दुनिया में जो माहौल है उसने हमें घरेलू कमजोरियों के बारे में नए सिरे से चिंतित किया है। इजरायल-अमेरिका और ईरान के बीच छिड़े सैन्य संघर्ष ने ऊर्जा बाजार में उथलपुथल पैदा की है और जोखिम की गणना को बदल दिया है। भारत की बात करें तो तेल कीमतों के कारण लग रहे झटकों के वृहद आर्थिक प्रभाव 1970 के दशक के आरंभ से ही दिक्कतदेह बने रहे हैं। ढांचागत कमजोरी को आंकड़ों में ही महसूस किया जा सकता है।
देश की कुल ऊर्जा आपूर्ति में आयातित कच्चे तेल की हिस्सेदारी 21.7 फीसदी है। आयातित प्राकृतिक गैस अतिरिक्त 2.6 फीसदी है। ये मिलकर 24.3 फीसदी का जोखिम बनाते हैं। भारत के रणनीतिक लेखन ने लंबे समय से इस निर्भरता के जोखिमों का दस्तावेजीकरण किया है, खासकर एक राजनीतिक रूप से अस्थिर क्षेत्र पर। इसका एक जवाब यह है कि हम भाग्यशाली हैं, भारतीय भूभाग को प्रचुर मात्रा में सौर ऊर्जा प्राप्त है। नवीकरणीय ऊर्जा की आधुनिक तकनीकें ऊर्जा स्वतंत्रता की नींव प्रदान करती हैं।
इस सफर में हम कहां हैं? बीते एक दशक में देश में आधुनिक नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन में सालाना आधार पर 8 फीसदी वृद्धि हुई। एक दशक में 8 फीसदी वृद्धि के साथ विशुद्ध उत्पादन में जबरदस्त इजाफा होगा। परंतु इसके बावजूद हम बहुत अच्छी हालत में नहीं हैं। आधुनिक नवीकरणीय ऊर्जा कुल ऊर्जा आपूर्ति का केवल 3.2 फीसदी है। यानी हमारी दशकों की ऊर्जा नीति की उपलब्धि एक ही अंक में सिमट जाती है।
आधुनिक आर्थिक वृद्धि ऊर्जा-गहन होती है। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का विस्तार ऊर्जा आपूर्ति में समानुपाती विस्तार की मांग करता है। जनसांख्यिकी, शहरीकरण और औद्योगीकरण यह सुनिश्चित करते हैं कि ऊर्जा की मांग बढ़ेगी। इस आपूर्ति की संरचना में एक संरचनात्मक परिवर्तन होना आवश्यक है। वर्तमान में, पारंपरिक बायोमास कुल ऊर्जा आपूर्ति का 20 फीसदी है। आर्थिक आधुनिकीकरण का अर्थ है बायोमास का विस्थापन। इसमें औद्योगिक प्रक्रियाओं, परिवहन लॉजिस्टिक्स और घरेलू खपत का गहन विद्युतीकरण शामिल है। वृहद आर्थिक प्रोफाइल को बदलने और ऊर्जा सुरक्षा प्राप्त करने के लिए, नवीकरणीय ऊर्जा की भूमिका क्रमिक रूप से नहीं बढ़ सकती। प्रणाली को परिमाणात्मक विस्तार की आवश्यकता है। प्रश्न यह है कि कुल ऊर्जा आपूर्ति में नवीकरणीय ऊर्जा को 32 फीसदी तक कैसे पहुंचाया जाए?
हमें 3.2 फीसदी हिस्सेदारी तक पहुंचने में दो दशक का वक्त लगा। तो वर्तमान ढांचे में यह जल्दी 32 फीसदी तक नहीं पहुंचेगा। इसके लिए ऊर्जा नीति में बुनियादी बदलाव आवश्यक हैं। सब्सिडी में क्रमिक समायोजन या सार्वजनिक क्षेत्र के आदेश इस अंतर को नहीं भर पाएंगे। पूंजी जुटाने और प्रोत्साहनों को सुसंगत करने के लिए तीन संरचनात्मक बदलाव आवश्यक हैं।
पहला तत्त्व है बिजली क्षेत्र में परिवर्तन। वर्तमान ढांचा केंद्रीय योजना पर आधारित है। सरकार की संस्थाएं खरीद की योजना बनाती हैं, मात्रा तय करती हैं और कीमतों का प्रबंधन करती हैं। यह संस्थागत व्यवस्था पूंजी का गलत आवंटन करती है, जोखिम उठाने से रोकती है और नवाचार को हतोत्साहित करती है। केंद्रीय योजना आधुनिक, विकेंद्रीकृत ग्रिड की जटिलता को नहीं समझ सकती, जो अस्थिर नवीकरणीय स्रोतों से संचालित होता है। प्रणाली को मूल्य तंत्र की ओर स्थानांतरित होना चाहिए। बिजली बाजारों की संरचना ऐसी होनी चाहिए कि कीमतें वास्तविक समय में आपूर्ति और मांग के आधार पर तय हों।
