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SEBI करने जा रहा बड़ा बदलाव, डेरिवेटिव ट्रेडिंग के कई नियम बदल सकते हैं

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सेबी ने डेरिवेटिव मार्केट को आसान और ज्यादा व्यवस्थित बनाने के लिए कई बड़े बदलावों का प्रस्ताव रखा है

Last Updated- May 15, 2026 | 9:11 AM IST
SEBI

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने गुरुवार को एक्सचेंज ट्रेडेड डेरिवेटिव्स (जिनमें कमोडिटी डेरिवेटिव्स भी शामिल हैं) को नियंत्रित करने वाले नियामकीय ढांचे में कई बदलावों का प्रस्ताव रखा। इन बदलावों का मकसद अनुपालन की ज़रूरतों को आसान बनाना, डुप्लीकेट प्रावधानों को हटाना और एक्सचेंजों पर नियामकीय बोझ को कम करना है।

मुख्य प्रस्तावों में, सेबी ने कमोडिटी डेरिवेटिव्स में कमोडिटी ऑप्शंस के लिए क्लोज-टू-द-मनी (सीटीएम) ऑप्शन सीरीज और उससे जुड़े नियमों को हटाने का सुझाव दिया है। नियामक ने बताया कि दुनिया के बड़े कमोडिटी एक्सचेंज सीटीएम फ्रेमवर्क को नहीं अपनाते हैं क्योंकि यह बाजार में हिस्सा लेने वालों के लिए एक्सरसाइज मैकेनिज्म को मुश्किल बना देता है और उनके लिए ऐसे ऑप्शंस से जुड़ी असल लागत का अंदाजा लगाना कठिन कर देता है।

सेबी ने यह भी स्पष्ट किया है कि जहां एक ओर स्टॉक एक्सचेंज पोजीशन लिमिट की निगरानी के लिए जिम्मेदार बने रहेंगे, वहीं वे औपचारिक समझौतों के जरिये इस निगरानी के परिचालन से जुड़े पहलू को क्लियरिंग कॉरपोरेशन को आउटसोर्स कर सकते हैं। इन समझौतों में भूमिकाओं, जिम्मेदारियों और व्यावसायिक व्यवस्थाओं को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाएगा।

एक और राहत देते हुए बाजार नियामक ने प्रस्ताव दिया है कि एक्सचेंज कॉन्ट्रैक्ट्स की एक्सपायरी डेट को आगे बढ़ा सकते हैं, ऐसे मामलों में जहां एक्सपायरी के दिन अचानक किसी घटना जैसे कि त्योहार या हड़ताल के कारण हाजिर बाजार बंद रहता है, बशर्ते उन्हें प्रबंध निदेशक से पहले मंजूरी मिल गई हो। एक्सचेंजों को बस बाजार प्रतिभागियों को पहले से ही उचित सूचना देनी होगी। अभी, एक्सपायरी डेट बदलने से पहले एक्सचेंजों को 10 दिन का नोटिस देना जरूरी होता है।

रेग्युलेटर ने ब्रोकर्स के लिए आधारभूत न्यूनतम पूंजी (बीएमसी) की जरूरत को आसान बनाने का भी प्रस्ताव दिया है। मौजूदा फ्रेमवर्क के तहत जिन ब्रोकर्स के पास पूरे देश में ट्रेडिंग टर्मिनल नहीं हैं, उन्हें बीएमसी की ज़रूरत के 40 फीसदी के बराबर जमा रखना ज़रूरी होता है। सेबी ने कहा कि यह नियम अब उतना प्रासंगिक नहीं रह गया है क्योंकि ज्यादातर ब्रोकर्स अब पूरे देश में काम करते हैं।

सेबी ने यह प्रस्ताव भी रखा है कि एक्सचेंजों को अब सख्त एक्सचेंज-स्तरीय पोजीशन लिमिट लागू करने से पहले नियामक को पहले से सूचना देने की जरूरत नहीं होगी। इसके अलावा, नियामक ने विभिन्न परिपत्रों के जरिये जारी किए गए संशोधनों को ढांचे के मसौदे में शामिल कर लिया है। इनमें प्रोडक्ट एडवाइजरी कमिटी की बैठकों की फ़्रीक्वेंसी, कमोडिटी वायदा पर ऑप्शंस लॉन्च करने के लिए पात्रता के नियम और कमोडिटीज पर डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स को नियंत्रित करने वाली शर्तें शामिल हैं।

प्रस्तावित बदलावों में डेरिवेटिव सेगमेंट का पुनर्गठन भी शामिल है, जिसमें प्रोडक्ट-विशिष्ट कैटेगरी को बड़े सेगमेंट में मिला दिया जाएगा। इस प्रस्ताव के तहत इंडेक्स फ्यूचर्स, इंडेक्स ऑप्शंस, स्टॉक फ्यूचर्स और स्टॉक ऑप्शंस को मिलाकर एक ही इक्विटी डेरिवेटिव्स सेगमेंट बनाया जाएगा। इसी तरह, करेंसी फ्यूचर्स और ऑप्शंस (जिनमें क्रॉस-करेंसी कॉन्ट्रैक्ट्स शामिल हैं) को एक ही करेंसी डेरिवेटिव्स सेगमेंट के तहत लाया जाएगा जबकि अलग-अलग समय-सीमा वाले इंटरेस्ट रेट फ्यूचर्स को इंटरेस्ट रेट डेरिवेटिव्स सेगमेंट के तहत एक साथ रखा जाएगा।

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First Published - May 15, 2026 | 9:11 AM IST

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