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‘ऑपरेशन सिंदूर’ के एक साल पूरे: भविष्य के युद्धों के लिए भारत को अब पूर्वी मोर्चे पर ध्यान देने की जरूरत

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आसिम मुनीर के बारे में सबसे अच्छी बात यह है कि वह बड़बोले हैं। अगर उनके पास जियाउल हक जैसी कुटिल मुस्कान और शातिर होशियारी होती, तो वह और भी बड़ी परेशानी साबित होते

Last Updated- May 03, 2026 | 10:35 PM IST
Eastern Front India
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

अगले सप्ताह ऑपरेशन सिंदूर की पहली वर्षगांठ होगी। ऐसे में हमें उन 87 घंटों के दौरान सैन्य प्रदर्शन की प्रेरक कहानियों की भरमार के लिए तैयार रहना चाहिए। परंतु हमें इसे रोकना चाहिए, और इसके पीछे कारण है। मेरा मानना है कि यह राष्ट्र हित में होगा कि हम अतीत को लेकर यूं जश्न के मिजाज में न रहें। इसके बजाय हमें भविष्य के युद्धों के बारे में सोचना चाहिए।

हमें अपने भू-भाग पर पश्चिम से अब पूर्व की ओर भी ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है। अभी पूर्वी मोर्चा शांत दिखाई देता है, लेकिन यह बदलेगा। याद कीजिए कि फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने 9 अगस्त, 2025 को टैम्पा, फ्लोरिडा में दिए अपने भाषण में डींग मारते हुए क्या कहा था। उन्होंने कहा था कि अगली बार पाकिस्तान युद्ध की शुरुआत पूर्व से करेगा, क्योंकि वहीं ‘भारत ने अपने सबसे मूल्यवान संसाधन स्थापित किए हैं।’

अब नक्शा खोलिए और नजर दौड़ाइए। हमारे 3,416 किलोमीटर लंबे पूर्वी समुद्री तट पर आप क्या देखते हैं? यह बंगाल की खाड़ी के ऊपर बांग्लादेश का छोटा सा 600 किलोमीटर का तट है, उसके बाद म्यांमार का 2,227 किलोमीटर लंबा तट, फिर थाईलैंड, जिसके दक्षिण में अंडमान सागर मलक्का स्ट्रेट के पार प्रशांत महासागर तक ले जाता है। बांग्लादेश और खासकर म्यांमार चीन के दबाव में आ सकता है। और अगर कभी थाईलैंड ने क्रा की संकरी 50 किलोमीटर की भूमि पट्टी पर नहर खोदने के अपने इरादे को अमली जामा पहनाने का फैसला किया तब जहाजों के प्रशांत महासागर से अंडमान सागर में पहुंचने का समय तीन दिन घट जाएगा।

इसके अलावा, यह सामरिक दृष्टि से एक दबाव क्षेत्र के रूप में मलक्का स्ट्रेट की हैसियत को कमजोर कर देगा।  यह अक्टूबर 2023 में उजागर हुआ था, जब तत्कालीन थाई प्रधानमंत्री श्रेत्थ थाविसिन ने बीआरआई फोरम में एक डूडल में इसका उल्लेख किया था और वह पेइचिंग में कैमरों में कैद हो गया। उस डूडल में ठीक उस संकरे स्थल पर एक नहर को दर्शाया गया था। यदि यह प्रोजेक्ट कभी हकीकत बनता है, तो इससे भारत का व्यस्त पूर्वी समुद्री तट, बड़े महानगर और औद्योगिक क्षेत्र चीन के सामने उजागर हो जाएंगे।

प्रशांत महासागर खतरनाक रूप से भारत के करीब आ जाएगा। ऐतिहासिक रूप से और सहज रूप से, भारत ने पश्चिम और उत्तर से चीन और पाकिस्तान के खतरे देखे हैं। पूर्व को अपेक्षाकृत कम ध्यान मिला है। क्वाड की बहुत चर्चा हुई है, और मलक्का स्ट्रेट पर भारत की पकड़ की भी। लेकिन मानसिक रूप से, भारत ने पूर्व को अपेक्षाकृत सौम्य दृष्टि से देखा है। इसका परिणाम यह है कि हमारी अधिकांश प्रमुख परिचालन संपत्तियां यानी सेना और वायु सेना उत्तर और पश्चिम की ओर केंद्रित हैं। यहां तक कि नौ सेना भी पश्चिम (पाकिस्तान) पर केंद्रित है। यह ध्यान उचित है, लेकिन अब पूर्व में मौजूद कमजोरी को दूर करना आवश्यक है।

प्रकृति और भूगोल ने भारत को अपनी रक्षा के लिए जरूरी संसाधन दिए हैं। पूर्व में अंडमान और निकोबार द्वीप को भगवान ने कभी न डूबने वाले विमान वाहक पोतों की तरह बनाया है। वहां बड़े पोत और पनडुब्बी भी संचालित हो सकते हैं और लड़ाकू तथा टोही विमान भी। वहां से भारत पूरी बंगाल की खाड़ी, अंडमान सागर और उसके आगे तक नजर रख सकता है।

यही बात ग्रेट निकोबार द्वीप को एक अद्भुत सामरिक संपत्ति बनाती है। राहुल गांधी ने पिछले दिनों वहां जाकर एक बहुउद्देश्यीय टाउनशिप सह ट्रांसशिपमेंट बंदरगाह का विरोध किया है। वह दरअसल एक बड़ा सैन्य अड्डा बनाने की योजना है जो भारत द्वारा चीन को मलक्का स्ट्रेट में रोकने की संभावना के गलत आकलन में उलझ गई है। 

