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क्या फेल हो गई पाकिस्तान को अलग-थलग करने की नीति? कूटनीति के मोर्चे पर भारत को नए सिरे से सोचना होगा

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पाकिस्तान को दुनिया से अलग करने की भारत की रणनीति और उसकी डूबती अर्थव्यवस्था के दावों के बीच पड़ोसी देश कूटनीतिक वापसी करता दिख रहा है

Last Updated- May 10, 2026 | 10:01 PM IST
shehbaz sharif
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ | फोटो: Commons

पिछले कई वर्षों से पाकिस्तान के प्रति भारत के आधिकारिक दृष्टिकोण के तीन भाग हैं। पहला, भारत ने उसे राजनयिक तौर पर अलग-थलग करने का प्रयास किया है क्योंकि उसे लगता है कि मित्र देशों  के बगैर पाकिस्तान इस क्षेत्र में अशांति कम फैला पाएगा। दूसरा, भारत ने हर उकसावे का जवाब देने का विकल्प चुना है। यह अलग बात है कि इस जवाबी कार्रवाई का तरीका और इससे जाने वाला संदेश सख्ती के साथ उसे रोकने के बजाय देसी राजनीतिक जरूरतों के कारण ज्यादा हो सकता है। और तीसरा, भारत ने मान लिया है कि पाकिस्तान का आर्थिक भविष्य हमेशा पतन की ओर ही रहेगा, उसके पास वृद्धि लाने के लिए कुछ नहीं है, जिसके कारण वह तेजी अप्रासंगिक बन जाएगा।

इस दृष्टिकोण की उपयोगिता और इसके पीछे की धारणाओं की सत्यता पर नए सिरे से विचार करने का समय आ गया है। फारस की खाड़ी में संकट पर ईरान और अमेरिका के बीच वार्ता को संभव बनाने में पाकिस्तान ने जैसे केंद्रीय भूमिका निभाई, कम से कम उसे देखते हुए तो इस तरह के पुनर्विचार की जरूरत लग ही रही है। सोशल मीडिया पर पाकिस्तानी जश्न मना रहे हैं और उनमें कई वे भी हैं, जो पाकिस्तान पर दोबारा नियंत्रण कर लेने वाले सैन्य प्रतिष्ठान को पसंद नहीं करते हैं। इधर भारतीय नेतृत्व इस प्रयास को केवल बयानबाजी से विफल करने का प्रयास नहीं कर सकता क्योंकि खाड़ी में शत्रुता को समाप्त कराना बड़ा वैश्विक हित है जिससे इस देश की अर्थव्यवस्था को भी लाभ होगा।

अब अधिक विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण की आवश्यकता है। क्या वास्तव में कहा जा सकता है कि राजनयिक अलगाव की नीति सफल रही है, जबकि एक दशक बीत जाने के बाद पाकिस्तानी कई बार यह साबित कर चुके हैं कि वे ऐसे किसी भी अलगाव को लांघ सकते हैं? पिछले साल ऑपरेशन सिंदूर के बाद उनके प्रतिष्ठान ने दुनिया को कारगर तरीके से संदेश दिया, जिससे पाकिस्तानी हवाई सुरक्षा में सेंध लगाने और उसके हवाई अड्डों पर हमला करने में भारतीय सेना की सफलताएं धुंधली पड़ गईं। और पाकिस्तान को इतना विश्वसनीय मध्यस्थ माना जा रहा है कि विश्व अर्थव्यवस्था को हिला डालने वाले युद्ध के दो पक्षों को वह बातचीत के लिए अपनी राजधानी तक ले आए तो मुझे यह राजनयिक अलगाव के बिल्कुल विपरीत लगता है। 

