भारत आर्थिक अवसर गंवाने के मामले में विश्व चैंपियन है। स्वतंत्रता के बाद हमने मिश्रित अर्थव्यवस्था का मॉडल अपनाया, जबकि औपनिवेशिक काल के बाद विकास कर रहे अन्य देश पूंजीवादी व्यवस्था की ओर बढ़ रहे थे। जिस समय जापान और एशियाई दिग्गज विनिर्माण तथा निर्यात में एक दूसरे को टक्कर देने की क्षमता तैयार करने में जुटे थे तब हमने लाइसेंस-परमिट राज अपनाया और अपने उद्यमियों को जकड़ लिया।
चीन ने उसी एशियाई दिग्गज मॉडल का इस्तेमाल कर 1980 के दशक के उत्तरार्द्ध में सुधार शुरू किया मगर हमारी आंखें तब भी नहीं खुलीं। हमने लाइसेंस-परमिट राज तब छोड़ा, जब 1990 के दशक में बाहरी दिवालियापन ने हमें मजबूर कर दिया। लेकिन तब भी हमने अपने फैक्टर बाजारों (श्रम, भूमि, कृषि) तथा सामाजिक क्षेत्रों (स्वास्थ्य और शिक्षा) को मुक्त कर सुधार का चक्र भी पूरा नहीं किया। नतीजा यह हुआ कि विनिर्माण क्रांति को लांघकर हम सीधे सीधे सेवा क्षेत्र में चले गए, जहां व्यापार के लिए सरकार की ओर से बाधाएं कम थीं।
हमें समझना होगा कि जब सुधार में बहुत देर हो जाती है तो कारोबार दूसरे विकल्प अपनाकर समस्या का समाधान ढूंढ लेते हैं। आज विनिर्माण में कम श्रम लगाने और बहुत पूंजी खाने वाले निवेश से उतना रोजगार नहीं आएगा, जितना तीन दशक पहले आ सकता था। सरकार ने ‘समाज के समाजवादी पैटर्न’ को अपनाने के चक्कर में जो बाधाएं खड़ी कीं, उद्यमी उन्हें लांघ गए।
इसका यह अर्थ नहीं है कि मोदी सरकार के उदारीकरण और सुधारों के वादों का कोई महत्त्व नहीं है, लेकिन आज उनसे उतना रोजगार नहीं मिलेगा, जितना 1990 के दशक और 2000 के शुरुआती वर्षों में मिल सकता था। किंतु उदारीकरण से जुड़े सुधार पूरी लगन से लागू हों तो विनिर्माण क्षेत्र को नया जीवन मिलेगा, जिससे सेवा क्षेत्र में रोजगार पैदा होंगे। सेवाओं का विकास तभी होगा जब बेचने और सेवा देने के लिए वास्तविक उत्पाद उपलब्ध हों।
न्याय की ही तरह सुधार में देर का मतलब सुधार से वंचित करना है। सुधारों में विलंब की भारी कीमत सरकारी खजाने को भी चुकानी पड़ती है। चूंकि रोजगार में सकल घरेलू उत्पाद से धीमी वृद्धि हो रही है, इसलिए अशांत युवाओं को हिंसक तथा अराजक होने से रोकने के लिए सरकार को लगातार मुफ्त सहायता देनी पड़ रही है।
लेकिन रोजगार देने वाली सेवाओं में सुधार करने में अभी देर नहीं हुई है। इसमें शिक्षा और स्वास्थ्य शामिल हैं, जो उत्पादक और शिक्षित कार्यबल के लिए आवश्यक हैं। हमारी प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था बेहद खराब है। यह अधिकतर बच्चों में सीखने की क्षमता ही विकसित नहीं कर पाती, जो भविष्य के तकनीक से चलने वाले कामकाजी माहौल में सफल होने के लिए जरूरी है। प्राथमिक शिक्षा का उद्देश्य बच्चे में पढ़ने, लिखने और गिनने की बुनियादी क्षमता विकसित करना है, लेकिन ज्यादातर बच्चे रटकर ही याद करते हैं।
स्नातक शिक्षा का उद्देश्य युवाओं को समस्या सुलझाने और रोजगार योग्य कौशल सीखने लायक बनाना है। लेकिन इंजीनियरिंग के अलावा दूसरे पाठ्यक्रमों में हमारी स्नातक शिक्षा उपयोगी कौशल वाले स्नातक तैयार नहीं करती। यह समझने के बाद कि उन्हें नौकरी नहीं मिल सकती, वे स्नातक असंतोष की भाषा सीख लेते हैं और हमारे ‘जागरूक’ शिक्षाविद तथा एक्टिविस्ट उनमें से कई को उपयोगी रोजगार के बजाय एक्टिविस्ट बनने के लिए तैयार करते हैं। प्राथमिक शिक्षा में हमें सरकारी स्कूल प्रणाली चलाने के लिए निजी क्षेत्र के शिक्षाविदों का सहारा लेना चाहिए (जहां जर्जर स्कूलों के जीर्णोद्धार और शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए आवश्यक रकम दान के माध्यम से जुटाई जा सकती है)। सस्ती, सामुदायिक गृह शिक्षा (होम स्कूलिंग) को भी बढ़ावा दिया जा सकता है क्योंकि लगभग सभी शहरों में बड़ी संख्या में शिक्षित गृहिणियां और शिक्षित बेरोजगार युवा हैं, जो बच्चों को आवश्यक प्राथमिक कौशल सिखा सकते हैं।
