहुंच राष्ट्रीय औसत से भी ज्यादा है।