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समलिंगी विवाह और लैंगिक हालात की समीक्षा

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Last Updated- April 25, 2023 | 11:10 PM IST
Supreme Court

भारतीय कानून के मुताबिक हत्या के लिए दोषसिद्ध अपराधी जो सजायाफ्ता हो या मृत्यु दंड की प्रतीक्षा कर रहा हो उसे भी किसी से विवाह करने का अ​धिकार है, बशर्ते कि उससे विवाह करने की इच्छा रखने वाला या वाली समलैंगिक न हो। इस प्रावधान का किसी काल्पनिक हत्यारे की यौन आवश्यकताओं से कोई खास लेनादेना नहीं है।

इसका असर हत्यारे की संप​त्ति पर पड़ता है। जाहिर सी बात है संप​त्ति का वारिस जीवनसाथी होता है। अगर काल्पनिक हत्यारे के अल्पवयस्क बच्चे हुए तो उसकी पत्नी स्वाभाविक रूप से उन बच्चों की अ​भिभावक भी होती है। ऐसे में कानून अपरा​धियों को भी यह निर्णय लेने की इजाजत देता है कि उसकी वैध संपत्तियों में से किसे कौन सा हिस्सा मिलेगा?

इस वैचारिक प्रयोग को थोड़ा और आगे बढ़ाएं तो अगर हत्यारा शादी करता है और फिर जेल में रहते हुए उसका तलाक हो जाता है तो उसके जीवन साथी का उसकी संप​त्ति पर दावा होता है। इसी प्रकार हत्यारे का भी अपने जीवनसाथी की संप​त्ति पर दावा होता है।

ये अ​धिकार हैं विरासत का अ​धिकार, अ​भिभावक होने का अ​धिकार, बतौर संरक्षक अ​धिकार और गुजारा-भत्ता पाने का अ​धिकार। इन दिनों समलैंगिक विवाह को लेकर जो भी बातचीत चल रही है उसमें बहस के केंद्र में यही अ​धिकार हैं। हर जगह जहां समलैंगिक विवाहों को लेकर बहस हुई है वहां यही
अ​धिकार सबसे प्रधान है।

सहमति देने वाले वयस्कों के यौन व्यवहार से किसी को कोई मतलब नहीं होना चाहिए हालांकि हमारे देश में तथा अन्य देशों में भी रूढि़वादी व्य​क्ति समलैंगिक विवाहों का विरोध करते हैं। वे ऐसे विवाहों को ‘अप्राकृतिक’ तथा ‘अपनी संस्कृति के विपरीत’ बताते हैं।

नवतेज जोहार बनाम भारत सरकार के मामले में 2018 में सर्वोच्च न्यायालय के पांच न्यायाधीशों वाले एक पीठ ने सर्वसम्मति से यह माना कि भारतीय दंड संहिता की धारा 377 जो ‘अप्राकृतिक यौन गतिवि​धियों’ के बारे में है, वह असंवैधानिक है। उसे इसलिए असंवैधानिक ठहराया गया क्योंकि वह दो समलिंगी व्य​क्तियों के बीच सहमति से यौन संबंधों को आपरा​धिक ठहराती थी। ऐसे में इस संदर्भ में यौन व्यवहार का जिक्र अप्रासंगिक है, हालांकि इसके बावजूद लोग ऐसे संदर्भ देने से बाज नहीं आएंगे।

लिंग से इतर एक प्रश्न यह भी है कि आ​खिर लोग एक साथ रहने के बजाय विवाह ही क्यों करते हैं? भारतीय संदर्भ में जहां बहुत बड़ी तादाद में विवाह परिवारों द्वारा तय किए जाते हैं, वहां देखा जाए तो अक्सर यह परिवारों को यह आश्व​स्ति प्रदान करता है कि उनकी मेहनत से जुटाई गई संप​त्ति किसी ऐसे
व्य​क्ति के पास जाएगी जिसे परिवार ने मंजूरी प्रदान की हो।

आदर्श देसी परि​स्थितियों में दो व्य​क्ति अपने-अपने परिवार के आशीर्वाद से विवाह करते हैं। इसके बाद उनके बच्चे होते हैं और यह उम्मीद की जाती है कि उनकी विरासत स्वाभाविक रूप से उनके बच्चे संभालेंगे। इस बीच यौन गतिवि​धियां तो केवल संतानोत्पत्ति का एक माध्यम होती हैं। विवाह के दायरे में बच्चों का वि​धिक संरक्षण भी स्वाभाविक होता है।

अगर रिश्तों में कड़वाहट आ जाती है तो विवाह का औपचारिक प्रमाणपत्र भी बहुत उपयोगी साबित होती है। विवाह तलाक की ​स्थिति में संप​त्ति और आय के बंटवारे तथा अल्पायु बच्चों के संरक्षण की एक व्यवस्था प्रदान करता है। विवाह को लेकर हमारे देश में वि​भिन्न धर्मों के अलग-अलग कानून हैं। इसके अलावा एक विशेष विवाह अ​धिनियम भी है। इन सभी के अधीन अलग-अलग प्रावधान हैं।

परंतु सभी प्रकार के विवाह अ​धिनियमों के तहत तलाक होते हैं। शाह बानो मामले की तरह हम वि​भिन्न प्रकार के विवाह संबंधी व्य​क्तिगत कानूनों में तलाक के बाद होने वाले निपटारे की ​निष्पक्षता को लेकर बहस कर सकते हैं। परंतु सभी अ​धिनियमों में संप​त्ति और आय, तथा बच्चों के संरक्षण को लेकर हर
अ​धि​नियम में प्रावधान किए गए हैं। अनौपचारिक रिश्तों के लिए ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है।

अगर विवाह उन अ​धिकारों और दायित्वों को शामिल न किए हो तो बहुत कम लोग विवाह करेंगे या विवाह के लिए पारिवारिक दबाव महसूस करेंगे। अगर विवाह संबंधी अ​धिकार और दायित्व विपरीत लिंगी के साथ विवाह करने वाले किसी भी व्य​क्ति पर स्वत: लागू हो जाते हैं तो समलिंगी विवाह करने वालों के मामले में भी स्वाभाविक रूप से ऐसा ही होना चाहिए।

अगर यौन गतिवि​धियों से जुड़ी कामुक अप्रासंगिकता को हटा दिया जाए तो यह दलील एकदम सहज हो जाती है। इसके साथ ही समलिंगी विवाहों की इजाजत के बाद ऐसे संघों की पहचान करनी होगी जो विदे​शियों से संबं​धित हैं। शायद टिम कुक को इससे प्रसन्नता हो।

नि​श्चित रूप से समलिंगी विवाह तार्किक रूप से भारतीय कानून में निहित लैंगिक विषमता की समीक्षा को समाहित किए हुए होगा। उदाहरण के लिए हमारे यहां पुरुष और महिला की सहमति की आयु अलग-अलग है। विवाह विच्छेद के कानून भी पुरुष जीवन साथी को गुजारा भत्ता देने का प्रावधान नहीं करते और दो महिलाओं के समलिंगी विवाह में तो मामला बहुत अ​धिक जटिल हो सकता है।

इसमें सरोगेसी और गोद लेने संबंधी कानूनों की समीक्षा भी शामिल हो सकती है। अगर ऐसी समीक्षाएं होती हैं तो हम कहीं अ​धिक समतापूर्ण सामाजिक माहौल बना पाएंगे।

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First Published - April 25, 2023 | 11:10 PM IST

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