आने वाले दिनों में भी वैश्विक घटनाक्रम आर्थिक नतीजों एवं नीतिगत चयन को प्रभावित करता रहेगा। हालिया आंकड़ों से पता चलता है कि अगस्त माह में सालाना आधार पर भारत का निर्यात आंशिक रूप से कम हुआ जबकि क्रमिक आधार पर इसमें 9 फीसदी की गिरावट आई। निर्यात में गिरावट आने की कई वजह हैं और माना जा रहा है कि निकट भविष्य में परिदृश्य चुनौतीपूर्ण बना रहेगा। वैश्विक अर्थव्यवस्था में तेजी से धीमापन आ रहा है जो मांग को प्रभावित कर रहा है। ईंधन की महंगी कीमतें दुनिया भर में आम परिवारों का बजट बिगाड़ रही हैं और वस्तुओं की मांग में कमी आ रही है। भारतीय निर्यातकों का कहना है कि उन्हें सस्ती वस्तुओं के ऑर्डर मिल रहे हैं। हालांकि निर्यात कमजोर रहा है लेकिन आयात स्थिर बना रहा है। इसकी एक वजह यह भी है कि कच्चे तेल की कीमतें काफी ऊंची बनी रही हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार का मौजूदा दौर भी विदेशी वस्तुओं की मांग में इजाफे की वजह बन रहा है। इसके परिणामस्वरूप व्यापार घाटा ऊंचे स्तर पर बना हुआ है।
जुलाई के रिकॉर्ड स्तर से कुछ कम होने के बावजूद अगस्त में व्यापार घाटा 28.68 अरब डॉलर के स्तर पर रहा। अधिकांश अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि यह ऊंचे स्तर पर बना रहेगा। उन्होंने चालू खाते के घाटे के पूर्वानुमान को संशोधित किया है और पिछले वर्ष के जीडीपी के 1.2 फीसदी की तुलना में इस वर्ष इसके 3.5 से 4 फीसदी रहने का अनुमान जताया जा रहा है।
यद्यपि भारतीय रिजर्व बैंक घाटे की भरपाई करने के लिए आश्वस्त है लेकिन वैश्विक वित्तीय हालात चुनौतियों में इजाफा कर सकते हैं। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक जहां हाल के महीनों में आक्रामक बिकवाली के बाद भारतीय शेयर बाजारों में लौट आए हैं, वहीं उनकी भागीदारी वैश्विक हालात के सहारे रहेगी। हाल ही में केंद्रीय बैंकरों के जैकसन होल कॉन्क्लेव में इस बात के संकेत एकदम साफ थे कि केंद्रीय बैंक, खासकर अमेरिकी फेडरल रिजर्व मुद्रास्फीति पर नियंत्रण करने के लिए मौद्रिक नीति का आक्रामक इस्तेमाल करेगा। बड़े केंद्रीय बैंकों द्वारा दरों में निरंतर इजाफा और मौद्रिक हालात को सख्त बनाने का असर जोखिम वाली परिसंपत्तियों मसलन उभरते बाजारों के शेयरों पर भी पड़ेगा। इसके अलावा ऊंची ब्याज दरें वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेंगी जिससे उसमें धीमापन आएगा। यह बात भी भारत के निर्यात को प्रभावित करेगी। हालांकि धीमी वैश्विक वृद्धि से जिंस कीमतों में नरमी आ सकती है लेकिन भूराजनीतिक कारकों के कारण ईंधन कीमतों में तेजी का सिलसिला बना रह सकता है। रूस से होने वाली गैस आपूर्ति में निरंतर बाधा भी ईंधन कीमतों में और इजाफे की वजह बन सकती है। चालू खाते के घाटे में ऐसे समय इजाफा हो रहा है जब सरकार का राजकोषीय घाटा बढ़ा हुआ है और मध्यम अवधि में भी इसके ऊंचा बना रहने की उम्मीद है। हालांकि भारत के पास बचाव उपलब्ध है लेकिन ऊंचा दोहरा घाटा हमेशा वृहद आर्थिक स्थिरता के लिए खतरा होता है। यह संस्थागत विदेशी निवेशकों के लिए चिंता का विषय बन सकता है और आवक को प्रभावित कर सकता है। इस स्थिति में चालू खाते के घाटे की भरपाई करना और भी मुश्किल हो जाएगा। सरकार को कर संग्रह में सुधार का इस्तेमाल अपनी राजकोषीय स्थिति में सुधार के लिए करना चाहिए। इस बीच रिजर्व बैंक चालू खाते के घाटे पर ध्यान केंद्रित कर सकता है। रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने हाल ही में एक भाषण में इस बात को रेखांकित किया था कि रुपया अपेक्षाकृत स्थिर हालत में है। अमेरिकी डॉलर सूचकांक चालू वित्त वर्ष में 11.8 फीसदी बढ़ा है जबकि रुपये में केवल 5.1 फीसदी की गिरावट आई है। रुपया दुनिया की सबसे कम गिरावट वाली मुद्राओं में से एक है। ऐसा व्यापक तौर पर रिजर्व बैंक के आक्रामक हस्तक्षेप की वजह से हुआ।
बहरहाल यह बात ध्यान देने लायक है कि यह स्थिरता समय के साथ जोखिम बढ़ा सकती है। अगर रुपये को समायोजित नहीं होने दिया गया तो इसकी मजबूती चालू खाते की स्थिति को खराब कर सकती है क्योंकि तब आयात सस्ता होगा और निर्यात गैर प्रतिस्पर्धी हो जाएगा। चूंकि वैश्विक हालात निकट भविष्य में बदलते नहीं दिखते इसलिए यह अहम है कि मुद्रा को व्यवस्थित ढंग से समायोजित होने दिया जाए। राजकोषीय और चालू खाते के घाटे में समायोजन से वृहद आर्थिक स्थिरता बढ़ेगी और आर्थिक गतिविधियों को मदद मिलेगी। इससे निवेशकों का विश्वास भी मजबूत होगा।