संगीत प्रसारणकर्ताओं और रिकार्डिंग के कॉपीराइट धारकों के बीच चल रहा 6 साल पुराना घमासान अब और तेज होता लग रहा है।
यह विवाद शुरुआती दौर में हैदराबाद और दिल्ली स्थित कॉपीराइट बोर्ड में गया, उसके बाद बंबई और दिल्ली उच्च न्यायालय होते हुए यह सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच गया है, जहां निर्णयों पर पुनर्विचार अभी लंबित है। सामान्यत: कॉपीराइट धारक को पूरी स्वतंत्रता होती है कि वह शुल्क या रॉयल्टी लेकर लाइसेंस जारी करे और अपने कार्यों का लाभ उठाए।
लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के मुताबिक, उसका बौध्दिक संपदा का यह अधिकार एकछत्र नहीं है। यह समान शर्तों पर दूसरे लोगों के अनिवार्य लाइसेंस पाने के अधिकार के साथ जुड़ा हुआ है। अनिवार्य लाइसेंस, कॉपीराइट नियमों का एक अपवाद है और यह बाजार में पैदा हुई विसंगतियों को दूर करने के लिए सरकार को हस्तक्षेप करने के लिए अधिकार देता है।
अगर व्यावसायिक तरीके से नियत समय में लाइसेंस का अधिकार पाने के सभी उचित तरीके विफल हो जाएं तो इस तरीके को अपनाया जाता है। ऐसे मामलों में कॉपीराइट धारकों की अनुमति के बगैर भी प्रसारणकर्ताओं को उसका प्रयोग करने का विशेष अधिकार मिल जाता है। लोक हित को देखते हुए उनका एकाधिकार सीमित हो जाता है। कॉपीराइट एक्ट की धारा 31 और पेटेंट कानून की धारा 84 में कुछ खास और अपवादस्वरूप मामलों में लोकहित को देखते हुए इस तरह का प्रावधान रखा गया है। व्यापार से संबंधित मामलों के बौध्दिक संपदा अधिकार समझौते (टीआरआईपीएस) में भी इसे मान्यता दी गई है।
इस मुद्दे का महत्त्व इसलिए बहुत ज्यादा हो गया कि अनुमानत: बड़े शहरों में ही 300 ब्रॉडकास्टर और 150 एफएम लाइसेंस धारकों में करीब 100 विशेष रूप से सक्रिय हैं। श्रोताओं की संख्या पर गौर करें तो इस समय औसत रूप से हर भारतीय केवल आधे घंटे तक रेडियो सुनता है, जबकि अन्य देशों में यह औसत 3 घंटे से ज्यादा है। इस लिहाज से निजी ब्रॉडकास्टरों की उम्मीदें बहुत ज्यादा हैं। इसके अलावा ब्यूटी पार्लरों, जिमों और स्विमिंग पूलों में भी संगीत की जबरदस्त मांग है।
यह मुद्दा न केवल सॉन्ग रिकार्डिंग, बल्कि विभिन्न काम करने वाले कॉपीराइट धारकों को भी प्रभावित करता है। हाल ही में कॉपीराइट के अमेरिकी रजिस्ट्रार ने फैसला किया कि सेल फोनों के रिंगटोन को भी देश के भीतर अनिवार्य लाइसेंस प्रणाली के तहत लाया जाए। इस समय सर्वोच्च न्यायालय में करीब 15 पार्टियां मौजूद हैं, जिनमें खासकर प्रसारणकर्ता, एक कॉपीराइट सोसाइटी- फोनोग्राफिक परफार्मेंस लिमिटेड, और सुपर कैसेट्स इंडस्ट्रीज शामिल हैं। सुपर कैसेट्स से संबध्द एक प्रसारणकर्ता जो गीतों का प्रसारण करता है, सोसाइटी का सदस्य नहीं है।
यही कारण है जिसकी वजह से विरोधाभास पैदा हुआ। कॉपीराइट बोर्ड ने इस मसले पर कई बार विचार किया, हर बार मामले उच्च न्यायालय में गए। सर्वोच्च न्यायालय ने मामले के उचित समाधान के लिए बोर्ड के पास वापस भेजा। इससे स्पष्ट होता है कि बोर्ड, अनिवार्य लाइसेंस के तहत एक से अधिक पक्षों को अधिकार दे सकता है। वह इसके लिए क्षतिपूर्ति तथा नियम और शर्तों का भी निर्धारण कर सकता है। इस मसले पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन भी हुए जिसमें भारत भी शामिल हुआ।
बहरहाल सुविधा को ध्यान में रखते हुए कानून में कोई संशोधन नहीं किया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, ‘केवल इसलिए कि कानून में बदलाव नहीं हुआ है, इसका मतलब यह नहीं हुआ कि कॉपीराइट एक्ट के तथ्यों को नहीं माना जाए। अगर जमीनी हकीकत में बदलाव आया है, तो व्याख्याओं में भी बदलाव होना चाहिए। जमीनी हकीकत केवल नई परिस्थितियों और सामाजिक हालात के बदलाव पर निर्भर नहीं करती, इसके साथ ही साउंड रिकॉर्डिंग से बड़ी संख्या में जनता जुड़ी हुई है, और सरकार को इस मामले पर भी नजर रखनी चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में क्या हो रहा है।’
सर्वोच्च न्यायालय ने कॉपीराइट धारकों के संपत्ति अधिकार को कम किया है। संपत्ति का अधिकार अब मूल अधिकार नहीं रहा। इस पर सोद्देश्य प्रतिबंध लगे हैं और उचित मुआवजा दिए जाने के बाद लोक हित में पूरी तरह से या आंशिक रूप से जरूरतों के मुताबिक कब्जा किया जा सकता है। अधिकार का मतलब यह नहीं हुआ कि किसी का एकाधिकार हो, इसका उपभोग जनता कर सकती है। एक निर्णय में इसे स्पष्ट किया गया है, ‘हमारे संवैधानिक प्रावधानों में एकाधिकार को प्रोत्साहित नहीं किया गया है।
निश्चित रूप से ज्ञान का प्रसार होना चाहिए। कलात्मक कार्यों को अगर सार्वजनिक किया जाता है तो यह उचित मुआवजे की निश्चित शर्तों और अनुदान के तहत होना चाहिए।’ आगे और भी स्पष्ट किया गया है कि कॉपीराइट एक्ट की धारा 31 के तहत प्रसारणकर्ता के पक्ष में अधिकार नहीं जाता है। अगर लाइसेंस दिए जाने के लिए दिया गया मुआवजा तार्किक नहीं है तो इसकी शिकायत की जा सकती है। इस कानून से केवल प्रसारणकर्ताओं के अधिकार सुनिश्चित होते हैं।
कोई भी मामला बनने पर कॉपीराइट धारक की सुनवाई हर हाल में होगी। अगर बोर्ड को ऐसा लगता है कि कॉपीराइट का अधिकार रखने वाले का तर्क जायज नहीं है तो वह अनिवार्य लाइसेंस के तहत दिशानिर्देश जारी कर सकता है। वर्तमान मामले में बोर्ड ने नियमों का पालन नहीं किया। इसलिए उससे कहा गया कि पूरी प्रक्रिया फिर से शुरू की जाए। बहरहाल इस सबके पहले ही संबंधित पक्षों ने सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया और इस पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया।