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दुनिया तेजी से बदल रही, अगले 5 साल भारत के लिए बड़ा मौका, बस अनुशासन बनाए रखना होगा

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हम ऐसी विश्व व्यवस्था में रह रहे हैं जो बदलती रहेगी। भारत को इसका लाभ लेना चाहिए। हम इतने अनुशासित रहें कि पाकिस्तान जब अवसर ढूंढ रहा है, हम हड़बड़ी में कोई कदम न उठा बैठें

Last Updated- April 12, 2026 | 10:21 PM IST
Narendra Modi
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी | फाइल फोटो

इस समय दुनिया तमाम युद्धों, बदलते और टूटते गठबंधनों और कठोर शक्ति की वापसी के बीच इस कदर उलझी हुई है कि यह भारत के लिए एक अवसर बन गया है। भारत को अपने भीतर झांककर देखना चाहिए। यह संकट एक और ऐसा अवसर है जिसे व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए।

दरअसल इन महाशक्तियों और आक्रामक पड़ोसियों की व्यस्तताओं के बीच भारत को एक ऐसा अवसर मिला है जिसकी शायद उसे प्रतीक्षा होगी। एक ऐसा अवसर जहां वह अपनी कुछ अहम कमजोरियों को दूर करने की दिशा में प्रयास कर सके, अपना बचाव तैयार कर सके और खुद को आगामी संकट से बचने के लिए तैयार कर सके। 

इसका यह मतलब भी है कि भारत इतना अनुशासित रहे कि ऐसे समय में अचानक हड़बड़ी में कोई प्रतिक्रिया न दे बैठे जिसे पाकिस्तान अपने मौके रूप में देख रहा है। उसे इस मौके को भुनाने देना चाहिए। इस बीच हमें कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण बातों पर ध्यान देना चाहिए। याद कीजिए कि हमने जनवरी में अपने इसी स्तंभ में ‘पाकिस्तान से आजादी’ की बात कही थी। इसलिए हमें उससे आगे निकलकर यह सोचना चाहिए कि पश्चिम एशिया में शांति हमारे लिए अच्छी है फिर चाहे वह किसी तरह आए। 

सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि दुनिया के विचलित होने का क्या अर्थ है। पाकिस्तान शांति की स्थापना करने वाला देश बनने का आनंद ले रहा है। कोई गारंटी नहीं है, लेकिन यह बहुत मुश्किल है कि वह निकट भविष्य में हमारे साथ किसी किस्म का दुस्साहस करे।  

अपने रिकॉर्ड को देखते हुए, वह इस नए अवसर को निभाने की कोशिश करेगा और फिर आर्थिक और सैन्य सहायता में इसका पूरा लाभ उठाएगा। उसके पास स्वयं बहुत अधिक खरीदने के लिए धन नहीं होगा, लेकिन संभवतः वह सऊदी अरब, यहां तक कि कतर से धन की तलाश करेगा जबकि अमेरिकी फिर से बिक्री शुरू करेंगे। बहरहाल, इन चीजों में समय लगता है।

डॉनल्ड ट्रंप को अपने ईरान अभियान को शांति और किसी विश्वसनीय विजय दावे के साथ समाप्त करने का रास्ता खोजना होगा। इजरायल अपने युद्धोत्तर रणनीतिक कदमों का पुनर्मूल्यांकन कर रहा है। अरब की खाड़ी के देश मित्र और शत्रु की परिभाषा को फिर से तय कर रहे हैं। हमारा नया मित्र यूरोप और सबसे पुराना साझेदार रूस अपने तात्कालिक पड़ोस पर नई दृष्टि डाल रहे हैं।

दूसरी आक्रामक शक्ति यानी चीन, चुपचाप देख रहा है जबकि बड़ी ताकत खुद उलझ रही है और उसे उबरने के लिए चीन के संरक्षण की आवश्यकता है। नेपोलियन जैसे सिद्धांत का पालन करते हुए, चीन न केवल दुश्मन (अमेरिका) को गलती करते समय बाधित नहीं करेगा, बल्कि वह युद्धग्रस्त पश्चिम एशिया, विशेषकर ईरान से लाभ उठाने की तैयारी भी करेगा। यदि शांति आती है तो पुनर्निर्माण में सैकड़ों अरब डॉलर लगेंगे। ठेकेदारों की सेनाएं क्षेत्र में उतरेंगी, जिससे निर्माण क्रेनों की वैश्विक कमी हो जाएगी। चीनी चाहते हैं कि इनमें से अधिकांश उनके पास हों। वे उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहे हैं। भारत के साथ नई परेशानियां फिलहाल उनकी प्राथमिकता नहीं होंगी। यह हमारे विरोधियों का हिसाब करता है।

