विश्वविद्यालयों की प्रयोगशालाओं में होने वाली खोजों के वाणिज्यिक इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए ‘द स्पिनॉफ प्राइज’ के रूप में एक नई कोशिश की गई है। प्रतिष्ठित पत्रिका ‘नेचर’ की देखरेख में इसका संचालन हो रहा है। इस प्रक्रिया की शुरुआत नवंबर 2019 में हुई थी जिसमें करीब 150 आवेदन किए गए थे। अर्हता की शर्त यह थी कि खोज का वाणिज्यिक एवं कॉर्पोरेट इस्तेमाल नवंबर 2016 के बाद शुरू हुआ हो। पुरस्कार चयन की ज्यूरी ने 12 आवेदनों को ‘पिच स्लैम’ के लिए चुना जिन्हें समिति के समक्ष पेश होकर अपनी खोज के बारे में ब्योरा देना था। विजेता को करीब 34,000 डॉलर की सहयोग राशि एवं कई तरह के अधिकारों से नवाजा जाएगा।
खिताबी दौड़ में पहुंचने वाले सभी 12 प्रतिभागियों का संक्षिप्त परिचय इस तरह है: केजकैप्चर अणुओं को फंसाने के लिए छोटे एवं छिद्रयुक्त ढांचे बनाती है। आकार, स्वरूप एवं प्रकार्यात्मक रासायनिक समूहों को नियंत्रित कर पिंजरे वाले अणु विभिन्न प्रदूषकों को गिरफ्त में ले सकते हैं। इसे पानी के साथ हवा में भी फिल्टर के अनुकूल बनाया जा सकता है। केजकैप्चर के सह-संस्थापक एवं मुख्य तकनीकी अधिकारी मिंग ल्यू ने लिवरपूल यूनिवर्सिटी की मैटेरियल्स इनोवेशन फैक्टरी में एंड्रयू कूपर के साथ काम किया। कंपनी का दावा है कि इसके पिंजरे मौजूदा समय में चारकोल से बनने वाले फिल्टरों से 500 गुना अधिक कारगर हैं। कैरिस्टो डायग्नोस्टिक्स सीटी स्कैन के डेटा के विश्लेषण के लिए एल्गोरिदम का इस्तेमाल करती है। इससे यह शरीर में सूजन एवं जलन का जायजा लेकर दिल के दौरे की आशंका की गणना कर पाता है। कंपनी के मुख्य वैज्ञानिक अधिकारी चैरलम्बोस एंटोनिएडीस ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी में हृदयरोग विशेषज्ञ हैं। एपिवारियो का ताल्लुक फिलाडेल्फिया की पेंसिलवेनिया यूनिवर्सिटी से है। गहरे सदमे के बाद उपजने वाले तनाव संबंधी समस्याएं सदमा लगने के कई साल बाद भी उभर सकती हैं जिससे मरीज की नींद, कामकाज और रिश्ते भी प्रभावित हो सकते हैं। यह आबादी के 5-10 फीसदी हिस्से को प्रभावित करता है। इसके सह-संस्थापक फिलिप म्यूज और शेली बर्जर का जोर गुणसूत्र के डीएनए और हिस्टोन प्रोटीन में रासायनिक बदलाव करने पर होता है ताकि सदमे से जुड़ी स्मृतियां लंबे समय तक सुरक्षित न रहें।
इरेकैल थेरेप्यूटिक्स का नाता ज्यूरिख यूनिवर्सिटी और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से है। यह नाम ‘कैलरी को मिटाने’ वाले शब्दों से मिलकर बना है। कंपनी का ध्यान मोटापे पर काबू पाने के लिए भूख के अहसास को दबाने पर होता है।
फॉर्कहेड बायोथेरेप्यूटिक्स का ताल्लुक कोलंबिया यूनिवर्सिटी से है। फॉर्कहेड टाइप-1 डायबिटीज के मरीजों में इंसुलिन के दोबारा बनने की प्रक्रिया पर काम कर रही है। यह सेरोटोनिन नाम का हॉर्मोन पैदा करने वाली कोशिकाओं के इस्तेमाल से इंसुलिन बनने की प्रक्रिया फिर से शुरू करने की दिशा में प्रयासरत है। कोलंबिया के एक अंत:स्रावी विशेषज्ञ डोमेनिक एसिली ने इसकी स्थापना की है। मिवेन्डो की स्थापना बार्सिलोना स्थित पॉम्पियो