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1991 के सुधारों ने बदली ऑटो सेक्टर की तस्वीर: कैसे मुट्ठी भर कंपनियों से दुनिया का बड़ा हब बना भारत

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उदारीकरण के बाद भारतीय कार खरीदारों को न केवल वास्तविक विकल्प दिए, बल्कि देसी कार कंपनियों को भी रफ्तार भरने में मदद मिली

Last Updated- August 01, 2026 | 11:28 AM IST
Tata nexon EV
Tata ने जनवरी 2020 में Nexon EV लॉन्च किया, जिसके बाद भारत में आम जनता के लिए किफायती और व्यावहारिक इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) का युग शुरू हुआ | फोटो: Commons

भारत का वाहन उद्योग एक जमाने में मुट्ठी भर कंपनियों के दबदबे वाला बाजार था, जिसमें दुनिया की दूसरी कंपनियों को दाखिले की इजाजत नहीं थी। मगर 1991 के आर्थिक सुधारों ने सबसे कटे हुए इस बाजार को वाहनों के मामले में दुनिया का सबसे बड़ा अड्डा बना दिया।

वाहन क्षेत्र दशकों से तमाम बाधाओं से जूझ रहा था, लेकिन उदारीकरण के साथ ही इस क्षेत्र में विदेशी निवेश, दुनिया की आला प्रौद्योगिकी तथा तगड़ी होड़ आ गई। बाजार खुलने के साथ ही देसी कंपनियां अपने उत्पादों को उन्नत बनाने के लिए मजबूर हुईं। दुनिया के किसी भी उद्योग से टक्कर लेने वाला कलपुर्जा उद्योग यहां खड़ा हो गया और ग्राहकों को ढेर सारे विकल्प मिल गए। उदारीकरण के 35 साल बाद आज वाहन क्षेत्र इस बात का बड़ा उदाहरण है कि आर्थिक सुधारों ने भारतीय विनिर्माण की सूरत किस तरह बदल दी।

भारत की व्यापक अर्थव्यवस्था तो 1991 में ही खोल दी गई थी मगर वाहन उद्योग को लाइसेंस व्यवस्था से मुक्ति 1993 में मिली। विदेशी निवेश पर बंदिशें कम कर दी गईं ताकि दुनिया की दूसरी कार कंपनियां आसानी से यहां आ सकें। मगर इसका असर तुरंत नहीं हुआ।

एसऐंडपी ग्लोबल के निदेशक (मोबिलिटी) पुनीत गुप्ता कहते हैं, ‘जब नई नीति आती है तो उसका असर तुरंत नहीं दिखता। वैश्विक कंपनियों को बाजार खंगालने, सरकार से बातचीत करने, कारखाने लगाने और आपूर्तिकर्ताओं का नेटवर्क तैयार करने में समय लगता है। इसीलिए वाहन उद्योग पर असली असर उदारीकरण के 6-7 साल बाद दिखा।’

1990 के दशक में वाहन उद्योग के विकास पर नजर रखने वाले उद्योग के एक अनुभवी व्य​क्ति ने कहा, ‘उदारीकरण ने वाहन उद्योग को अचानक नहीं बदला। इसने बदलाव की जमीन तैयार की मगर विदेशी कंपनियां कई साल तक ग्राहकों की पसंद और स्थानीय आपूर्ति श्रृंखला आदि को समझती रहीं।’

1990 के दशक के आ​खिर तक दुनिया भर से नामी-गिरामी कार कंपनियां बड़ी तादाद में भारत आने लगी थीं। फोर्ड, होंडा, जनरल मोटर्स, ह्युंडै, टोयोटा और दाएवू ने भारतीय बाजार में कदम रख दिए। ये कंपनियां उस समय दुनिया के आखिरी बड़े एवं अछूते वाहन बाजार में संभावनाएं देखकर खिंची चली आई थीं।

लगी कंपनियों की कतार

मगर सभी कंपनियों को कामयाबी नहीं  मिली। वाहन उद्योग के एक और अनुभवी व्यक्ति ने कहा, ‘कई बड़ी कार कंपनियां इस भरोसे के साथ भारतीय बाजार में आईं कि दुनिया भर के बाजारों में झंडे गाड़ने वाले उनके उत्पाद यहां भी कामयाब होंगे। मगर उन्होंने इस बात पर गौर नहीं किया कि कीमत, इस्तेमाल के तरीके और कार पर आने वाले कुल खर्च के मामले में भारतीय ग्राहक कितने अलग हैं। कुछ ने तो अपने पुराने और दुनिया भर में बंद हो चुकीं अपनी गाड़ियां भी भारत में उतार दीं। उन्हें लगा कि भारतीय ग्राहक नए मॉडलों के भूखे होंगे, इसलिए कोई भी शिकायत नहीं करेगा।’

उस दौर के गवाह रहे उद्योग दिग्गजों का कहना है कि कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां ऐसी अपेक्षाओं के साथ भारत आई थीं, जो हकीकत से कोसों दूर थीं। कुछ मानते थे कि बाजार जितनी तेजी से बढ़ा है, अब उससे कहीं ज्यादा रफ्तार से बढ़ेगा। कुछ इस दंभ के साथ आईं कि लंबे समय से चुनिंदा मॉडलों पर गुजर करते आए भारतीय ग्राहक उन उत्पादों और तकनीकों को भी हाथोहाथ ले लेंगे, जो विकसित बाजारों में पुरानी होकर पिट चुकी थीं।

कई कंपनियां ऐसे वाहन लाईं, जो बाकी जगहों पर तो कामयाब थे मगर भारत की सड़कों और ग्राहकों की अपेक्षाओं के माकूल नहीं थे। कुछ कंपनियों ने मारुति सुजूकी की भारीभरकम बाजार हिस्सेदारी में से कुछ लपकने के लिए अपनी उत्पादन क्षमता में जमकर निवेशक किया मगर उन्हें पता चला कि भारत में टिकाऊ कारोबार के लिए केवल कुछ वैश्विक मॉडल उतार देना काफी नहीं होता।

मगर एक कंपनी ने खेल का रुख ही बदल दिया। गुप्ता बताते हैं, ‘ह्युंडै ने तस्वीर बदल दी। उसने 1997 के आसपास भारत में निवेश की योजना बनाई और कारखाना लगाया। उस समय तक उदारीकरण के असर दिखने लगे थे और वह भविष्य को ध्यान में रखकर उत्पाद लाई। उसने देसी बिक्री के साथ निर्यात के लिए भी निवेश किया और उद्योग की दिशा बदल दी।’

ह्युंडै की कामयाबी ने दिखा दिया कि भारत गाड़ियों का बड़ा बाजार ही नहीं है बल्कि वह विनिर्माण तथा निर्यात का शानदार अड्डा भी बन सकता है। सबसे अहम बात, कंपनी ने दिखा दिया कि कीमत वाजिब हो तो भारतीय खरीदार नई तकनीकें अपनाने के लिए तैयार हैं।

ह्युंडै के आने से देसी बाजार में होड़ भी तेज हो गई। गुप्ता कहते हैं, ‘जब ह्युंडै ने बाजार हिस्सेदारी में सेंध लगाना शुरू किया तो मारुति को जवाब देना पड़ा। वह नई तकनीक लाने लगी, निवेश बढ़ाने लगी और नई वाहन श्रेणियों में विस्तार करने पर भी उसका ध्यान गया। इस होड़ ने पूरे वाहन उद्योग को रफ्तार दे दी।’

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होड़ में उतरे सब

यह होड़ उदारीकरण का सबसे बड़ा नतीजा थी। उद्योग के वरिष्ठ अधिकारी उस दौर को याद करते हुए बताते हैं कि शुरू में कई देसी विनिर्माता बाजार के खुलने के प्रति आशंकित थे। फोर्ड, जनरल मोटर्स और टोयोटा जैसी दिग्गज वैश्विक कंपनियों का सामना करना दशकों से बेहद संरक्षित माहौल में काम करने वाली कंपनियों के लिए कठिन लग रहा था।

मगर पीछे मुड़कर देखें तो इनमें से कई आशंकाएं गलत साबित हुईं।

प्रतिस्पर्धा ने भारतीय विनिर्माताओं को खत्म करने के बजाय उन्हें मजबूत किया। अपना अस्तित्व बरकरार रखने वाली कंपनियों को उत्पाद की गुणवत्ता, विनिर्माण प्रक्रियाओं और इंजीनियरिंग क्षमताओं में सुधार करने के लिए मजबूर किया गया। नतीजतन टाटा मोटर्स और महिंद्रा ऐंड महिंद्रा (एमऐंडएम) जैसी स्वदेशी कंपनियां उदारीकरण से पहले के मुकाबले काफी मजबूत बनकर उभरीं।

