भारत में अंग्रेजी के ‘के अक्षर’ की आकृति की तरह होने वाले सुधार में शेयर बाजार की तेज होती कीमतें और स्टार्टअप की खुशहाल दुनिया के साथ-साथ अधिकांश परिवारों की कठिनाइयां शामिल हैं। हाल के वर्षों में देश के मझोले भारत (मिडल इंडिया) को तमाम झटकों का सामना करना पड़ा। कोविड की दूसरी लहर के बाद यानी सितंबर 2021 के बाद सुधार की गति अपेक्षित नहीं रही है और उसके बाद कोविड का नया प्रकार ओमीक्रोन आ गया। इस बीच आर्थिक स्थिति के निरंतर तनाव में रहने के कारण परिसंपत्तियों की कीमत कम हुई है और उधारी बढ़ी। इसका मांग पर बुरा असर पड़ेगा, खासतौर पर उत्पादों की श्रेणी पर।
आज अर्थव्यवस्था की स्थिति के बारे में विचार करने का सही तरीका यह है कि महामारी के पहले की स्थितियों के साथ तुलना की जाए, न कि सालाना आधार पर होने वाली तुलना में उलझा जाए। कई पैमानों पर देखें तो जनवरी 2020 से जनवरी 2022 की अवधि वापसी की अवधि है। व्यापक शेयर बाजार का बाजार पूंजीकरण 266 लाख करोड़ रुपये के अभूतपूर्व स्तर पर है। बड़ी निजी कंपनियां अपनी निवेश परियोजनाओं को लेकर सतर्क हैं। इससे पता लगता है कि परिचालन मुनाफे में वृद्धि का परिदृश्य अच्छा नहीं है लेकिन मूल्यांकन काफी ऊंचा है।
जैसा कि ‘के अक्षर’ की शक्ल के सुधार से संकेत मिलता है मझोला भारत कई कठिनाइयों से दो चार है। वर्ष 2015 के बाद से कामकाजी लोगों की तादाद कमोबेश स्थिर है जबकि कामकाजी उम्र के लोगों की तादाद बढ़ रही है। महामारी के पहले के स्तर से तुलना करें तो बड़ी तादाद में परिवारों की आय घटी है।
मझोले भारत में बड़ी तादाद में छोटे कारोबारी और ऐसे लोग शामिल हैं जो संगठित क्षेत्र से नहीं आते। इस क्षेत्र को लगातार झटके लगे हैं। नोटबंदी से लेकर वस्तु एवं सेवा कर तथा महामारी तक। उसकी वित्तीय गहराई में कमी आई है क्योंकि परिसंपत्तियों के बिकने और ऋण की वजह से खपत में कमी आई है। कई परिवारों के लिए आर्थिक/वित्तीय हालात संकटपूर्ण हुए हैं। वृहद अर्थव्यवस्था में चीजें आपस में जुड़ी रहती हैं। कई बड़ी सूचीबद्ध कंपनियों की तकदीर आशावाद तथा मध्यवर्गीय भारत के लाखों परिवारों के व्यय पर निर्भर करता है। हमने नोटबंदी के समय ऐसा देखा। सबसे पहले संगठित क्षेत्र फला-फूला क्योंकि बड़ी कंपनियों को छोटे और मझोले उपक्रमों की कीमत पर बाजार हिस्सेदारी और क्रय शक्ति मिली। परंतु कुछ समय के बाद मध्य वर्ग की दिक्कतें वापस आ गईं और बड़ी कंपनियों की वृद्धि और मुनाफा दोनों प्रभावित हुए।
इस समस्या के कुछ संकेत वर्तमान आंकड़ों में नजर आते हैं। उदाहरण के लिए सितंबर 2019 में समाप्त तिमाही में दोपहिया वाहनों की बिक्री का आंकड़ा 55.9 लाख था जबकि दो वर्ष बाद यह घटकर 52.2 लाख रह गया जो 6.6 फीसदी कम है। मझोले भारत की कठिनाइयों ने दोपहिया बनाने वाली कंपनियों और उनके कल पुर्जे बनाने वालों को दिक्कत में डाला।
उपभोक्ता रुझान और श्रम बाजार की स्थिति को देखें तो मार्च और अप्रैल 2020 के लॉकडाउन के बाद हालात तेजी से सुधरे थे। परंतु दूसरी लहर के बाद वैसा सुधार देखने को नहीं मिला। अगस्त 2021 तक कुछ सुधार देखने को मिला था लेकिन सितंबर से दिसंबर तक फिर ठहराव आ गया। ओमीक्रोन के आने के बाद 2022 के शुरुआती महीने फिर खराब हो सकते हैं। इन बातों को मिलाकर देखें तो 2022 में भी मझोले भारत की ओर से मांग में कमी आ सकती है। यह बात कुछ उद्योगों मसलन बिस्किट और दोपहिया आदि पर अधिक असर डालेगी।
मीडिया में वेंचर कैपिटल फाइनैंसिंग, स्टार्टअप और सफल प्रारंभिक सार्वजनिक निर्गमों की कई खुशनुमा कहानयिां देखने-सुनने को मिल रही हैं। निश्चित रूप से देश की आबादी के एक हिस्से के लिए ये खुशनुमा खबरें हैं। परंतु अर्थव्यवस्था के आकार को देखें तो ये शायद खास असर छोडऩे लायक नहीं हैं। उदाहरण के लिए यदि हम सोचते हैं कि औसतन 10 लोगों को रोजगार देने वाले 50,000 स्टार्टअप की मदद से 5 लाख लोगों को रोजगार मिल जाएगा तो हमें समझना होगा कि देश की 40 करोड़ की श्रम शक्ति की दृष्टि से यह आंकड़ा बहुत कम है। इसी प्रकार 2021 में सभी कंपनियों की सूचीबद्ध प्रतिभूतियों के जरिये जुटाई गई इक्विटी पूंजी 2.65 लाख करोड़ रुपये रही। परंतु भारतीय अर्थव्यवस्था की दृष्टि से देखें तो यह आंकड़ा बहुत ही कम है।
यदि मझोला भारत यकीनन इन कठिनाइयों से जूझ रहा है। परंतु 2022 को लेकर दो पहलुओं पर गौर करना जरूरी है। पहला, वित्तीय क्षेत्र। हाल के वर्षों में ढेर सारे परिवारों ने अपनी खपत के लिए कर्ज लिया है। जिस समय उन्होंने ऋण लिया उनके सामने आर्थिक सुधार की संभावना की ज्यादा खुशनुमा तस्वीरें थीं। इन परिवारों को ऋण वसूली की कठोर प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ रहा है और उनके लिए व्यक्तिगत ऋणशोधन की कोई व्यवस्था नहीं है। ये परिवार अपना कर्ज चुकाने में चूक भी सकते हैं।
हालिया दशक में हमने देखा कि देश में बड़ी तादाद में ऐसे लोग हैं जो श्रम बाजार से दूर हैं। वे एक किस्म के तुष्टीकरण के सहारे जी रहे हैं। ऐसे में इन व्यक्तियों में नैतिकता के हस और राजनीतिक कट्टरता बढऩे की चिंता भी है। राजनीतिक कट्टरता का यह खतरा उन कर्जदार परिवारों के साथ अधिक है जो बैलेंस शीट के संकट से गुजर रहे हैं।
चिंता का दूसरा पहलू है अचल वास्तविक क्षेत्र के निवेश में। जो कंपनियां मझोले भारत को बिक्री करती हैं वे 2022 और 2023 में मांग वृद्धि को लेकर चिंतित होंगी। उनकी मांग में कमी आएगी जबकि महामारी के पहले शुरू हो चुकी निवेश परियोजनाओं के शुरू होने के कारण उनकी क्षमता में कुछ सुधार हो सकता है। इससे मार्जिन पर दबाव बनेगा। मार्जिन में कमी की यह संभावना और कमजोर मांग वृद्धि के कारण इन कंपनियों का निवेश कम हो सकता है। इसका असर अर्थव्यवस्था में मांग की समग्र स्थिति पर पड़ सकता है।
शेयर बाजार भी बहुत महत्त्वपूर्ण है। ऐसी कंपनी जिसका बाजार पूंजीकरण उसकी बुक वैल्यू (कुल परिसंपत्तियों और कुल देनदारियों का अंतर) की तुलना में अधिक हो, को शेयर बाजार से निवेश बढ़ाने का सीधा आग्रह मिल रहा है। वादा यही है कि बुक वैल्यू बढऩे पर संपत्ति का निर्माण होगा। उच्च शेयर कीमतें अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक हैं। निफ्टी गत पांच वर्षों में 110 फीसदी ऊपर है जबकि शांघाई कंपोजिट सूचकांक 20 फीसदी ऊपर है। यह यकीनन भारत पर भरोसा जताने के समान है और चीन के अपनी तरह के राष्ट्रवाद, केंद्रीय नियोजन और विदेशियों को ना पसंद करने के रुख के साथ परस्पर विरोधाभासी है। परंतु हमें मझोले भारत की चिंता करनी होगी क्योंकि वृहद अर्थव्यवस्था में सबकुछ आपस में संबद्ध है।
(लेखक स्वतंत्र विश्लेषक हैं)