प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा ऋण वसूली के लिए सख्त नियमों के प्रस्ताव से गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) की अनुपालन लागत बढ़ने की आशंका है। खासकर बड़ी कंपनियों को छोड़कर वैसी कंपनियां जो ऋण की वसूली के लिए बाहरी एजेंसियों (थर्ड-पार्टी) पर निर्भर रहती हैं। इन एजेंसियों को आरबीआई के नए नियमों के अनुसार ऋण वसूली करने वाले एजेंटों को प्रशिक्षण देने और उनकी निगरानी करने से अतिरिक्त खर्च बढ़ेगा।
देश की एक बड़ी एनबीएफसी के वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ‘जो कंपनियां ऋण वसूली का काम बाहरी एजेंसियों से कराती हैं उनकी लागत बढ़ सकती है। हर ऋण वसूली से जुड़ी बाहरी एजेंसी को प्रशिक्षण और प्रमाणन लेना होगा और बैंक या एनबीएफसी के नियमों का पालन करना होगा। इससे एनबीएफसी का खर्च बढ़ेगा। जिन एनबीएफसी के पास अपनी खुद की ऋण वसूली से जुड़ी टीम नहीं है, उन पर नियमों का बोझ ज्यादा पड़ेगा। हालांकि, ग्राहकों के लिए ये नए नियम फायदेमंद होंगे।’
बड़ी एनबीएफसी कंपनियां, जैसे श्रीराम फाइनैंस और सुंदरम फाइनैंस ऋण वसूली का काम खुद ही करती हैं और बाहरी एजेंसियों पर निर्भर नहीं रहतीं।
अपने मसौदा परिपत्र में आरबीआई ने प्रस्ताव दिया है कि बैंक और उनकी रिकवरी एजेंसियां कर्ज लेने वालों के साथ सख्ती या जबरदस्ती वाला व्यवहार नहीं कर सकेंगी। मसौदा नियमों के अनुसार, गाली-गलौज या धमकी भरी भाषा का इस्तेमाल, बार-बार या गुमनाम कॉल करना, अनुचित संदेश भेजना, कर्जदार या उसके परिचितों को परेशान करना, सार्वजनिक रूप से बेइज्जती करना, हिंसा की धमकी देना, या कर्ज और भुगतान न करने के परिणामों के बारे में गलत जानकारी देना पूरी तरह प्रतिबंधित होगा।
केंद्रीय बैंक ने यह भी अनिवार्य किया है कि रिकवरी एजेंटों को इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ बैंकिंग ऐंड फाइनैंस के ऋण रिकवरी एजेंट कार्यक्रम के तहत प्रशिक्षण लेना और प्रमाणपत्र हासिल करना होगा। एनबीएफसी कंपनियों को ऋण वसूली में लगे कर्मचारियों और एजेंटों के लिए एक विस्तृत आचार संहिता बनानी होगी। उन्हें काम शुरू करने से पहले इन नियमों का पालन करने का लिखित बयान भी लेना होगा।