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अच्छे दिनों में राजकोषीय गुंजाइश न बनाना भारत की बड़ी भूल, आर्थिक संकट में विकल्प हुए सीमित

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राजकोषीय मोर्चे पर भारत की लड़खड़ाहट की सबसे बड़ी वजह यह है कि वह अच्छे समय में राजकोषीय गुंजाइश नहीं तैयार नहीं कर पाया

Last Updated- June 19, 2026 | 11:05 PM IST
Rupee
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सभी से हाल के संकट से निपटने के लिए तीन ‘एफ’ पर ध्यान केंद्रित करने को कहा। ये हैं फॉरेन एक्सचेंज, फ्यूल और फर्टिलाइजर यानी विदेशी मुद्रा, ईंधन और उर्वरक। लेकिन उन्हें एक और महत्त्वपूर्ण ‘एफ’ जोड़ने की आवश्यकता हो सकती है: ​फिस्कल स्पेस यानी राजकोषीय गुंजाइश। यदि यह उपलब्ध होती तो वर्तमान संकट का सामना करने में उनके पास अधिक विकल्प होते।

यदि भारत ने कोविड संकट के 2022-23 में समाप्त होने के बाद के तीन अच्छे वर्षों में अधिक राजकोषीय गुंजाइश बनाई होती, तो आज इस संकट से निपटने के लिए उसके पास अधिक विकल्प होते। मैंने जनवरी 2025 के अपने कॉलम में चेतावनी दी थी कि यदि भारत अनुकूल समय में अधिक राजकोषीय गुंजाइश बनाने में सक्षम नहीं हुआ, तो अगले संकट से निपटने के लिए हमारे पास कोई साधन नहीं होगा। उस चेतावनी पर ध्यान नहीं दिया गया। आज हम एक ऐसे संकट का सामना कर रहे हैं जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी और जिसके लिए भारत बिल्कुल तैयार नहीं है तथा उसके पास सीमित विकल्प ही उपलब्ध हैं।

भारत ने राजकोषीय घाटा कम करने के लिए जो रास्ता अपनाया है वह बहुत धीमा है। वित्त वर्ष 27 के (बजट अनुमान) में इसका राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 4.3 फीसदी रहने का अनुमान है जो धीमी गिरावट के बाद वित्त वर्ष 26 में 4.4 फीसदी तक पहुंचा है, जबकि वित्त वर्ष 22 में यह 6.7 फीसदी था। 

राज्यों का राजकोषीय घाटा वित्त वर्ष 24 और वित्त वर्ष 25 में बढ़ा जिसके कारण सार्वजनिक ऋण जीडीपी के अनुपात में बहुत धीरे-धीरे घटा और 80 फीसदी से ऊपर ही बना रहा। पश्चिम एशिया संकट से पहले भी अनुमान था कि सार्वजनिक ऋण 2030 तक ही जीडीपी के 80 फीसदी से नीचे जाएगा। यह संकट के बाद सबसे धीमी राजकोषीय सुधार में से एक है जिससे घाटे को वित्तपोषित करने के लिए अधिक वित्तीय नियंत्रण हुआ और वाणिज्यिक ब्याज दरें ऊंची बनी रहीं।

तेजी से निजीकरण करके राजकोषीय घाटे को तेजी से कम किया जा सकता था लेकिन एयर इंडिया की बिक्री के बाद वह पूरी तरह ठप पड़ गया। मैंने कुछ वर्ष पहले राष्ट्रीय लोक वित्त और नीति संस्थान में किए गए एक विस्तृत अध्ययन में तर्क दिया था कि रणनीतिक उद्देश्यों को पूरा करने वाली महारत्न कंपनियों को छोड़कर इतने अधिक सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों को बनाए रखने का कोई कारण नहीं है और उनकी बिक्री से प्राप्त राशि का उपयोग सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के निर्माण में किया जाना चाहिए।

लेकिन तब से भारत ने पहले ही सार्वजनिक बुनियादी ढांचे में पर्याप्त निवेश कर लिया है, इसलिए भविष्य में सरकारी उपक्रमों की बिक्री से प्राप्त राशि का उपयोग सार्वजनिक ऋण कम करने और भविष्य के संकटों के लिए राजकोषीय गुंजाइश बनाने में किया 

जाना चाहिए। वास्तव में, तब से भारत में सरकारी उपक्रमों की संख्या घटने के बजाय आश्चर्यजनक रूप से बढ़ गई है। यह उस सरकार के लिए अजीब है जिसने ‘अधिकतम शासन, न्यूनतम सरकार’ का नारा दिया था। इन कंपनियों के बड़े हिस्से को बेचकर सार्वजनिक ऋण घटाना वह राजकोषीय गुंजाइश पैदा करेगा जिसकी हमें भविष्य के संकटों से निपटने के लिए आवश्यकता है। इस बार संकट के दौरान तो हम यह नहीं कर पाए लेकिन अगले संकट के लिए यह जरूरी है।