खास तौर पर एमऐंडएम के लिए यह अनुभव उल्लेखनीय था। वैश्विक विनिर्माताओं ने काफी वित्तीय एवं तकनीकी लाभ के साथ भारतीय बाजार में प्रवेश किया और उनमें से कई इस बाजार से वापस चली गईं। मगर एमऐंडएम एक दमदार वाणिज्यिक यूटिलिटी वाहन एवं ट्रैक्टर विनिर्माता से देश के प्रमुख प्रीमियम एसयूवी विनिर्माता के रूप में उभरकर सामने आई।

टाटा मोटर्स भी बेहद महत्वाकांक्षी राह पर आगे बढ़ी। टाटा ने ऐसे समय में देश के भीतर प्रमुख इंजीनियरिंग एवं उत्पाद विकास क्षमताओं को विकसित करने में निवेश किया जब कई विनिर्माता विदेशी साझेदारों पर काफी निर्भर थे।

गुप्ता ने कहा, ‘टाटा मोटर्स ने भारत में ही अपनी आरऐंडडी, परीक्षण और इंजीनियरिंग क्षमताओं का निर्माण किया। रतन टाटा के पास एक दमदार यात्री वाहन कंपनी बनाने का स्पष्ट दृष्टिकोण था जिसने कंपनी को स्थानीय स्तर पर क्षमताएं विकसित करने के लिए प्रेरित किया।’

उन निवेशों ने आ​खिरकार टाटा मोटर्स को इंडिका और सफारी जैसे स्वदेशी यात्री वाहन बनाने में समर्थ बनाया। उसी ने बाद में जगुआर लैंड रोवर (जेएलआर) के अधिग्रहण के लिए रणनीतिक आधार तैयार किया।

पुर्जों में आई नई तेजी

सुधारों ने एक ऐसे क्षेत्र की तस्वीर बदल दी जिस पर अक्सर वाहन असेंबली के मुकाबले कम ध्यान दिया जाता है यानी वाहन कलपुर्जा उद्योग। उदारीकरण से पहले भारत का आपूर्तिकर्ता आधार अपेक्षाकृत कम विकसित था। उद्योग के दिग्गजों का कहना है कि वाहन विनिर्माताओं को अक्सर अपने दम पर काफी कलपुर्जों का उत्पादन करना पड़ता था क्योंकि विशेष आपूर्तिकर्ताओं की तादाद सीमित थी और प्रौद्योगिकी तक पहुंच नहीं थी।

वैश्विक कार विनिर्माताओं के आगमन ने उस मॉडल आमूलचूल बदलाव किया।

गुप्ता ने कहा, ‘वाहन विनिर्माताओं ने कई सहायक इकाइयों को स्थापित होने में मदद की। जापानी, कोरियाई और यूरोपीय कार विनिर्माताओं ने अपने आपूर्तिकर्ता परिवेश को भारत लाया। भारतीय आपूर्तिकर्ताओं ने उन गुणवत्ता मानकों को आत्मसात किया, सुधार करते रहे और आ​खिरकार वै​श्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी कंपनियां बन गईं।’

कई भारतीय आपूर्तिकर्ता समय के साथ-साथ निर्यातक और बहुराष्ट्रीय कारोबार बन गए। संवर्धन मदरसन, भारत फोर्ज और सोना कॉमस्टार जैसी कंपनियां अब वैश्विक बाजारों में काम करती हैं जो दुनिया के कुछ सबसे बड़े वाहन विनिर्माताओं को आपूर्ति करती हैं।

आपूर्ति परिवेश में यह बदलाव उदारीकरण का एक सबसे महत्त्वपूर्ण दीर्घकालिक नतीजा हो सकता है। इससे व्यापक विनिर्माण आधार तैयार हुआ जो असेंबली कारखानों से काफी आगे तक फैला हुआ था। इसने भारत को वैश्विक वाहन आपूर्ति श्रृंखलाओं में आसानी से एकीकृत होने में मदद की।