आतंकवाद को रोकने का मुद्दा भी अधर में लटका हुआ है। पिछले एक दशक में लगातार बढ़ते तनाव के बाद भारत ने स्पष्ट रूप से घोषणा कर दी है कि भविष्य में उसकी धरती पर होने वाली किसी भी आतंकवादी घटना का जवाब देने से पहले वह यह निर्धारित किए बगैर नहीं रुकेगा कि पाकिस्तान का सत्ता प्रतिष्ठान तो उसके लिए प्रत्यक्ष जिम्मेदार नहीं है। इससे हम एक खतरनाक स्थिति में आ गए हैं, जहां परमाणु खतरे की सीमा के भीतर तनाव को नियंत्रित करना हमारे लिए एक चुनौती है।

अंततः, यह कहना गलत होगा कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था अच्छी स्थिति में है। लेकिन संकट आने से पहले तक यह चरमरा नहीं रही थी। वह बहुपक्षीय एजेंसियों से वित्तीय सहायता हासिल कर सकता है। सौर ऊर्जा के क्षेत्र में इसके नाटकीय विस्तार का मतलब है कि खाड़ी संकट के बाद ईंधन की कीमतों में बेशक तेज इजाफा हुआ है मगर कल्याण पर उसका इतना अधिक असर नहीं हुआ है, जैसा बिना सौर ऊर्जा के होता। हालांकि यह देखना बाकी है कि अशांत स्थानीय राजनीतिक माहौल में ऐसा हो पाएगा या नहीं मगर पाकिस्तान के भीतर खनिज संसाधनों के सफल दोहन की उम्मीदें काफी ज्यादा हैं।

अंत में, भारत के भीतर कई लोग बेशक दलील दें कि जनरल आसिम मुनीर के पास पिछले सैन्य प्रमुखों जितनी दूरदर्शिता नहीं है फिर भी वह फील्ड मार्शल के पद तक पहुंच गए हैं, जहां उनके पूर्ववर्ती नहीं पहुंच सके। किंतु यह तो मानना होगा कि परिष्कार की कमी होने के बाद भी पाकिस्तान के सत्ता प्रतिष्ठान ने पिछले कुछ वर्षों में खास कूटनीतिक आत्मविश्वास का प्रदर्शन किया है। इसने देश में पहले के मुकाबले आर्थिक स्थिरता हासिल की है और फिर सऊदी अरब और अमेरिका सहित कुछ महत्त्वपूर्ण साझेदारों के साथ संबंध सुधारे हैं।

असल में वे इससे भी आगे बढ़ चुके हैं: तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोआन के साथ मिलकर वे एक अनौपचारिक सामरिक गुट बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जिसमें सऊदी अरब और मिस्र भी शामिल होंगे। यह सुन्नी बहुल गुट होगा, जिसमें 5 करोड़ लोग होंगे और जिसका सकल घरेलू उत्पाद 3 लाख करोड़ डॉलर से ज्यादा होगा। चारों देशों के विदेश मंत्रियों की मार्च की शुरुआत से तीन बार मुलाकात हो चुकी है।

तुर्की के विदेश मंत्री ने संकेत दिया है कि वे औपचारिक गठबंधन से बंधे बगैर अपनी ताकत को एकजुट करने के तरीके तलाश रहे हैं। बेशक पाकिस्तान का सऊदी अरब के साथ औपचारिक समझौता है, जो मिस्र की सैन्य-नेतृत्व वाली सरकार का मुख्य वित्तीय मददगार है।

इस समय भारत किस तरह प्रतिक्रिया दे, इसका कोई आसान जवाब नहीं है। लेकिन यह स्वीकार करना कि उसकी मौजूदा नीति सफल नहीं रही है, कम से कम एक पहला कदम तो है। पाकिस्तान से निपटने के तरीकों पर पुनर्विचार करना बेहद जरूरी है क्योंकि वह उम्मीद से ज्यादा कारगर हो गया है और कई कूटनीतिक, सैन्य और आर्थिक जाल से बच निकला है। आखिरकार रावलपिंडी स्थित सैन्य प्रतिष्ठान अपनी सफलताओं से निश्चित रूप से उत्साहित हुआ होगा और आम तौर पर भारत के लिए यह अच्छा संकेत नहीं होता।

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First Published - May 10, 2026 | 10:01 PM IST

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