भारत में ईवी चार्जिंग नेटवर्क तेजी से बढ़ रहा है। दिसंबर 2025 तक देश में चार्जिंग स्टेशनों की संख्या बढ़कर 29,151 हो गई, जो 2022 के करीब 5,000 स्टेशनों के मुकाबले लगभग छह गुना ज्यादा है। देशभर में 200 से अधिक चार्ज पॉइंट ऑपरेटर (CPO) इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं। रुबिक्स डेटा साइंसेज की रिपोर्ट में भारी उद्योग मंत्रालय के आंकड़ों के हवाले से यह जानकारी दी गई है।
देश के शीर्ष 10 राज्य कुल चार्जिंग स्टेशनों में करीब 78 फीसदी हिस्सेदारी रखते हैं। इनमें कर्नाटक 21 फीसदी हिस्सेदारी के साथ सबसे आगे है। इसके बाद महाराष्ट्र 14 फीसदी, उत्तर प्रदेश 8 फीसदी, दिल्ली 7 फीसदी और तमिलनाडु 6 फीसदी के साथ हैं।
वहीं, देश में चार्जिंग स्टेशनों के अलावा कुल चार्जरों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। 7 अगस्त 2026 तक देश में 67,657 चार्जर थे। इनमें बैटरी बदलने वाले स्टेशनों से जुड़े 1,139 चार्जर भी शामिल हैं। इन्हें हटाने पर 66,518 चार्जर में से 48,709 यानी करीब 73 फीसदी चार्जर 30 किलोवाट से कम क्षमता वाले हैं।
इससे साफ है कि ईवी की संख्या बढ़ने के साथ ज्यादा क्षमता वाले और तेज चार्जिंग करने वाले चार्जरों की जरूरत भी बढ़ेगी। ईवी की हिस्सेदारी फिलहाल सबसे ज्यादा तीन पहिया वाहनों में 60.77 फीसदी है। इसके बाद दोपहिया वाहनों में 8.88 फीसदी और चार पहिया वाहनों में 5.70 फीसदी ईवी हिस्सेदारी है।
रिपोर्ट के मुताबिक, चार्जिंग ढांचे के बढ़ने की मुख्य वजह ईवी का बढ़ता इस्तेमाल है। 2025 में देश में 2.82 करोड़ वाहनों का पंजीकरण हुआ, जिनमें 23 लाख से ज्यादा ईवी थे। इसके अलावा चार्जिंग स्टेशन लगाने के नियम आसान किए गए हैं। सरकार ने चार्जिंग स्टेशन को ऐसा कारोबार माना है जिसके लिए अलग लाइसेंस की जरूरत नहीं है।
केंद्र और राज्यों के अनुकूल नियमों के साथ तेल एवं गैस कंपनियों, बिजली कंपनियों और वाहन कंपनियों की बढ़ती भागीदारी भी इस क्षेत्र को बढ़ावा दे रही है। ई-थ्री-व्हीलर और ई-बस जैसे वाहनों के बेड़े का तेजी से विद्युतीकरण भी चार्जिंग की मांग बढ़ा रहा है। इन वाहनों से चार्जिंग स्टेशनों को नियमित और अनुमानित मांग मिलने की उम्मीद है।
सरकार की योजनाओं से भी ईवी चार्जिंग क्षेत्र को बढ़ावा मिल रहा है। पीएम ई-ड्राइव योजना को दो साल बढ़ाकर मार्च 2028 तक कर दिया गया है। साथ ही, योजना का कुल बजट बढ़ाकर 11,900 करोड़ रुपये कर दिया गया है। इसमें सार्वजनिक ईवी चार्जिंग ढांचे के लिए 2,000 करोड़ रुपये रखे गए हैं।
हालांकि, 24 मार्च 2026 तक इस योजना के तहत एक भी चार्जिंग स्टेशन नहीं लगाया गया था। रिपोर्ट के मुताबिक, योजना की अवधि बढ़ने से चार्ज पॉइंट ऑपरेटरों को आने वाले समय में चार्जिंग नेटवर्क बढ़ाने और इस क्षेत्र में कारोबार का विस्तार करने का अच्छा मौका मिल सकता है।