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चुनने को विकल्प बेशुमार

मगर इसका सबसे अ​धिक फायदा ग्राहकों को हुआ। उदारीकरण से पहले खरीदारों को मामूली विकल्पों के लिए भी वर्षों इंतजार करना पड़ता था। मगर 2000 के दशक की शुरुआत तक वे दुनिया भर के ब्रांडों द्वारा उतारे गए हैचबैक, सिडैन, एसयूवी और प्रीमियम वाहनों में से अपनी पसंद चुन सकते थे। उत्पाद की गुणवत्ता में भी नाटकीय रूप से सुधार हुआ। प्रौद्योगिकी को तेजी से अपनाया गया और फाइनैंसिंग के जरिये वाहन की खरीदारी आम बात हो गई।

उद्योग के दिग्गजों का कहना है कि कई विदेशी कंपनियों ने मारुति सुजुकी द्वारा स्थापित परिवेश को काफी कम करके आंका। प्रतिस्पर्धियों ने अक्सर उसके जैसे उत्पाद लाने पर ध्यान केंद्रित किया मगर वे मारुति के आपूर्तिकर्ता नेटवर्क, डीलर​शिप, सर्विस और कम स्वामित्व लागत जैसी बारीकियों को समझने में विफल रहे। ऐसे में प्रतिस्पर्धा बढ़ने के बावजूद मारुति को बाजार में अपना वर्चस्व बरकरार रखने में मदद मिली।

वृद्धि के अगले चरण को मध्यवर्ग की बढ़ती आय, सड़क बुनियादी ढांचे में विस्तार और ऋण तक आसान पहुंच से रफ्तार मिली। इन कारकों के बल पर वाहनों की बिक्री में लगातार वृद्धि हुई और बाजार का विस्तार महानगरों से काफी आगे तक हुआ।

गुप्ता ने कहा, ‘पहले 25 साल मुख्य रूप से कंपनियों द्वारा भारत में निवेश करने और विनिर्माण क्षमता तैयार करने पर केंद्रित थे। मगर आज उद्योग एक अलग चरण में प्रवेश कर रहा है जहां आर्थिक वृद्धि, प्रौद्योगिकी और रीप्लेसमेंट की मांग से बाजार को रफ्तार मिल रही है।’

इस प्रगति के बावजूद उद्योग अभी भी अपने भविष्य की दिशा के बारे में कई महत्त्वपूर्ण सवालों से जूझ रहा है।

उद्योग विश्लेषकों का कहना है कि भारत ने स्थानीयकरण, लागत में कमी और विनिर्माण दक्षता जैसे मोर्चों पर शानदार प्रदर्शन किया है। मगर उसने वाहन नवाचार के मामले में वैश्विक स्तर पर अग्रणी के रूप में खुद को अब तक स्थापित नहीं किया है। भारतीय विनिर्माता घरेलू स्तर पर पावरहाउस ब्रांड बन गए हैं। उनमें से कोई भी अब तक प्रमुख जापानी, कोरियाई या चीनी वाहन कंपनियों की तरह खुद को व्यापक नहीं बना पाई है।

विद्युतीकरण, सॉफ्टवेयर के उपयोग और उन्नत ड्राइवर सहायता प्रणालियों (एडीएएस) वाले दौर में प्रवेश करने के साथ ही वाहन उद्योग के लिए यह चुनौती गंभीर होती जा रही है।

मोबिलिटी क्षेत्र के एक विशेषज्ञ ने कहा, ‘अगली परीक्षा यह है कि क्या भारतीय कंपनियां ऐसी प्रौद्योगिकियों और ब्रांडों का निर्माण कर सकती हैं जो वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करें और सफल हों अथवा वे केवल घरेलू बाजार के लिए उत्पादन पर ध्यान देंगी। अब तक ऐसा कोई भारतीय वाहन ब्रांड नहीं है जो दुनिया भर में उतनी ही लोकप्रिय हो।’

1991 के सुधारों ने भारत को एक विशाल और बेहद प्रतिस्पर्धी वाहन उद्योग बनाने में मदद की। मगर विकास का अगला चरण विनिर्माण क्षमता के बजाय इस बात पर अधिक निर्भर कर सकता है कि भारतीय कंपनियां वै​श्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने के लिए आवश्यक प्रौद्योगिकी और वैश्विक ब्रांड विकसित कर सकती हैं या नहीं।

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First Published - August 1, 2026 | 11:20 AM IST

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