बाजार कीमत और लाभ दरें वे तंत्र हैं जो आर्थिक गतिविधि को सही ढंग से संगठित करते हैं। जब मूल्य प्रणाली काम करती है, तो यह नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन, प्रसारण अधोसंरचना और ऊर्जा भंडारण में निजी निवेश को आकर्षित करती है। पूंजी उन समाधानों की ओर प्रवाहित होती है जो ग्रिड की बाधाओं को दूर करते हैं। केंद्रीय योजनाकार सही तकनीकों का राजनीतिक-अफसरशाही चयन करने की कोशिश करते हैं। बाजार जोखिम उठाते हैं और सबसे कम लागत वाले समाधान खोजते हैं। राज्य को वह बाजार ढांचा बनाना चाहिए जिसके भीतर लाखों निजी एजेंट बिना बाधा वाले मूल्य संकेतों के आधार पर अपनी ऊर्जा उत्पादन और खपत के निर्णयों का अनुकूलन कर सकें।
दूसरा तत्व बाह्यताओं पर कराधान से जुड़ा है। ऊर्जा विकल्पों में छिपी हुई लागतें होती हैं। जीवाश्म ईंधन का दहन सार्वजनिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाता है, जलवायु परिवर्तन में योगदान देता है और तेल और गैस आयात के माध्यम से देश के लिए एक रणनीतिक कमजोरी पैदा करता है, खासकर अस्थिर क्षेत्र से। भारत के लिए कार्बन कर सबसे उपयुक्त हस्तक्षेप है। यह कार्बन उत्सर्जन के लिए एक मूल्य तय करता है, जिससे पूरी अर्थव्यवस्था में सापेक्ष कीमतें बदलकर अशुद्ध ईंधनों से दूर हो जाती हैं।
जब कार्बन-गहन गतिविधियां महंगी हो जाती हैं, तो निजी कंपनियां अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं को समायोजित करती हैं। पूंजी ऊर्जा दक्षता और नवीकरणीय विकल्पों की ओर पुनः आवंटित होती है। कार्बन टैक्स ऊर्जा बदलाव को आगे बढ़ाने के लिए लाभ प्रेरणा का उपयोग करता है। भारतीय अर्थव्यवस्था पर पहले से ही भारी कर लगाया जाता है और कोई भी अधिक कर नहीं चाहता।
आगे का रास्ता अप्रत्यक्ष करों के राजस्व-तटस्थ सुधार में निहित है। वर्तमान माल एवं सेवा कर (जीएसटी) में विविध और ऊंची दरें तथा जटिल वर्गीकरण शामिल हैं। यह संरचना अनुपालन लागत वाली है और संसाधन आवंटन को विकृत करती है। कार्बन टैक्स से प्राप्त राजस्व लंबे समय से लंबित सुधार को वित्तपोषित कर सकता है, यानी कम और एकल दर वाले जीएसटी की ओर बढ़ना।
तीसरा तत्व है वित्त। नवीकरणीय ऊर्जा पूंजी-गहन है। परियोजनाओं की व्यवहार्यता कम लागत वाली इक्विटी और दीर्घकालिक ऋण तक पहुंच पर निर्भर करती है। नवीकरणीय ऊर्जा हिस्सेदारी में 10 गुना वृद्धि के लिए भारी पूंजी निर्माण की आवश्यकता है। अधोसंरचना निर्माण में उत्पादन और भंडारण क्षमता, ग्रिड विस्तार और भंडारण तकनीकें शामिल हैं। मांग पक्ष पर भी बड़े निवेश की आवश्यकता है, जैसे विद्युत गतिशीलता की ओर बदलाव। भारतीय राज्य के बहीखाते में इस विस्तार को वित्तपोषित करने की क्षमता नहीं है। घरेलू वित्तीय प्रणाली भी इसी तरह सीमित है। संसाधन आवश्यकता घरेलू बचत से अधिक है।
इसका समाधान भारतीय अधोसंरचना जरूरतों को वैश्विक पूंजी बाजारों से जोड़ने में शामिल है। पूंजी के सीमा-पार आवागमन में बाधा वित्तपोषण की लागत को बढ़ा देती है। नियामक दिक्कतें और हेजिंग लागत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश को हतोत्साहित करती हैं। ऊर्जा बदलाव के लिए वित्तीय उदारीकरण आवश्यक है। पूंजी प्रवाह पर बाधा हटाने से वैश्विक बचत भारतीय स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं में प्रवेश कर सकती है, जिससे परियोजना वित्त का गणित बदल जाता है।
भू-राजनीतिक टकराव हमारी आर्थिक वास्तविकता को स्पष्ट करने में मदद करता है। आयातित जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता भारतीय स्थिरता में एक बाधा है। इस बाधा से बाहर निकलने के लिए उन तरीकों को छोड़ना आवश्यक है जिन्होंने इसे पैदा किया। नवीकरणीय ऊर्जा की 3.2 फीसदी हिस्सेदारी केंद्रीय योजना, बिना तय मूल्य वाली बाह्यताओं और पूंजी नियंत्रणों का उत्पाद है। वांछित 32 फीसदी हिस्सेदारी तक पहुंचने के लिए हमें दिशा बदलनी होगी। इसके लिए मूल्य प्रणाली पर आधारित बिजली व्यवस्था, कार्बन टैक्स और पूंजी खाते की परिवर्तनीयता आवश्यक है।
(लेखक एक्सकेडीआर फोरम में शोधकर्ता हैं। ये उनके निजी विचार हैं)