फाब्रा यूनिवर्सिटी, बार्सिलोना हॉस्पिटल क्लिनिक, कैटेलोनिया पॉलिटेक्निक यूनिवर्सिटी और कैटलान इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च ऐंड एडवांस्ड स्टडीज ने मिलकर की है। इसकी योजना शरीर में पॉलिप और हानिकारक ऊतकों की पहचान को बेहतर करने के लिए माइक्रोवेव इमेजिंग के साथ कोलोनोस्कोपी का इस्तेमाल करने की है। इसके मुख्य तकनीकी अधिकारी मार्ता गुआर्डिओला एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर हैं।
ऑक्सफर्ड ब्रेन डायग्नोस्टिक्स फर्म का संबंध ऑक्सफर्ड से है। यह एक तरह की एमआरआई जांच पद्धति डिफ्यूजन टेंसर इमेजिंग का इस्तेमाल कर ऊतकों में पानी के विसर्जन पर नजर रखती है जिससे डिमेंशिया के शुरुआती लक्षणों को पहचाना जा सकता है।
प्रेडिक्टइम्यून का नाता कैम्ब्रिज से है। प्रतिरोध विशेषज्ञ केनेथ स्मिथ ने यह पाया कि बायो-मार्कर पेट फूलने की बीमारी आईबीडी के लंबे समय तक बने रहने के बारे में सटीकता से बता सकते हैं। स्कैलाइट फर्म ज्यूरिख स्थित स्विस फेडरल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से संबंधित है। इसके मुख्य कार्यकारी पीटर नेस्तोरोव इसे एक ‘बायो-मार्कर फैक्टरी’ बताते हैं। यह दो क्षेत्रों में काम करती है। पहला, एकल कोशिका का जैव विश्लेषण कर आरएनए विन्यास के जरिये व्यक्तिगत कोशिकाओं के बारे में जानकारी जुटाना। इसका दूसरा काम तंत्रिका संबंधी नेटवर्क का है। स्कैलाइट एकल कोशिका में बायो-मार्कर की पहचान के लिए विकसित तंत्रिका नेटवर्क सेलसीएन पर काम करती है। इसके जरिये कई स्वास्थ्य परिस्थितियों के बारे में जल्दी निदान किया जा सकता है।
सॉफ्टस्टोनिक्स का संबंध सैन डिएगो स्थित कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी से है। इसने एक नरम एवं लचीला पैच बनाया है जिसे कैरोटिड धमनी या जुगुलर शिरा के ऊपर पहना जा सकता है। इसके अल्ट्रासाउंड की मदद से मरीज के शरीर पर रक्तचाप पर 24 घंटे नजर रखी जा सकती है।
टेम्परियन थेरेप्यूटिक्स का ताल्लुक शिकागो की नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी से है। इसने करीब 5 करोड़ लोगों को प्रभावित करने वाली आत्म-प्रतिरक्षित बीमारी विटिलिगो को मदद पहुंचाने की कोशिश की है। जिंदगी पर कोई खतरा न होते हुए भी इसके मरीज मनोवैज्ञानिक तौर पर काफी परेशान रहते हैं। सह-संस्थापक कैरोलिन ली पूल ने पाया कि इसके लिए गर्मी झेलने में मददगार प्रोटीन एचएसपी70आई जिम्मेदार होता है। इस प्रोटीन के विन्यास में एक एमिनो एसिड के समावेश से स्वत:-प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को रोकना या उलट पाना संभव हो सकता है। सिबेल हेल्थ का संबंध इलिनॉय की नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी से है। त्वचारोग विशेषज्ञ शुआई जू ने समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चों की धड़कन, खून में ऑक्सीजन की मात्रा और रक्तचाप जैसे अहम संकेतकों की निगरानी के लिए सॉफ्ट सेंसर बनाए हैं। छोटे, लचीले, हल्के एवं बेतार सेंसर के जरिये एकत्रित सारे आंकड़े विश्लेषण के लिए सुरक्षित रखे जाते हैं।