सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय और दोपहिया वाहन उद्योग ऐसी व्यवस्था पर काम कर रहे हैं जिसमें तय सीमा से अधिक उत्सर्जन होने पर वाहन को ‘लिम्प-होम मोड’ में डाला जा सकता है। यह सीमा भारत स्टेज-6 (बीएस 6) के दूसरे चरण में तय उत्सर्जन मानकों के अनुरूप होगी। सरकारी अधिकारियों ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया कि इस मोड में वाहन की रफ्तार इतनी कम की जा सकती है कि चालक उसे वर्कशॉप तक तो ले जा सकेंगे लेकिन उसका सामान्य इस्तेमाल मुश्किल हो जाएगा।
यह व्यवस्था ऑन-बोर्ड डायग्नॉस्टिक्स (ओबीडी) सिस्टम में शामिल की जा सकती है। ओबीडी वाहन में लगा निगरानी तंत्र होता है जो उत्सर्जन नियंत्रित करने वाले पुर्जों में खराबी का पता लगाता है और उसकी वजह से तय सीमा से अधिक उत्सर्जन होने पर चालक को आगाह करता है।
वाहन निर्माताओं के संगठन सायम ने प्रस्ताव दिया है कि चालक को गाड़ी की मरम्मत के लिए विवश करने वाली यह व्यवस्था (फोर्स रिपेयर) भविष्य में आने वाले बीएस-7 उत्सर्जन मानकों के साथ लागू की जाए। उसकी दलील है कि इसे लागू करने के लिए काफी काम करना होगा। लेकिन मंत्रालय ने उसका अनुरोध खारिज कर दिया है और कहा है कि बीएस-6 ओबीडी-2 में यह पहले से शामिल है और इसे बीएस-7 तक टालना उचित नहीं होगा।
फिलहाल भारत में बीएस-6 उत्सर्जन मानक लागू है और 2027 से बीएस-7 उत्सर्जन मानक लागू होने की संभावना है। नए मानकों के तहत प्रदूषण नियंत्रण तथा तत्काल निगरानी के मामले में अधिक सख्ती की जा सकती है।
1 अप्रैल, 2025 से बने वाहनों पर बीएस-6 ओबीडी-2 लागू किया गया है, जिसके तहत पेट्रोल से चलने वाला दोपहिया 1 किलोमीटर के सफर में अधिकतम 1,900 मिलीग्राम कार्बन मोनोऑक्साइड, 250 मिलीग्राम नॉन-मीथेन हाइड्रोकार्बन और 300 मिलीग्राम नाइट्रोजन ऑक्साइड का उत्सर्जन कर सकता है। पेट्रोल डायरेक्ट-इंजेक्शन इंजन वाले दोपहिया से 1 किलोमीटर के सफर में अधिकतम 50 मिलीग्राम पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) उतसर्जित करने की अनुमति है।
सरल शब्दों में इन उत्सर्जन स्तरों पर ओबीडी तंत्र वाहन की उत्सर्जन नियंत्रण प्रणाली में गंभीर खराबी का पता लगाकर उसकी सूचना देता है। यदि उस खराबी के कारण उत्सर्जन निर्धारित सीमा से ऊपर चला जाता है तो प्रस्तावित ‘फोर्स रिपेयर’ की वजह से वाहन का सामान्य इस्तेमाल तब तक मुश्किल होगा, जब तक उसकी मरम्मत नहीं कराई जाती।
यह मुद्दा ऑटोमोटिव इंडस्ट्री स्टैंडर्ड (एआईएस) 137 के तहत ओबीडी-2-बी आवश्यकताओं पर चर्चा के दौरान सामने आया। यह मानक गाड़ियों के उत्सर्जन परीक्षण और निगरानी के तरीके तय करता है। अधिकारियों ने बताया कि मंत्रालय ने सायम से ऐसा प्रस्ताव तैयार करने को कहा था,जो बताए कि वाहन का उत्सर्जन ओबीडी सीमा से ऊपर जाने पर उद्योग क्या करेगा।
सायम ने शुरू में ‘फोर्स रिपेयर’ के लिए कई विकल्पों पर विचार किया था, जिसका मकसद वाहन मालिक को मरम्मत कराने के लिए मजबूर करना था। इन विकल्पों में इंजन की पावर कम कर देना, रफ्तार घटा देना, वाहन को स्टार्ट ही नहीं होने देना, इंजन देर से स्टार्ट होना, हॉर्न के जरिये चेतावनी देना, लगातार तेज होती आवाज में ऑडियो चेतावनी देना, वाहन के बाहर से दिखने वाला संकेत देना, हेडलाइट जल्दी-जल्दी जलाना-बुझाना यानी ब्लिंक करना और ईंधन की सुई शून्य पर दिखाना शामिल थे।
अधिकारियों के अनुसार सायम की शुरुआती पसंद ऑडियो चेतावनी देने की थी। लेकिन अधिकारियों के निर्देश के बाद इसके दोपहिया वाहन समूह ने अधिक कारगर तरीकों पर विचार की सहमति जता दी। इसके बाद केवल चार विकल्प रखे गए – पावर कम करना, रफ्तार घटा देना, वाहन स्टार्ट नहीं होने देना और इंजन देर से स्टार्ट होना।
सायम के आकलन से पता चला कि पावर और स्पीड कम कर देना तकनीकी रूप से संभव है और वाहन चालक पर इसका असर भी ज्यादा पड़ेगा और वह मरम्मत कराने के लिए विवश होगा। लेकिन इन उपायों से सुरक्षा पर प्रभावों की समीक्षा अभी होनी है। वाहन को स्टार्ट नहीं होने देना कम सुविधाजनक माना गया और इंजन देर से स्टार्ट होने देना तकनीकी रूप से संभव और सुविधा के नजरिये से काफी हद तक स्वीकार्य माना गया।
सायम सुरक्षा, खराबी की चेतावनी या खराबी की चेतावनी के प्रकार, छेड़छाड़ से सुरक्षा और लागू करने के खर्च के हिसाब से भी विकल्प खंगाल रहा है। अधिकारियों के अनुसार संगठन ने मंत्रालय से कहा है कि ऐसी प्रणाली लागू करने से पहले काफी विकास कार्य अंजाम देने होंगे।
इसलिए सायम ने अनिवार्य ‘फोर्स-रिपेयर’ प्रावधान को मौजूदा बीएस-6 ओबीडी 2 फ्रेमवर्क के बजाय बीएस-7 उत्सर्जन मानकों का हिस्सा बनाने का सुझाव दिया था। मगर मंत्रालय और इंटरनैशनल सेंटर फॉर ऑटोमोटिव टेक्नोलॉजी (आईकैट) ने उसका प्रस्ताव खारिज करते हुए कहा यह जरूरत पहले से ही बीएस-6 आबीडी 2 का हिस्सा है। इस मामले में अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है।
मंत्रालय ने सायम और आईकैट से कहा है कि वे अगली बैठक में ठोस प्रस्ताव और उन्हें लागू करने की योजना पेश करें। अधिकारियों ने बताया कि इसका मतलब है कि ‘फोर्स-रिपेयर तंत्र’ का असल रूप कैसा होगा यानी इसमें पावर कम होगी, रफ्तार पर लगाम कसेगी, वाहन स्टार्ट नहीं होगा या देर से स्टार्ट होगा, यह फैसला अभी होना बाकी है। इस बारे में जानकारी के लिए सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय और सायम को ईमेल किया गया मगर खबर लिखे जाने तक जवाब नहीं आया।