सोना और चांदी को आमतौर पर सुरक्षित निवेश माना जाता है, खासकर वैश्विक अनिश्चितता के समय इसमें निवेश और बढ़ जाता है। लेकिन पश्चिम एशिया में जारी जंग के बीच दोनों ही कीमती धातुओं की चाल ने निवेशकों को चौंका दिया है। आंकड़ों के मुताबिक, ईरान और अमेरिका-इजरायल युद्ध के शुरू में सोने-चांदी में थोड़ी तेजी दिखी, लेकिन इसके बाद से अबतक करीब 22 फीसदी की गिरावट इन कीमती धातुओं में आ चुकी है।
2025 में दोनों धातुओं ने शानदार रिटर्न दिया था और दुनियाभर की प्रमुख एसेट क्लास से बेहतर प्रदर्शन किया था। चांदी में 165 फीसदी से ज्यादा की बढ़त दर्ज हुई, जबकि सोना 75 फीसदी से अधिक चढ़ा। यह तेजी 2026 की शुरुआत में भी जारी रही, जब जनवरी के अंत में सोना 5,500 डॉलर प्रति औंस के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया और चांदी 121 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच गई।
विश्लेषकों का कहना है कि 2025 में सोना-चांदी का प्रदर्शन इस बात का संकेत था कि निवेशक और केंद्रीय बैंक अपने पोर्टफोलियो में बड़े बदलाव कर रहे थे। लेकिन पश्चिम एशिया युद्ध शुरू होने के बाद स्थिति पूरी तरह बदल गई, जिससे तेल की कीमतें और महंगाई के जोखिम बढ़ गए।
उम्मीद के उलट, युद्ध की शुरुआत में थोड़ी तेजी के बाद दोनों धातुओं के दाम गिरने लगे। एक्सिस सिक्योरिटीज के आंकड़ों के अनुसार, इस दौरान सोने की कीमतों में 10 प्रतिशत से ज्यादा और चांदी में 22 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आई है।
विश्लेषकों के मुताबिक, शुरुआत में आई तेजी ज्यादा समय तक नहीं टिक पाई क्योंकि युद्ध जल्दी खत्म नहीं हुआ। तेल बाजार में आपूर्ति बाधित होने से आर्थिक अनिश्चितता और महंगाई का दबाव बढ़ा, जिससे अमेरिकी डॉलर मजबूत हुआ।
एक्सिस सिक्योरिटीज के सीनियर रिसर्च एनालिस्ट (कमोडिटी) देवया गागलानी ने कहा कि इस युद्ध का असर हर देश पर पड़ा है, जिससे आर्थिक गतिविधियां धीमी हुईं और डॉलर मजबूत हुआ। उनका कहना है कि मजबूत डॉलर सोना-चांदी की कीमतों को प्रभावित करने वाला बड़ा कारण बनकर उभरा है।
उन्होंने कहा कि अमेरिका ने ईरान की प्रतिक्रिया का गलत आकलन किया था। ईरान की जवाबी कार्रवाई और होर्मुज़ जलडमरूमध्य के बंद होने से महंगाई की चिंता बढ़ गई, जिससे इस साल फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद कम हो गई। इससे अमेरिकी डॉलर में मजबूती आई, जिसने बुलियन की कीमतों पर दबाव बनाया।
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अपने रिकॉर्ड हाई से सोने की कीमतें 16 फीसदी से ज्यादा गिरकर 6 अप्रैल तक लगभग 4,680 डॉलर प्रति औंस पर आ गई हैं। वहीं चांदी में और तेज गिरावट आई है, जो 35 प्रतिशत से ज्यादा टूटकर करीब 74 डॉलर प्रति औंस पर पहुंच गई है।
ऐतिहासिक आंकड़े बताते हैं कि आमतौर पर किसी संघर्ष की शुरुआत में सोना और चांदी की कीमतें बढ़ती हैं, लेकिन जैसे-जैसे स्थिति लंबी खिंचती है, यह तेजी कम हो जाती है।
आंकड़ों के अनुसार, जब फरवरी 2022 में रूस ने यूक्रेन पर हमला किया था, तब पहले हफ्ते में सोने की कीमतों में 4 फीसदी से ज्यादा की बढ़त हुई थी, लेकिन बाद में यह ठंडी पड़ गई। इसी तरह, चांदी की कीमतें भी शुरुआत में करीब 6 फीसदी बढ़ीं, लेकिन आने वाले हफ्तों में बढ़त बरकरार नहीं रख पाईं क्योंकि घटनाक्रम धीरे-धीरे कीमतों में शामिल हो गया।