जो पूरी फीस भरते हैं, उनके लिए हमारी चिकित्सा शिक्षा इतनी महंगी है कि देखभाल करने के बजाय केवल पैसे के लिए काम करने वाले डॉक्टर तैयार होने की संभावना ज्यादा है। यदि आप डॉक्टर बनने में 50 लाख रुपये या ज्यादा खर्च करते हैं तो आपका पहला लक्ष्य उस निवेश को वापस पाना होगा, मरीजों की मदद करना नहीं। ऐसे में आप अंतहीन जांच की सलाह देकर या गैर-जरूरी ऑपरेशन करके उन मरीजों को लूटेंगे, जो पैसे दे सकते हैं।
आज मेडिकल डेटाबेस और तकनीक की मदद से डॉक्टर दूर बैठकर ही मरीज की जांच कर सकते हैं तथा दवा लिख सकते हैं तो योग्य नर्सों और चिकित्सा सहायकों को वे काम सिखाए जाएं, जो अभी केवल डॉक्टर कर सकते हैं। इसमें आयुर्वेद या यूनानी चिकित्सा पढ़ चुके डॉक्टर भी शामिल हो सकते हैं (क्योंकि वे जीव विज्ञान और बुनियादी स्वास्थ्य समस्याओं को समझते हैं)। उन्हें ऐसे पाठ्यक्रम कराए जा सकते हैं, जिनके बाद वे जांच कर सकेंगे और एलोपैथिक दवाएं लिख सकेंगे। एमबीबीएस डॉक्टरों के 90 प्रतिशत कार्यों में प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल हो सकता है।
कृषि में सुधार तो संविधान के पालन से ही हो जाएगा। संविधान में इसे राज्य सूची में रखा गया है, लेकिन अपनी न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) प्रणाली के जरिये ज्यादातर खर्च केंद्र सरकार करती है, जिसमें काफी बेजा खर्च भी होता है। खाद्य सुरक्षा का इंतजाम क्षेत्रीय स्तर पर होना चाहिए, लेकिन हम इसे केंद्रीय स्तर पर करते हैं, जिससे चावल के पहाड़ बन जाते हैं और कुछ चावल सड़ भी जाता है।
यदि केंद्र सरकार राज्यों से केवल इतना कह दे कि उन्हें अपनी खाद्य सुरक्षा खुद करनी है और अपने बफर भी खुद तैयार करने हैं – जिसका मतलब है कि खाद्य तथा उर्वरक सब्सिडी पर खर्च हो रहा पूरा धन राज्यों को दे दिया जाएगा – तो कई राज्य यह धन तथा जिम्मेदारी सहर्ष स्वीकार कर लेंगे।
इनमें से कुछ व्यावहारिक बातें इसीलिए साकार नहीं हो सकतीं क्योंकि निहित स्वार्थ बाधा खड़ी करते हैं। संकीर्ण हितों की धमकियों और बाधाओं के कारण हम बार-बार सुधार के रास्ते से भटक जाते हैं। जिन डॉक्टरों ने मेडिकल डिग्री के लिए मोटी रकम खर्च की है, वे नहीं चाहेंगे कि नर्सें, चिकित्सक सहायक और आयुर्वेदिक चिकित्सक भी उन्हें टक्कर दें।
नियमित स्कूलों की नौकरी, ट्यूशन और कोचिंग कक्षाओं से कमाने वाले तब शिक्षक नाखुश होंगे, जब होम-स्कूलिंग करने वाले छात्र उनके विशेष अधिकार छीन लेंगे। माध्यमिक और स्नातक शिक्षा पर खर्च होने वाला अधिकांश पैसा अभी बरबाद ही हो रहा है। इसमें बदलाव होना चाहिए मगर उससे विश्वविद्यालय प्रशासन और प्रोफेसर नाराज हो जाएंगे, जो अपने हित साधने के लिए खास तरीके से काम करने के आदी हैं। किसानों को मोटी सब्सिडी पर मिलने वाले यूरिया का इस्तेमाल चावल उगाने के लिए करने की आदत है, जिसे वे एमएसपी के जरिये बेचकर मुनाफा कमाते हैं। इसलिए वे भी सुधारों से जुड़ी अनिश्चितता पसंद नहीं करेंगे।
सुधार में देर का मतलब सुधार से वंचित करना है और जनता को समझाए बगैर सुधार किए तो हमेशा बाधाएं आएंगी। मोदी सरकार को कृषि सुधार इसीलिए वापस लेने पड़े क्योंकि कई शक्तिशाली किसान संगठनों ने उनका विरोध किया था। गुपचुप सुधार करने का रास्ता अब केंद्र, राज्य या स्थानीय निकायों के लिए नहीं बचा है। सुधार को सभी हितधारकों के साथ दैनिक बातचीत का हिस्सा बनना होगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)