राजस्व और व्यय शक्तियों के आवंटन में संघ और राज्यों के बीच असमान वितरण को देखते हुए, संविधान निर्माताओं ने हर पांच वर्ष में वित्त आयोगों की नियुक्ति का प्रावधान किया ताकि कर वितरण और राज्यों को अनुदान के माध्यम से वित्तीय हस्तांतरण निर्धारित किया जा सके। ये हस्तांतरण संघ और राज्यों को सौंपे गए कार्यों से उत्पन्न होने वाली राजस्व जुटाने की क्षमताओं और व्यय की आवश्यकताओं का आकलन करके तय किए जाते हैं। इन आकलनों में निर्णय लेना अपरिहार्य है। जैसा कि चौथे वित्त आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति पीवी राजमन्नार ने कहा था, यह आकलन ‘…पांच व्यक्तियों या उनके बहुमत के व्यक्तिगत विचारों पर आधारित एक जुआ है।’
फिर भी, इन निर्णयों को करते समय उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे (क) सातवीं अनुसूची में विस्तृत आवंटन प्रणाली, (ख) व्यापक आर्थिक स्थिरता और संघ तथा अलग-अलग राज्यों की विकासात्मक आवश्यकताओं; और (ग) कार्यात्मक क्षेत्रों में स्पष्टता का पालन करें। चूंकि आयोग को एक मध्यस्थ और अर्ध-न्यायिक विशेषज्ञ संस्था माना जाता है, इसलिए उससे निष्पक्ष रहने की अपेक्षा की जाती है।
सोलहवें वित्त आयोग का कहना है कि उसका दृष्टिकोण केंद्र और राज्यों के पास ‘उपलब्ध’ और ‘आवश्यक’ राजस्व संसाधनों पर विचार करके इस अंतर को पाटना था; साथ ही, सरकार के दोनों स्तरों पर अतिरिक्त राजस्व जुटाने के प्रयासों और खर्च में किफायत का अनुमान लगाना था, ताकि उपलब्ध और आवश्यक संसाधनों को पुनर्व्यवस्थित किया जा सके—और यह प्रक्रिया तब तक दोहराई जाती रही, जब तक कि एक स्वीकार्य संतुलन प्राप्त नहीं हो गया।
केंद्र सरकार की वित्तीय स्थिति का आकलन करते समय आयोग महामारी के दौरान केंद्र सरकार द्वारा अपनाए गए संयम और महामारी वर्ष में हुई उछाल के बाद घाटे और ऋण में कमी की सराहना करता है। हालांकि, यह इस तथ्य को अनदेखा कर देता है कि अगस्त 2003 में एफआरबीएम अधिनियम अपनाए जाने के बाद से, वर्ष 2007-08 को छोड़कर किसी भी वर्ष में केंद्र सरकार ने लगातार वित्त आयोगों द्वारा निर्धारित घाटे और ऋण लक्ष्यों का पालन नहीं किया है, और हमेशा किसी न किसी बहाने से बचती रही है।
विडंबना यह है कि लक्ष्य को स्वयं नीचे की ओर संशोधित किया जाना चाहिए था क्योंकि घरेलू क्षेत्र की वित्तीय बचत, जो उधारी की क्षमता तय करती है, 2002-03 में 10 फीसदी से घटकर 2011-12 में 7.4 फीसदी और आगे 2023-24 में 5.1 फीसदी रह गई है। केंद्र सरकार लगातार लक्ष्य बदलती रही है, परिभाषाएं बदलती रही है या चूक के लिए स्पष्टीकरण देती रही है। कुल राजकोषीय घाटा उपलब्ध उधारी क्षमता से काफी अधिक होने के कारण, कॉरपोरेट क्षेत्र को ऊंची उधारी लागत का सामना करना पड़ रहा है, जिससे निवेश का माहौल बिगड़ रहा है, या फिर उसे निवेश के लिए बाहरी धन की तलाश करनी पड़ रही है।
आकलन करते समय भी झुकाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। आयोग ने बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम्स) की समस्याओं और राज्य स्तर पर सब्सिडी व हस्तांतरणों की बढ़ती संख्या से उत्पन्न अपव्यय को सही रूप से चिह्नित किया है, लेकिन जब केंद्र सरकार की और भी बड़ी उदारता की बात आती है तो वह नजरअंदाज कर देता है।
बजट में दी गई प्रत्यक्ष सब्सिडियों के अलावा, केंद्र सरकार ने बीएसएनएल और एमटीएनएल के लिए कई विशाल, बहुवर्षीय राहत पैकेजों को मंजूरी दी है, जिनमें संयुक्त रूप से 2.3 लाख करोड़ रुपये के राहत पैकेज (2019, 2022, 2023), 4जी/5जी स्पेक्ट्रम आवंटन और ऋण पुनर्गठन शामिल हैं। प्रधानमंत्री द्वारा 22 अक्टूबर 2022 को शुरू किए गए ‘रोजगार मेला’ के तहत, जिसका उद्देश्य मिशन मोड में केंद्र सरकार के मंत्रालयों और विभागों में दस लाख कर्मियों की भर्ती करना था, अब तक 11 लाख से अधिक नियुक्ति पत्र जारी किए जा चुके हैं।