2025 के भारत-पाकिस्तान संघर्ष के दौरान, सोना और चांदी की कीमतें लगभग स्थिर रहीं, क्योंकि यह स्थिति कम समय की थी और इससे वैश्विक व्यापार या तेल बाजार पर खास असर नहीं पड़ा।
चांदी के मामले में विश्लेषकों का कहना है कि इसकी मजबूत औद्योगिक मांग इसे आर्थिक गतिविधियों के प्रति बेहद संवेदनशील बनाती है। जब औद्योगिक गतिविधियां प्रभावित होती हैं, तो चांदी की मांग घट जाती है। यही वजह है कि यह केवल सुरक्षित निवेश नहीं बल्कि एक औद्योगिक धातु की तरह भी व्यवहार करती है। अनुमान के अनुसार, वैश्विक चांदी की मांग का लगभग 60 फीसदी हिस्सा औद्योगिक गतिविधियों से आता है। इसका उपयोग इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर पैनल, ऑटोमोबाइल और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में व्यापक रूप से होता है।
ज्वॉइस ब्रोकिंग की कमोडिटी एनालिस्ट कावेरी मोरे ने कहा कि युद्ध या भू-राजनीतिक तनाव के दौरान वैश्विक अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता बढ़ जाती है। कंपनियां नए निवेश टाल देती हैं, विस्तार योजनाएं स्थगित कर देती हैं और उत्पादन धीमा कर देती हैं। जब मैन्युफैक्चरिंग धीमी होती है, तो औद्योगिक धातुओं की मांग भी घटती है। इसका सीधा असर चांदी पर पड़ता है।
इसके अलावा, बढ़ती बॉन्ड यील्ड ने भी बुलियन बाजार पर दबाव डाला है। विश्लेषकों के अनुसार, भू-राजनीतिक संकट के दौरान निवेशक आमतौर पर अमेरिकी डॉलर और अमेरिकी सरकारी बॉन्ड की ओर रुख करते हैं। चूंकि सोना और चांदी वैश्विक बाजार में डॉलर में कीमत तय होते हैं, इसलिए मजबूत डॉलर इन्हें महंगा बना देता है। ऐसे में अन्य मुद्राओं के निवेशकों की रुचि कम हो जाती है।
कावेरी ने कहा कि भू-राजनीतिक तनाव के दौरान निवेशक पूंजी को अमेरिकी सरकारी बॉन्ड और डॉलर में शिफ्ट करते हैं, क्योंकि वे इन्हें सुरक्षित और तरल संपत्ति मानते हैं। यह ट्रेंड आम है क्योंकि ऊंची यील्ड फिक्स्ड-इनकम निवेश को कीमती धातुओं के मुकाबले ज्यादा आकर्षक बनाती है।
विश्लेषकों का कहना है कि तनाव बढ़ने से तेल की कीमतें ऊपर गई हैं, जिससे भविष्य में महंगाई बढ़ने की चिंता पैदा हुई है। इससे मौद्रिक नीति में ढील की उम्मीद कम हुई है और लंबे समय तक ऊंची ब्याज दरें रहने या बढ़ने की संभावना बढ़ गई है।
एचडीएफसी सिक्योरिटीज के सीनियर एनालिस्ट (कमोडिटी) सौमिल गांधी ने कहा कि अगर महंगाई बढ़ती है, तो केंद्रीय बैंक ब्याज दरें ऊंची रख सकते हैं। ऐसे में निवेशक कभी-कभी कीमती धातुओं से पैसा निकालकर ब्याज देने वाले साधनों में लगाते हैं।
उन्होंने कहा कि केंद्रीय बैंकों की गतिविधियों से भी दबाव बढ़ा है। रूस और तुर्किये ने अपनी मुद्रा को स्थिर करने के लिए बड़ी मात्रा में सोने के भंडार बेचने की खबर है, जिससे बाजार में आपूर्ति बढ़ गई है।
जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के कमोडिटी रिसर्च प्रमुख हरीश वी ने कहा कि जब तक मौद्रिक स्थितियों में ढील नहीं आती और महंगाई की उम्मीदें नहीं बदलतीं, तब तक कीमती धातुओं में तेजी लौटने की संभावना कम है। इससे साफ है कि फिलहाल वित्तीय कारक भू-राजनीतिक कारणों से ज्यादा प्रभावी हैं।
इसके अलावा, कीमती धातुओं में आई तेज तेजी अब खत्म हो रही है, क्योंकि शॉर्ट टर्म ट्रेडर अपने लॉन्ग पोजीशन से बाहर निकल रहे हैं, जिससे कुछ मामलों में मजबूर बिक्री देखने को मिल रही है।