एक और ‘एफ’ यानी ‘फ्रीबीज’ (मुफ्त उपहार आदि) पर ध्यान देना जरूरी होना चाहिए। हर राज्य में और हर चुनाव के साथ इनकी तादाद बढ़ती ही जा रही है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (पीएमजीकेएवाई) है जिसके जरिये 81.4 करोड़ नागरिकों (जनसंख्या का 56 फीसदी) को मुफ्त भोजन दिया जाता है। इसकी लागत जीडीपी की 0.7 फीसदी है लेकिन अब यह बढ़कर जीडीपी के 1 फीसदी से अधिक हो जाएगी।

हाल ही में ईटी ग्लोबल समिट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि इतनी बड़ी सब्सिडी केवल 20 करोड़ गरीब रेखा से नीचे रहने वालों को ही नहीं बल्कि अन्य 60 करोड़ लोगों को भी दी जा रही है। उन्होंने तर्क दिया कि वे गरीब रेखा से ठीक ऊपर हैं लेकिन फिर से गरीबी में आ सकते हैं और इसलिए मुफ्त भोजन के हकदार हैं। सवाल यह उठता है कि यह मुफ्त भोजन आखिर जाता कहां है।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर संतोष मेहरोत्रा के अनुसार हाल ही में जारी छठा राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण दिखाता है कि भारत में बाल कुपोषण दर 2023-24 में 32 फीसदी थी जो 2019-21 (एनएफएचएस-5) से लगभग अपरिवर्तित रही।

इस असाधारण उदारता का असली कारण यह है कि बहुत से लोगों के लिए नौकरियां सुनिश्चित नहीं की जा सकीं और उन्हें यह विशाल रियायत वोट पाने के लिए दी जाती है।  अब हर पार्टी हर चुनाव में एक-दूसरे से अधिक मुफ्त उपहार देने की होड़ करती है जिससे केंद्रीय और राज्य स्तर पर घाटे और बढ़ जाते हैं। वित्त वर्ष 24 और वित्त वर्ष 25 में राज्य स्तर के घाटे तेजी से बढ़े जिससे सार्वजनिक ऋण का स्तर ऊंचा बना रहा।

ताजा सर्वेक्षण से पता चलता है कि मार्च 2026 के लिए व्यापार मुद्रास्फीति अपेक्षाएं 57 आधार अंक बढ़ीं। कंपनियों ने लगातार तीन महीनों तक अपनी महंगाई अपेक्षाएं 5 फीसदी से ऊपर रखीं। ऐसा अगस्त 2022 के बाद ही देखा गया था। अप्रैल 2026 में व्यवसायों ने एक वर्ष आगे उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) की शीर्ष महंगाई दर 4.94 फीसदी रहने की उम्मीद जताई जो फरवरी 2026 के 4.7 फीसदी से 24 आधार अंक अधिक है। इससे आगे मौद्रिक नीति समिति पर ब्याज दरें बढ़ाने का दबाव होगा। वहां कोई राहत नहीं।

रुपये को संभालने के लिए पूंजी प्रवाह पर रोक लगाने की मांग उठ रही है। लेकिन इससे भारत को लंबे समय में और अधिक नुकसान हो सकता है। एकमात्र विकल्प छोटे उद्यमों को अधिक ऋण सहूलियत देना होगा ताकि वे संकट के दौर में टिके रहे सकें।  

भारतीय रिजर्व बैंक ने 30 जून 2026 तक वितरित किए गए प्री-शिपमेंट और पोस्ट-शिपमेंट निर्यात ऋण के लिए 450 दिनों तक की विस्तारित ऋण अवधि की घोषणा की है। सरकार ने लगभग 2.5 लाख करोड़ रुपये की ऋण सहूलियत योजना की घोषणा की है। विशेषकर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के लिए।

लेकिन हाल के संकट से बड़ा सबक यह है कि जब वैश्विक अनिश्चितता बढ़ रही हो, भारत के सामने भविष्य में और संकट आ सकते हैं। उनसे निपटने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि जब वे उत्पन्न हों तो प्रतिक्रिया देने के लिए पर्याप्त राजकोषीय गुंजाइश मौजूद हो। यही वह महत्त्वपूर्ण ‘एफ’ है जिस पर वित्त मंत्री को भविष्य में ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

(लेखक जॉर्ज वॉशिंगटन विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय आर्थिक नीति संस्थान में अतिथि विद्वान हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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First Published - June 19, 2026 | 11:05 PM IST

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