करीबी दोस्त, संभावित साझेदार और प्रतिद्वंद्वी सभी उलझे हुए हैं और ऐसे में भारत उस दौर से गुजर रहा है जहां वह अपनी ताकत में शांति के साथ इजाफा कर सकता है। मैं आशावादी होने का जोखिम उठाऊंगा। 

आजादी के बाद से ही हमें औसतन हर पांच साल में सुरक्षा के क्षेत्र में बड़े खतरे का सामना करना पड़ा है। इसकी शुरुआत जम्मू-कश्मीर में दो सीजन तक चले युद्ध से हुई,  इसके बाद गोवा का मामला आया जहां नाटो के अनुच्छेद 5 की आड़ लेकर पुर्तगाल जमा हुआ था, 1961 में गोवा को आजादी मिली, फिर 1962, 1965 और 1971 में चीन और पास्तिान के साथ युद्ध हुए। 1967 में नाथुला में तगड़ी झड़प हुई। यानी 24 साल में 5 बार हमें सैन्य चुनौती का सामना करना पड़ा।

पाकिस्तान की हार और उसके विभाजन ने कुछ राहत दी लेकिन 1986 के बाद से सामरिक चुनौती बार-बार सामने आने लगी है। 1986-87 में चीन के साथ वांगडुंग/समदोरोंग चू, ऑपरेशन ब्रास्टैक्स, 1990 में कश्मीर में पाकिस्तान से युद्ध का खतरा और पहली परमाणु चेतावनी इसमें शामिल रहे।

उसके बाद भी यह सिलसिला जारी रहा। 1999 में करगिल, 2001 में संसद पर हमला और ऑपरेशन पराक्रम, 2008 में 26/11 के हमले और फिर उड़ी, पुलवामा, पहलगाम आदि। इस बीच चीन ने भी कम से कम तीन बार तनाव बढ़ाने का काम किया। 2009 में दलाई लामा की अरुणाचल यात्रा को लेकर और 2013-14 में देपसांग और चुमार में। इसके बाद पूर्वी लद्दाख में सैन्य गतिरोध पैदा हुआ जिसे अब शांत तो कर दिया गया है मगर सुलझाया नहीं गया है। मामूली गणित भी बता देगा कि हर पांच साल पर संकट का सामना करना पड़ा।

हमने ऊपर जिन भटकावों की बात की उन्होंने पांच-पांच साल वाले अमन के दौर भी आरंभ किए। मैं अभी भी पांच साल की अवधि पर इसलिए टिका हूं क्योंकि 2030 में आसिम मुनीर की सेवा विस्तार अवधि समाप्त होगी। उस वक्त वह केवल 62 साल के होंगे। यही वह उम्र है जब भारत के सशस्त्र बलों के प्रमुख सामान्य तौर पर सेवानिवृत्त होते हैं। उस समय तक वह चार भारतीय सेना अध्यक्षों का कार्यकाल देख चुके होंगे।

पाकिस्तान या दुनिया के अन्य स्थानों के तानाशाहों के बारे में हम यह जानते हैं कि उनकी कोई सेवानिवृत्ति योजना नहीं होती। ऐसे में पाकिस्तानी फील्डमार्शल भला 62 साल की उम्र में क्यों सेवानिवृत्त होने लगे? पाकिस्तान की दशा और दिशा को देखते हुए उस समय तक उनके बहुत अलोकप्रिय हो जाने की उम्मीद है। पाकिस्तानी तानाशाहों के पास इसका एक ही हल है, भारत के साथ युद्ध जैसे हालात बनाना। यही वजह है कि हमने अपने आशावाद को पांच सालों तक सीमित रखा है।

