Categories: लेख

मुद्रास्फीति का जोखिम

Published by
बीएस संवाददाता
Last Updated- December 12, 2022 | 3:41 AM IST

मुद्रास्फीति के ताजा आंकड़ों ने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) को कठिनाई में डाल दिया है। मई में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति की दर बढ़कर 6.3 फीसदी हो गई जो छह महीनों का उच्चतम स्तर है। कीमतों में व्यापक तौर पर इजाफा हुआ है और निश्चित रूप से यह केंद्रीय बैंक के लिए चिंता का सबब होगा। एक ओर खाद्य मूल्य सूचकांक में 5.2 फीसदी का इजाफा हुआ, वहीं ईंधन और बिजली संबंधी घटकों का सूचकांक 11.6 फीसदी बढ़ा। परंतु इस गतिशीलता के लिए केवल खाद्य और ईंधन सूचकांक उत्तरदायी नहीं हैं। मूल उपभोक्ता मूल्य मुद्रास्फीति 6.6 फीसदी के साथ सात वर्ष के उच्चतम स्तर के करीब पहुंच गई। थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति की दर भी मई में 12.94 फीसदी हो गई।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि मुद्रास्फीति की दर निकट भविष्य में ऊंची बनी रहेगी। इससे केंद्रीय बैंक के समक्ष नीतिगत चयन में कठिनाई आएगी। आरबीआई वृद्धि को मदद पहुंचाने पर ध्यान लगा रहा है और वह एक हद तक मुद्रास्फीति में इजाफे को बरदाश्त कर सकता है। इसका ताजा अनुमान दर्शाता है कि एमपीसी चालू वित्त वर्ष में मुद्रास्फीति के 5.1 फीसदी रहने का अनुमान लगा रही है। इसमें संशोधन करके इसे बढ़ाना होगा। मुद्रास्फीति के जोखिम की अनदेखी करना समिति के लिए बहुत कठिन होगा। बीती कुछ तिमाहियोंं से समिति का यही कहना रहा है कि उच्च मुद्रास्फीति काफी हद तक आपूर्ति क्षेत्र की विसंगतियों से उपजी है और आर्थिक गतिविधियों में सुधार के साथ हालात बेहतर होंगे। परंतु कोविड की दूसरी लहर में आपूर्ति क्षेत्र की बाधा उतनी अधिक नहीं थी जितनी 2020 में पहले लॉकडाउन के दौरान थी। यह संभव है कि आपूर्ति में सुधार से कीमतों में कुछ कमी आए। परंतु निकट भविष्य में मुद्रास्फीति की दर के 4 फीसदी के लक्ष्य से ऊपर बने रहने की संभावना है। यानी वास्तविक संदर्भों में नीतिगत दरें और विस्तारित अवधि तक ऋणात्मक बनी रहेंगी।
फिलहाल आरबीआई बाजार ब्याज दरों को कम रखकर वृद्धि की सहायता करने पर केंद्रित है, इससे सरकार को भी अपने घाटे की पूर्ति करने में मदद मिल रही है। परिणामस्वरूप उसने व्यवस्था में भारी नकदी सुनिश्चित की है और वृद्धि की और मदद करने की प्रतिबद्धता जताई है। इस आर्थिक परिदृश्य में यदि वृद्धि बहाल करने पर ध्यान दिया जा रहा है तो इसे समझा जा सकता है लेकिन इस बात पर भी बहस होनी चाहिए कि आखिर केंद्रीय बैंक को किस मोड़ पर अपना ध्यान मुद्रास्फीतिक स्थितियों की ओर ले जाना चाहिए। यदि लंबे समय तक वास्तविक ऋणात्मक ब्याज दरें बनी रहती हैं तो इसका असर आम परिवारों की वित्तीय स्थिति पर होगा जिसके व्यापक वृहद आर्थिक निहितार्थ होंगे। यकीनन भारत मुद्रास्फीति का दबाव महसूस करने वाला इकलौता देश नहीं है। अमेरिका में मुद्रास्फीति 13 वर्ष के उच्चतम स्तर तक बढ़कर 5 फीसदी हो गई है। चीन में उत्पादक मूल्य सूचकांक बढ़कर 9 फीसदी हो गया है जो 2008 के बाद का उच्चतम स्तर है। अमेरिकी केंद्रीय बैंक का मानना है कि उच्च मुद्रास्फीति अस्थायी है लेकिन चिंता यह भी है कि उसे नीतिगत कड़ाई बरतनी पड़ सकती है।
मुद्रास्फीति के लिए जिंस कीमतों में इजाफा और अचानक तेज हुई मांग बड़ी वजह है। परंतु अमेरिकी केंद्रीय बैंक अपेक्षाकृत सहज स्थिति में है क्योंकि उसका इतिहास कम मुद्रास्फीति का रहा है। ऐसे में वह कुछ समय तक वृद्धि को गति देने के लिए मुद्रास्फीति बरदाश्त कर सकता है। आरबीआई के पास ऐसी आजादी नहीं है। यह देखना होगा कि आरबीआई वृद्धि को बरकरार रखते हुए बाजार को मूल्य स्थिरता को लेकर कैसे समझाता है। इसका एक तरीका यह होगा वह नकदी कम करे और प्रतिफल बढऩे दे। लंबे अरसे तक मुद्रास्फीति के जोखिम की अनदेखी करने से लंबी अवधि की आर्थिक लागत बढ़ सकती है।

First Published : June 15, 2021 | 7:50 PM IST