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ताकत, वक्त और लंबी तैयारी का खेल: भारत और यूरोप क्यों आ रहे हैं एक साथ?

यह एक ऐसा खेल है जिसे सीखने का प्रयास अब दुनिया का हर देश कर रहा है। वे कुछ नए सहयोगी तलाश रहे हैं या उन देशों में मूल्य देख रहे हैं जिनमें पहले उनकी रुचि न के बराबर थी

Published by
शेखर गुप्ता   
Last Updated- February 15, 2026 | 9:19 PM IST

यह एक ऐसा खेल है जिसे सीखने का प्रयास अब दुनिया का हर देश कर रहा है। वे कुछ नए सहयोगी तलाश रहे हैं या उन देशों में मूल्य देख रहे हैं जिनमें पहले उनकी रुचि न के बराबर थी। 

आज की भू-राजनीति में असली खेल शक्ति जुटाने और अपने लिए समय हासिल करने का है। यह किन्हीं दो देशों के बीच का मुकाबला नहीं है। आपके पास जितनी अधिक ताकत की गुंजाइश होगी आपके पास उतना ही अधिक समय होगा। कोई भी महत्त्वपूर्ण देश जो संप्रभु देश हो, भले वह कितना भी छोटा क्यों न हो, यही खेल खेल रहा है। भारत इस समीकरण में कहां खड़ा है। हम इस बारे में बात करेंगे।

लसूटू के बारे में सोचिए जिसकी आबादी महज 23 लाख है। यह पहाड़ी देश चारों ओर से दक्षिण अफ्रीका से घिरा हुआ है। वहां बहुत अधिक गरीबी है और यह दुनिया के सबसे अधिक एचआईवी ग्रस्त देशों में है। उसकी प्रति व्यक्ति आय पाकिस्तान से भी आधी है। लेकिन उसके पास एक खास औद्योगिक शक्ति है। उसे दुनिया की जींस हब कहा जाता है। वस्त्र उद्योग उसका सबसे बड़ा रोजगार तैयार करने वाला क्षेत्र है जिसमें करीब 50,000 लोग काम करते हैं। अधिकांश निर्यात अमेरिका को किया जाता है। यह लेसेथो के सकल घरेलू उत्पाद का करीब 10 फीसदी है। यह इसलिए संभव हुआ क्योंकि अफ्रीकन ग्रोथ ऐंड अपॉरच्युनिटी (एजीएओ) के तहत उसे अमेरिका में शुल्क मुक्त पहुंच मिली है।

उसके बाद 2025 में डॉनल्ड ट्रंप आए और एजीएओ को भूल गए। लेसेथो पर 50 फीसदी का शुल्क लगा दिया गया जिसे बाद में घटाकर 15 फीसदी कर दिया गया। लेसेथो बड़े एशियाई विनिर्माताओं मसलन बांग्लादेश, वियतनाम और भारत की तुलना में प्रतिस्पर्धा से पिछड़ गया। अब उसने आधिकारिक तौर पर आपदाकाल घोषित कर दिया है। लेसेथो को एक ऐसे देश के उदाहरण के रूप में लेते हैं जिसके पास न तो ताकत है और न ही समय। उसकी अर्थव्यवस्था ट्रंप का इंतजार नहीं कर सकती। अब बात करते हैं उस देश की जिसके पास सबसे अधिक ताकत और समय है, यानी चीन। कारोबार के क्षेत्र में चीन अहम खनिजों की बिक्री और सोया और मक्के के खरीदार के रूप में ताकत रखता है। उसकी सेना तेजी से अमेरिका की तरह मजबूती हासिल कर रही है। दूसरी तरफ, ट्रंप अमेरिकी गठबंधनों को कमजोर कर रहे हैं।

