दिनेश कुमार की कहानी उत्तर प्रदेश के नोएडा और हरियाणा के मानेसर जैसे औद्योगिक केंद्रों की व्यापक हकीकत को दर्शाती है। उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद के रहने वाले और पेशे से दर्जी कुमार बेहतर अवसरों की तलाश में 2014 में नोएडा आए थे। उन्होंने एक कपड़ा कारखाने में लगभग 8,000 रुपये प्रति माह वेतन पर काम शुरू किया था। मगर एक दशक बाद भी उनका वेतन महज 13,200 रुपये ही हो पाया है। उनका वेतन अप्रैल 2026 से नोएडा में कुशल श्रमिकों के लिए संशोधित न्यूनतम मजदूरी (15,224 से 16,868 रुपये के बीच) से भी कम है।
तमाम कारखानों और निर्माण स्थलों पर मजदूरों ने बताया कि जीवन-यापन की बढ़ती लागत, कार्यान्वयन में गड़बड़ी और ठेके पर नियुक्ति को प्राथमिकता दिए जाने के मद्देनजर हालिया वेतन वृद्धि से मामूली राहत ही मिल सकती है।
नोएडा में ही एक बैटरी विनिर्माण इकाई में काम करने वाले अमरेज खान को अपनी आय 12,000 रुपये से बढ़कर 14,000-15,000 रुपये होने की उम्मीद है। वह बढ़ी हुई रकम को काफी हद तक अपने परिवार की मदद के लिए भेजेंगे।
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गुरुग्राम से सटे मानेसर में एक स्टील फैक्टरी में कटर का काम करने वाले हरीश तिवारी करीब 13,000 रुपये प्रति महीना कमाते हैं। मगर कमरे का किराया (1,000 रुपये), दो बच्चों के लिए स्कूल की फीस (3,000 रुपये), कोचिंग का खर्च (1,400 रुपये) और किराने का सामान आदि खर्च के लिए उनकी आय का अधिकांश हिस्सा पहले से ही निर्धारित है। हरियाणा सरकार द्वारा घोषित 35 फीसदी वेतन वृद्धि से उनकी आय करीब 18,500 रुपये तक हो सकती है। मगर इसे लागू होने को लेकर उनके मन में अनिश्चितता है।
दिहाड़ी मजदूरों की चिंताएं और भी गंभीर हैं। मानेसर के लेबर चौक पर श्रमिकों का कहना है कि अधिक मजदूरी के कारण रोजगार दिनों की संख्या कम हो सकती है। बिहार की रहने वाली श्रमिक मीना देवी ने कहा, ‘हमें 15 से 18 दिन काम मिलता था लेकिन विरोध-प्रदर्शन समाप्त होने के एक सप्ताह बाद भी अब तक बुलाया नहीं गया है।’ अन्य लोगों ने भी चिंता जताई कि ठेकेदार नियुक्तियों में कटौती कर सकते हैं ताकि उनका वेतन बिल न बढ़े।
श्रम संगठनों ने न्यूनतम मजदूरी में वृद्धि की प्रभावशीलता को सीमित करने वाले ढांचागत कारकों की ओर इशारा किया। उनका आरोप है कि श्रम कानूनों के तहत अनिवार्य बुनियादी सुविधाएं आम तौर पर नहीं दिखती हैं जिससे श्रमिकों के खर्च बढ़ जाते हैं। भारतीय राष्ट्रीय प्रवासी श्रमिक संघ की दिल्ली इकाई के अध्यक्ष राकेश कुमार ने कहा, ‘100 से अधिक श्रमिक वाले कारखानों को सब्सिडी वाला भोजन उपलब्ध कराना होता है लेकिन अधिकतर कारखाने ऐसा नहीं करते हैं।’ श्रमिकों ने भोजन का खर्च खुद उठाने की बात कही।
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सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन्स (सीटू) के महासचिव इलामारम करीम ने कहा कि न्यूनतम मजदूरी योजना मूल रूप से छोटे कारखानों के लिए है जो अधिक भुगतान करने का खर्च नहीं उठा सकते। उन्होंने कहा, ‘न्यूनतम मजदूरी के बाद उचित मजदूरी और जीवन निर्वाह के लायक मजदूरी की अवधारणा है। लेकिन कोई भी बड़ा कारखाना न्यूनतम मजदूरी से आगे जाने को तैयार नहीं है।
ठेका नियुक्ति पर बढ़ती निर्भरता से श्रमिकों की सुरक्षा काफी कमजोर हो जाती है। श्रम संगठनों का मानना है कि नोएडा के परिधान क्षेत्र में करीब 80 फीसदी मजदूर ठेके पर काम करते हैं। वे आम तौर पर भविष्य निधि, वार्षिक वृद्धि या चिकित्सा लाभ जैसी सुविधाओं से वंचित हैं।
ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक) के जिला सचिव नईम अहमद ने कहा, ‘कपड़ा और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे कारखानों में काम की प्रकृति स्थायी होती है। उसमें खास कौशल की जरूरत होती है। मगर नियुक्तियां अभी भी ठेके पर होती हैं।’