फरवरी 2019 में शुरू की गई पीएम-किसान योजना के तहत, जिसका उद्देश्य पूरे भारत में जोत वाले किसान परिवारों को आय सहायता प्रदान करना है, नवंबर 2025 तक 11 करोड़ से अधिक किसानों को 4.09 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि वितरित की जा चुकी है। क्या ये राजनीतिक कारणों से शुरू किए गए हस्तांतरण नहीं हैं? ये तो केवल कुछ उदाहरण हैं। आयोग ने इनको नजरअंदाज कर दिया।
इस किस्से का सबसे बड़ा मोड़ आयोग द्वारा केंद्र प्रायोजित योजनाओं (सीएसएस) और उपकर तथा अधिभार के माध्यम से उनके वित्तपोषण के प्रति किया गया व्यवहार है। आयोग का कहना है कि केंद्र से राज्यों को होने वाले हस्तांतरण का 50 फीसदी इन योजनाओं को जाता है और ये सकल घरेलू उत्पाद का 1.5 फीसदी हैं। चूंकि राज्यों को इन योजनाओं की लागत का 40 फीसदी वहन करना पड़ता है, उनकी निधियों का एक बड़ा हिस्सा केंद्र की प्राथमिकताओं को पूरा करने में लग जाता है, जिससे राजकोषीय संघवाद के मूल सिद्धांत का उल्लंघन होता है।
आयोग यह स्वीकार करता है कि इन योजनाओं की प्रभावशीलता और दक्षता की समीक्षा करने का कोई तंत्र नहीं है, फिर भी वह कहता है कि ‘सीएसएस ने राष्ट्र के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है’ और इन्हें संघ के व्यय की आवश्यकताओं का अभिन्न हिस्सा मानता है, तथा पिछले रुझानों के आधार पर अनुमान लगाता है।
निश्चित रूप से, किसी भी संघीय व्यवस्था में विशिष्ट उद्देश्य वाले हस्तांतरण होते हैं ताकि उन सेवाओं में न्यूनतम मानक सुनिश्चित किए जा सकें जिनका देशव्यापी असर होता है। लेकिन इसके लिए न्यूनतम मानकों को परिभाषित करना, उद्देश्य के लिए आवश्यक व्यय का अनुमान लगाना और उनके क्रियान्वयन की निगरानी करना आवश्यक है। वर्तमान में चल रही 80 प्रमुख योजनाओं में से कितनी इसका पालन करती हैं?
अधिकांश योजनाएं सूक्ष्म-प्रबंधन के तहत आती हैं, जिनमें राज्यों को प्रत्येक योजना के विभिन्न घटकों के अंतर्गत विस्तृत बजट तैयार करने की आवश्यकता होती है, लेकिन न तो स्पष्ट परिणाम लक्ष्य और न ही इनपुट लक्ष्य परिभाषित किए गए हैं। निस्संदेह, प्राथमिक शिक्षा, बुनियादी स्वास्थ्य देखभाल और जल आपूर्ति व स्वच्छता जैसी योजनाएं महत्वपूर्ण हैं, लेकिन न्यूनतम परिणाम मानकों को निर्दिष्ट करना, वित्तीय आवश्यकताओं को तय करना, योजनाओं को डिजाइन करना और विभिन्न राज्यों की जमीनी स्थिति के अनुसार उन्हें लागू करना आवश्यक है।
केवल यह दावा करना पर्याप्त नहीं है कि केंद्र प्रायोजित योजनाओं (सीएसएस) ने सेवा स्तरों में सुधार किया है। असली मुद्दा यह है कि क्या उन्होंने न्यूनतम मानकों को सुनिश्चित करने का उद्देश्य हासिल किया है, चाहे वे जैसे भी परिभाषित किए गए हों। अधिकांश योजनाएं राज्य सूची के कार्यों से संबंधित हैं। ऐसा संवैधानिक आयोग किस प्रकार इस तरह के अतिक्रमण का समर्थन कर सकता है जो संसाधनों के विभाज्य पूल को क्षीण करता है?
आयोग स्वीकार करता है कि ‘आर्थिक दक्षता का तर्क यह कहता है कि राजस्व स्रोत के रूप में उपकर और अधिभार पर निर्भरता, अल्पकालिक विशिष्ट आवश्यकताओं को छोड़कर, अवांछनीय है’, लेकिन वह यह राय व्यक्त करने के लिए भी तैयार नहीं है कि यह प्रथा हानिकारक है और सुदृढ़ वित्त या स्वस्थ संघ-राज्य वित्तीय संबंधों के हित में नहीं है।
(लेखक एनआईपीएफपी के पूर्व निदेशक हैं। ये उनके निजी विचार हैं)