और उसका समय केवल ट्रंप के तीन वर्षों तक सीमित नहीं है। यह उसके लिए अवसर का समय है। जैसे ही परेशान अमेरिका रणनीतिक दबाव कम करता है, चीन खुद को इतना मजबूत कर लेगा कि ट्रंप के उत्तराधिकारी शायद कभी इसकी बराबरी न कर सकें। अगर लेसेथो सबसे कमजोर देश का और चीन शीर्ष देश का उदाहरण है तो बाकियों का क्या? यूरोप की दिक्कतों और लसूटू के संकट को एक साथ तौलना अजीब लग सकता है, लेकिन ऐसा नहीं है। यूरोप को इसका एहसास पिछले दिनों म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में हुआ, जब उसे लगा कि उसकी अपनी ताकत कम है और वह सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर है। अब वे सुरक्षा पर खर्च बढ़ाएंगे, लेकिन खुद को सुरक्षित महसूस करने में उन्हें कई साल लगेंगे।

हथियार प्रणाली, खासतौर पर लड़ाकू विमान, पनडुब्बियां, मिसाइल यहां तक कि बुनियादी 155 मिमी तोप आदि को हैमलीज या एमेजॉन से ऑर्डर नहीं किया जा सकता है। उसके बाद आपको ऐसे नागरिक भी तलाश करने होते हैं जो लड़ने के इच्छुक हों। उन्हें प्रशिक्षण भी देना होगा। ऐसे में जाहिर है पुतिन के खतरे को देखते हुए उनके पास समय नहीं है।

हम चीन को अमेरिका से ऊपर कैसे रख सकते हैं? अमेरिका अभी भी चीन से अधिक ताकतवर है लेकिन उसका समय ट्रंप के शेष तीन वर्षों तक सीमित है। अमेरिका सभी अन्य देशों के निर्यात के लिए सबसे बड़ा बाजार है और उसके पास शुल्क लगाने की शक्ति है। उसके पास सबसे मजबूत सैन्य शक्ति है और आठ दशकों से उसके सबसे वफादार सहयोगी हैं। यूरोप, ब्रिटेन, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और ताइवान उस पर निर्भर हैं। अर्ध सहयोगी या रणनीतिक साझेदार, जिनमें भारत भी शामिल है, एक उभरते चीन को संतुलित करने के लिए अमेरिका की आवश्यकता रखते हैं।

उसके पास बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियां हैं, एआई क्षेत्र का नेतृत्व है और वैश्विक रिजर्व करेंसी भी है। लेकिन ट्रंप इनमें निवेश के बजाय इन्हें खर्च कर रहे हैं। अमेरिका की ताकत कमजोर पड़ रही है।

तीन साल बाद शायद वह एक अलग महाशक्ति होगा। क्या वह चीन के हाथों अपनी शक्ति गंवा चुका होगा? क्या उसके सहयोगी दोबारा उस पर भरोसा करेंगे? एक नाम याद रखिए: यूक्रेन नहीं ग्रीनलैंड। अमेरिकी साझेदारों को यह चिंता होगी कि अगर कल को अमेरिका में कोई और ज्यादा असहज करने वाला नेता सामने आ गया तो? अमेरिका के पास यही तीन साल का समय है यानी अगले चुनाव तक का। या सिर्फ 10 महीने भी हो सकता है, अगर मध्यावधि चुनाव ने ट्रंप को कमजोर कर दिया। यह एक महत्त्वपूर्ण बात दिखाता है। लोकतांत्रिक देशों के पास सीमित समय होता है।

अगले चार से पांच साल में इन सभी देशों में चुनाव होंगे। इजरायल की ताकत उसके इतिहास, विचारधारा, बौद्धिकता, भू-आर्थिकी, सेना और खुफिया शक्ति से आती है। वह एक पश्चिमी लोकतंत्र है जो एशिया और अफ्रीका के मुहाने पर है। वह यूरोप, अमेरिका और भारत का अनिवार्य सहयोगी है। हालांकि किसी चुनाव के बाद या अदालती कार्रवाई के चलते बेंजामिन नेतन्याहू को जाना होगा। तब शायद एक अलग इजरायल नजर आए। समय की सीमा लोकतंत्र का एक खास गुण है।

यह शी चिनफिंग, व्लादीमिर पुतिन और आजीवन फील्ड मार्शल आसिम मुनीर पर लागू नहीं होता। उत्तर कोरिया जैसी विशुद्ध तानाशाही हो या पाकिस्तान जैसी मिलीजुली तानाशाही, वहां समय की सीमा नहीं होती। हालांकि, ऐसे देशों में अचानक बदलाव भी हो सकते हैं, लेकिन हम भविष्य नहीं बता सकते।