चीन देख रहा है कि ट्रंप अमेरिका को कमजोर कर रहे हैं, अपने गठबंधनों को तोड़ रहे हैं और विभाजित अमेरिका में उत्तराधिकारी अपना रास्ता बना रहा है तब चीन को भी इस अवधि की जरूरत होगी। चीन को भी अपने कथित खोए हुए क्षेत्र को वापस हासिल करने के पुराने सपने को साकार करने लायक मजबूती का एहसास हासिल करने के लिए पांच साल की जरूरत होगी। उस सपने में ताइवान, साउथ चाइना के द्वीप और शायद हिमालय भी शामिल हैं। अगर यह आशावादी पाठ सही साबित होता है और भारत को ये पांच साल मिल जाते हैं तो वह इन पांच वर्षों का क्या करेगा? हमने जो आत्मावलोकन की बात कही उसका क्या आशय है?

ट्रंप की कारोबार के क्षेत्र में जबरदस्ती, ऑपरेशन सिंदूर में रक्षा आधुनिकीकरण संबंधी कमियां और खाड़ी युद्ध ने भारत की पांच अहम कमजोरियों को उजागर किया। ये हैं: सैन्य आधुनिकीकरण, ऊर्जा निर्भरता, अंतरिक्ष अभियानों की कमजोरी, उर्वरक और महत्त्वपूर्ण खनिज क्षेत्र। इनसे पांच साल में नहीं निपटा जा सकता है लेकिन कमियों को दूर करने की कोशिश की जा सकती है।

सैन्य मोर्चे पर कुछ बदलाव आया है लेकिन ऑपरेशन सिंदूर के एक साल बाद अभी भी हम काम कम बातें अधिक कर रहे हैं। बदलाव की गति तेज होनी चाहिए। ऊर्जा चुनौती अधिक जटिल है। नए खनन क्षेत्रों से परिणाम हासिल होने में ज्यादा समय लगेगा।

भारत को नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ना होगा। इसमें सार्वजनिक और निजी परिवहन के लिए विद्युतीकरण, एथनॉल मिश्रण (गन्ने या धान की बजाय मक्का से), कोयला गैसीकरण और सामान्य खनन आदि शामिल हैं। कोयले से प्राप्त सिंथेटिक गैस का पहला उत्पादन उर्वरकों को आवंटित किया जाना चाहिए। खनन के क्षेत्र में हम काफी समय से पिछड़े हुए हैं।

नया कानून है, सुधार के लिए बहुत प्रयास हो रहे हैं, लेकिन सरकार और सार्वजनिक उपक्रमों की छाया और भारी हस्तक्षेप इस महत्त्वपूर्ण क्षेत्र को स्वतंत्र नहीं कर पाते। इसका नवीनतम उदाहरण है एक जिला खनन अधिकारी द्वारा टाटा समूह पर ‘अधिक खनन’ के लिए 1,755 करोड़ रुपये का नोटिस जारी करना। साल 2001 से 2006 के बीच ‘अपराध’ यह अपराध हुआ। यह सर्वोच्च न्यायालय के एक खामी भरे आदेश से निकला था। लेकिन विधायिका को इसे ठीक करना चाहिए।

इस तरह आप उन रणनीतिक निर्भरताओं का समाधान नहीं कर सकते जिन्होंने आपको पिछले कई महीनों में इतना असुरक्षित और असहाय बना दिया। यहां नई संभावनाएं मौजूद हैं क्योंकि सशस्त्र माओवाद के अंत ने खनिज-समृद्ध मध्य-पूर्वी भारत को मुक्त कर दिया है।

अंततः, हमारे अपने अनुभवों से एक महत्त्वपूर्ण सबक है। भारत ने कश्मीर में मानवाधिकारों पर पश्चिमी चुनौती (1994), पोकरण-2 (1998) प्रतिबंध और करगिल को पहले की तुलना में कहीं बेहतर तरीके से क्यों संभाला? क्योंकि हमने 1991 में अपनी अर्थव्यवस्था में सुधार किया और हमें एक उभरती शक्ति के रूप में देखा गया। एक बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था हमारे लिए सबसे बड़ी रणनीतिक प्रतिरोधक है।

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First Published - April 12, 2026 | 10:19 PM IST

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