Also Read: ई-कमर्शियल वाहन कंपनियों की बढ़ी चिंता, पीएम ई-ड्राइव के लोकलाइजेशन नियम से दुविधा
चार्जिंग स्टेशनों की संख्या बढ़ने के बावजूद इनका इस्तेमाल अभी काफी कम है। एसबीआई की रिपोर्ट के अनुसार, चार्जिंग स्टेशनों का उपयोग सिर्फ 1 से 3 फीसदी है। वहीं, एसएंडपी ग्लोबल के मुताबिक यह करीब 5 फीसदी है। यानी ज्यादातर चार्जिंग क्षमता अभी खाली पड़ी है।
चार्जिंग कंपनियों के लिए बिजली की कीमत भी बड़ी समस्या है। अलग-अलग जगहों पर बिजली की दर 6 से 15 रुपये प्रति किलोवाट-घंटा तक है। जब किसी स्टेशन पर वाहन कम आते हैं, तो बिजली की यह लागत कंपनियों के मुनाफे पर दबाव डालती है।
रिपोर्ट में मॉल, हाईवे रेस्तरां और दूसरी व्यावसायिक जगहों पर लगाए गए चार्जिंग स्टेशनों से जुड़ी दिक्कतों का भी जिक्र है। ऐसे मामलों में चार्जिंग कंपनियां बिजली कनेक्शन के लिए जगह के मालिकों पर निर्भर रहती हैं। इससे बिजली बिल के भुगतान, जीएसटी, इनपुट टैक्स क्रेडिट और बिजली की लागत को लेकर परेशानी हो सकती है। इसके अलावा, चार्जिंग स्टेशन के लिए महंगी जगह लेना और हर महीने कम से कम 98 फीसदी समय चार्जर चालू रखना जरूरी होने से कंपनियों का खर्च और बढ़ जाता है।
रुबिक्स डेटा साइंसेज के अध्यक्ष तुषार भास्कर के मुताबिक, 2022 के बाद चार्जिंग स्टेशनों की संख्या छह गुना बढ़ी है, लेकिन उनका इस्तेमाल अभी भी सिर्फ 1 से 5 फीसदी है। ऐसे में कंपनियों के लिए सबसे जरूरी है कि वे ऐसे स्थानों पर चार्जिंग स्टेशन लगाएं जहां वास्तव में ज्यादा वाहन और बड़े वाहन बेड़े पहुंचते हों। सिर्फ चार्जिंग स्टेशनों की संख्या बढ़ाने से कारोबार सफल नहीं होगा।
रिपोर्ट में ईवी की भविष्य की मांग को लेकर अलग-अलग अनुमान दिए गए हैं। इंडिया एनर्जी स्टोरेज अलायंस के उच्च वृद्धि वाले अनुमान के अनुसार, 2032 तक सालाना ईवी बिक्री 12 गुना बढ़कर 3.04 करोड़ वाहन हो सकती है। वहीं, अलग-अलग उद्योग अनुमानों के अनुसार 2030 तक भारत की सड़कों पर 5 करोड़ तक ईवी हो सकते हैं।
सरकार ने 2030 तक नए वाहनों की बिक्री में 30 फीसदी ईवी हिस्सेदारी का टारगेट रखा है। रिपोर्ट में सीआईआई के एक अनुमान के मुताबिक, इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए 2030 तक देश में कम से कम 13.2 लाख चार्जिंग पॉइंट की जरूरत हो सकती है। यह मौजूदा संख्या से करीब 20 गुना ज्यादा है। यह अनुमान हर 40 ईवी पर एक चार्जर की योजना के आधार पर लगाया गया है।
आने वाले वर्षों में चार्जिंग कंपनियों के बीच तेज चार्जिंग वाले कॉरिडोर, ज्यादा आवाजाही वाली जगहों, अलग-अलग कंपनियों के वाहनों के लिए एक ही चार्जर की सुविधा और भरोसेमंद सेवा को लेकर प्रतिस्पर्धा बढ़ने की उम्मीद है। जिन कंपनियों के पास अच्छे स्थानों का नेटवर्क, बेहतर बिजली प्रबंधन और ग्राहकों के लिए अलग सुविधाएं होंगी, उनके इस बढ़ते बाजार में आगे रहने की संभावना ज्यादा है।