अब हर देश यह खेल खेलना सीख रहा है। कुछ को नए साझेदार मिल रहे हैं या ऐसे देशों में मूल्य दिख रहा है जिनमें पहले नहीं दिखता था। इसका सबसे सटीक उदाहरण है भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापार समझौता। इस बदली हुई दुनिया ने भारत को ज्यादा मुक्त और प्रतिस्पर्धी बाजार के फायदे देखने को विवश किया है। रूस, ईरान, तुर्की, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात आदि सभी इस परिदृश्य में अपने आप को ढाल रहे हैं। इन पैमानों पर भारत कहां है? तथ्य यह है कि भारत की शक्ति सीमित है। ऑपरेशन सिंदूर के समय हमने यह देखा जब हमारे 32 रणनीतिक साझेदारों सहित लगभग पूरी दुनिया में से बहुत कम देश हमारे साथ नजर आए।

इसकी वजह हमारी अर्थव्यवस्था और बाजार हैं। ताकत बढ़ाने के लिए हमें जीडीपी को बढ़ाना होगा। उसके लिए अधिक जोखिम भरे सुधार करने होंगे, बाजार खोलने होंगे। मौजूदा आकार और दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर होना बेमानी होगा अगर हम दुनिया को यह यकीन नहीं दिला पाए कि हम अगले एक दशक तक 7.5 फीसदी सालाना की दर से वृद्धि हासिल करते रहेंगे।

जैसा कि अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ ने जनवरी में दावोस में कहा था, यह सामान्य गणित है कि भारत 2028 तक दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। परंतु प्रति व्यक्ति आय में वह काफी पीछे रहेगा। भारत की रणनीतिक पूंजी उसकी अर्थव्यवस्था का आकार नहीं बल्कि यह है कि वह कितनी तेजी से अपना विस्तार करता है। 

इसी प्रकार भारत के बाजार आयात के लिए खुले होने चाहिए। तब अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, जापान और खासतौर पर चीन की भी हमारी वृद्धि में हिस्सेदारी होगी और द्विपक्षीय रिश्तों में ठहराव लाने की दिशा में काम होगा।

भारत के पास समय की बात करें तो नीतिगत निरंतरता इतनी है कि 2029 तक के चुनावों की भी चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन ट्रंप के अगले तीन साल उतार-चढ़ाव भरे होंगे। सबसे बड़ी चुनौती उनकी अप्रत्याशित राजनीतिक प्रतिक्रियाएं होंगी, खासकर जब भारत की संसद चल रही हो। यह मोदी सरकार के धैर्य और निर्णय क्षमता की परीक्षा होगी। खासतौर पर तब जबकि भारत को विश्व गुरु के रूप में पेश किया जा रहा है। इंतजार कीजिए जब तक सर्जियो गोर स्थिर होकर मध्य और दक्षिण एशिया में दूत की अपनी बड़ी भूमिका निभाना शुरू करते हैं। यह हमारे तीन दशक पुराने डी-हाइफनेशन (भारत और पाकिस्तान को एक पलड़े पर न रखा जाए)  और दो देश नियम (अमेरिकी नेताओं का एक साथ भारत और पाकिस्तान का दौरा करना) के ​खिलाफ रहने की नीति को परखने वाला होगा। ट्रंप केवल तीन और वर्षों के लिए हैं, लेकिन ये तीन साल कठिन होंगे।

भारत ने तेजी से रणनीतिक समायोजन किए हैं, कुछ धारणाएं छोड़ दी हैं, व्यापार समझौते और मुक्त व्यापार समझौते किए हैं, जबकि एक दशक से अधिक समय तक व्यापार का अनिच्छुक रहा था। कुछ कठिन सुधार भी किए गए हैं। और सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि रक्षा बजट बढ़ रहा है और लंबे समय से लंबित अधिग्रहण आगे बढ़ रहे हैं। यह प्रभाव को फिर से बना रहा है और समय खरीद रहा है।

First Published : February 15, 2026 | 9:19 PM IST