यह संभव तो है लेकिन बहुत अधिक यथार्थवादी नहीं है। यह स्ट्रेट शक्तिशाली संप्रभु राष्ट्रों इंडोनेशिया, मलेशिया और सिंगापुर के बीच स्थित है। साथ ही, इसे अवरुद्ध करने के लिए भारत को ईरान की तरह लापरवाह होना पड़ेगा, जैसा कि उसने होर्मुज में किया, क्योंकि इससे मित्र और शत्रु दोनों प्रभावित होंगे। इनमें जापान, दक्षिण कोरिया, रूस भी शामिल हैं।

भारत के इतना जोखिम उठाने के लिए हालात वास्तव में बेहद निराशाजनक और गंभीर होने चाहिए। इसलिए यह कहीं अधिक आसान है कि द्वीपीय क्षेत्रों खासकर ग्रेट निकोबार को भारत की अग्रिम रक्षात्मक ढाल के रूप में देखा जाए। यदि इन्हें सावधानी और धैर्यपूर्वक विकसित किया जाए तो ये पूर्वी भारत की रक्षा के लिए वही काम कर सकते हैं जो उत्तर में हिमालय करता है। 

अगले 10-15 वर्षों में कौन-सा परिदृश्य अधिक संभावित है? भारत महासागरों में सक्रिय रूप से चीन की ओर बढ़ेगा, या चीन भारत को धमकाने के लिए भीतर आएगा? यह प्रत्यक्ष हो सकता है, या ध्यान भटकाने के रूप में यदि भारत पाकिस्तान के साथ बड़े संघर्ष में उलझा हो। यदि हम आपको उस विस्तारित नक्शे पर वापस ले जाएं तो आप कुछ छोटे-छोटे बिंदु देख सकते हैं जो लैंडफॉल द्वीप से केवल 20 किलोमीटर दूर हैं, जो अंडमान द्वीपसमूह का सबसे उत्तरी द्वीप है।

अंडमान की शुरुआत से बहुत दूर, यहां म्यांमार का ग्रेट कोको द्वीप स्थित है। यह केवल 14.57 वर्ग किलोमीटर का है लेकिन इसमें पहले से ही 7,500 फुट लंबा हवाई पट्टी है, जो ग्रेट निकोबार में हमारे देश द्वारा बनाई पट्टी से भी लंबी है। कोको द्वीप पर चीनी यात्राएं हुई हैं (इसमें चार और छोटे द्वीप हैं जिन्हें लिटिल कोको श्रृंखला कहा जाता है) और जो कोई भी यहां चीनी उपस्थिति की संभावना को नकारता है, म्यांमार में व्याप्त अराजकता को देखते हुए इतिहास उसे माफ नहीं करेगा। क्वाड की उत्साह भरी चर्चाओं ने हमारी रणनीतिक दृष्टि को धुंधला कर दिया है।

भारत के लिए यह यथार्थवादी सोच नहीं है कि हम अमेरिका और उसके सहयोगियों की ओर से चीन के खिलाफ मलक्का स्ट्रेट को अवरुद्ध करें। तात्कालिक आवश्यकता यह है कि हम पूर्व में अपनी समुद्री रक्षा को मजबूत करें। इसीलिए द्वीपों का तत्काल सैन्यीकरण जरूरी है। भारत अगर इस सामरिक उपहार का लाभ नहीं उठाता है तो गलती करेगा।

याद रहे कि मलक्का स्ट्रेट से गुजरने वाले हर जहाज को ‘सिक्स डिग्री चैनल’ से गुजरना ही पड़ता है, जो भारत के ‘विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र’ में पड़ता है। इन द्वीपों की पूरी अहमियत को समझने के लिए हमें भविष्य में आने वाले खतरों का अनुमान लगाना होगा और अतीत के मसलों पर युद्ध लड़ने, खासकर 87 घंटे की झड़प जैसी उलझनों से बचना होगा।

अंत में हम आसिम मुनीर पर लौटते हैं। उनके बारे में सबसे अच्छी बात यह है कि वह बड़बोले हैं। अगर उनके पास जियाउल हक जैसी कुटिल मुस्कान और शातिर हो​शियारी होती, तो वह और भी बड़ी परेशानी होते। जिया चुपचाप पीठ में छुरा घोंपते थे, जबकि मुनीर डींगें हांकते हैं। यही कारण है कि जब हमारा ध्यान पूर्व की ओर बढ़ता है, तो हमें दो प्रश्नों पर बहस करनी होगी। पहला, वह किस चीज़ को ‘सबसे मूल्यवान’ कहते हैं। और दूसरा उन संपत्तियों को निशाना बनाने के लिए उनके पास कौन-से साधन होंगे।

मेरे पास कुछ अनुमान हो सकते हैं, लेकिन मैं किसी को केवल एक स्तंभ में विचार नहीं देना चाहता। मैं इतना ही कह सकता हूं कि वह सिलिगुड़ी की बात नहीं कर रहे हैं, जैसा कि कई लोगों ने सहज रूप से मान लिया था, खासकर उस समय जब बांग्लादेश के प्रति गुस्सा और अविश्वास सरकार समर्थक सोशल मीडिया में चरम पर था। मैं बस यही कहूंगा कि पूर्व के बारे में सोचिए, पूर्वी समुद्री तट के बारे में सोचिए, और इस बीच उन द्वीपों पर शक्ति और निगरानी बढ़ाते रहिए।

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First Published - May 3, 2026 | 10:35 PM IST

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